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राहुल विदेश यात्रा पर, बतौर क्राइसिस मैनेजर प्रियंका गांधी पर टिकी स्पॉटलाइट

2021 बस शुरू होने वाला है, ऐसे में सभी निगाहें गांधी परिवार, खास तौर पर प्रियंका पर हैं कि वो किस तरह राजस्थान और छत्तीसगढ़ में असहज स्थिति से निपटती हैं और कैसे खुद की अलग, त्वरित और स्वतंत्र पहचान कायम करती हैं. प्रियंका गांधी पर क्राइसिस मैनेजर (संकट मोचक), नेता, और सुनने वाले शख्स के तौर, एक ही जगह पर अधिक स्पॉटलाइट है जबकि राहुल गांधी ने एक और छुट्टी का विकल्प चुना है.

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कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और प्रियंका गांधी (फाइल फोटो)
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और प्रियंका गांधी (फाइल फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • राहुल गांधी निजी विदेश दौरे पर हैं
  • विपक्ष राहुल के दौरे पर साध रहा निशाना
  • आज कांग्रेस का संस्थापन दिवस है

चौरतरफा घिरी कांग्रेस जहां 136वां स्थापना दिवस मनाने के लिए तैयार है वहीं पार्टी की कई राज्य इकाइयों में अशांति उभर रही है, इनमें कांग्रेस शासित राज्य राजस्थान और छत्तीसगढ़ भी शामिल हैं.  

जयपुर में पूर्वानुमान और बेताबी छाई है, जहां सचिन पायलट के समर्थक आश्वस्त हैं कि सोनिया, राहुल और प्रियंका गांधी अगस्त, 2020 में हुए अनौपचारिक शांति समझौते की शर्तों का सम्मान करेंगे, वहीं मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के समर्थक पायलट खेमे की आशावाद की भावना की हवा निकालने में जुटे हैं. असल में, गहलोत खुद पायलट की व्यग्रता का हवाला दे रहे हैं. घाघ राजनेता के नाते गहलोत बीजेपी पर राजस्थान में दलबदल को बढ़ावा देने की कोशिश करने का आरोप लगाते हैं, लेकिन उनके कहे का कुछ अनकहा पायलट के कथित रोल को लेकर होता है जो कांग्रेस के अंदर कई को आहत करने के साथ बेचैनी पैदा करता है. 

गहलोत ने हाल में बीजेपी पर एक ‘मुस्लिम’- बीजेपी राज्यसभा सांसद सैयद जफर इस्लाम को जुलाई 2020 की बगावत में कथित खरीद फरोख्त में शामिल होने के लिए इस्तेमाल करने का आरोप लगाया, जब पायलट से जुड़े 18 विधायकों ने दिल्ली और हरियाणा में डेरा डाला था. इस्लाम का नाम तब भी मध्यस्थ के तौर पर सामने आया था जब ज्योतिरादित्य सिंधिया ने इस साल मार्च में बीजेपी का दामन पकड़ा था.  

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कांग्रेस पर्यवेक्षक कारण देखते हैं कि गहलोत क्यों बार बार जुलाई 2020 बगावत का जिक्र कर रहे हैं, वे इससे संदेश देना चाहते हैं कि ये बीजेपी की साजिश थी न कि कांग्रेस की गुटबाजी. गहलोत कैम्प आशंकित है कि प्रियंका गांधी नेतृत्व परिवर्तन के लिए दबाव डालने में फ्रंट पर आ सकती हैं. वरिष्ठ कांग्रेस नेता कमल नाथ इस महीने के शुरू में जयपुर में थे. कहने को वे एक शादी में हिस्सा लेने के लिए आए थे. कमल नाथ संजय गांधी युग से ही गहलोत के समकालीन रहे हैं. कमल नाथ ने जयपुर में गहलोत से मुलाकात या संपर्क नहीं किया. इसकी जगह शादी में वो पायलट से बात करते दिखे. पायलट फिर कमल नाथ को सांगानेर हवाई अड्डे तक कार से छोड़ने गए. 

शिष्टाचार भेंट दिखने वाली इस मुलाकात से जयपुर में काफी सुगबुगाहट हुई क्योंकि कमल नाथ आखिरकार प्रियंका के दूत के तौर पर काम रहे हैं. उनकी जी 23 असंतुष्टों को सुलह के लिए 10, जनपथ पर लाने के लिए भूमिका अब किसी से छुपी नहीं है. गहलोत कैम्प इस संभावना से आशंकित है कि ‘कॉल ऑफ ड्यूटी’ के तहत सोनिया गहलोत को वरिष्ठ AICC पदाधिकारी के तौर पर जिम्मेदारी संभालने के लिए कह सकती हैं, यानि उन्हें राजस्थान के सीएम की कुर्सी छोड़नी होगी. 

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छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को मजबूत बहुमत प्राप्त है. दरअसल, मुख्यमंत्री भूपेश बघेल अजीत जोगी की जनता कांग्रेस के दो सदस्यों को भी अपने साथ मानते हैं जो 90 सदस्यीय विधानसभा में उन्हें 72 विधायकों का समर्थन देता है. लेकिन घर में ही बघेल के प्रतिद्वंद्वी त्रिभुनेश्वर सरन सिंह देव की महत्वाकांक्षा बघेल को मिड-टर्म बदलने की है.  

राज्य के स्वास्थ्य मंत्री सिंह देव कथित तौर पर दिसंबर 2018 में दिए गए आश्वासन पर उम्मीद लगाए बैठे हैं कि पांच साल का कार्यकाल बराबर तौर पर बघेल और सिंह देव में बांटा जाएगा. अब दो साल बीत चुके है और ये आश्वासन के पूरा होने का समय है. इस तरह की सहमति को नकारे जाने के बीच बघेल और उनके औपचारिक नंबर 2 में आपसी विश्वास धरातल पर है.   

कांग्रेस का एक वर्ग राहुल गांधी पर दिसंबर 2018 में कुछ भ्रम पैदा करने का आरोप लगा रहा है जब वो AICC प्रमुख थे और कांग्रेस ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में जीत हासिल की थी.  

राहुल ने लोकतांत्रिक तरीके से काम करना चाहा जिसके नतीजे में कई लोग नाराज हो गए. मध्य प्रदेश में उनके दोस्त सिंधिया को नीचा महसूस हुआ जब उन्होंने युवा चेहरे को प्रोजेक्ट करने की जगह हेडकाउंट को प्राथमिकता दी. 15 महीने बाद सिंधिया ने पाला बदल दिया और कमल नाथ सरकार गिर गई. 

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छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री उम्मीदवार का चुनाव सबसे जुगत वाला साबित हुआ. मुख्यमंत्री के पद के लिए राहुल के सामने चार उम्मीदवार थे.  सिंह देव के मधुरभाषी और अनुभवी होने के बावजूद उनकी सरगुजा के पूर्व शासक के तौर पर सामंती पृष्ठभूमि आड़े आ गई. उस वक्त राज्य से लोकसभा के इकलौते कांग्रेस सांसद तमरध्वज साहू AICC के पाइंट्समैन पीएल पूनिया के पसंदीदा थे और ऐन वक्त पर विधानसभा चुनाव में असरदार साहू समाज के वोटों की खातिर खड़ा किया गया है. संसाधन संपन्न और संयत शब्दों का इस्तेमाल करने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री चरण दास महंत के साथ छत्तीसगढ़ कांग्रेस यूनिट अध्यक्ष बघेल भी इस दौड़ में शामिल थे.  

सिंह देव, साहू, बघेल और महंत को दिल्ली बुलाया गया और राहुल गांधी ने उनसे बात की. राहुल उनसे गले मिले और आम सहमति बनाने की कोशिश की. अगले तीन घंटे में, साहू जनजातीय राज्य के एक तरह से मुख्यमंत्री करीब करीब घोषित किए जाने वाले थे कि बाकी तीनों दावेदारों की ओर से राहुल को विद्रोह का सामना करना पड़ा. एकसुर में तीनों क्षेत्रीय छत्रपों ने साहू के तहत मंत्री के तौर पर काम करने से इनकार किया. ऐसी स्थिति बनने से राहुल विचलित हुए और विमर्श का एक दौर हुआ. अब सिंह देव पसंदीदा दावेदार के तौर पर उभरे लेकिन इस बार साहू ने बगावत की धमकी दी. विमर्श की प्रक्रिया से फिर मोतीलाल वोरा को जोड़ना पड़ा. गतिरोध नहीं टूटा तो अहमद पटेल ने दखल दिया. पटेल ने बघेल का समर्थन किया जो राहुल के लिए हैरान करने वाला था. ये कहा जाता है कि जब बघेल के नाम को हरी झंडी दी गई तब ये राहुल या उनकी ओर से किसी ने ये खुसपुसाहट की थी कार्यकाल के दूसरे चरण यानि ढाई साल के लिए सिंह देव को मुख्यमंत्री बनाने पर विचार कियाथ जाएगा. वोरा और पटेल दोनों ही अब इस दुनिया में नहीं हैं. राहुल भी AICC चीफ नहीं रहे हैं, लेकिन रायपुर में महत्वाकांक्षाएं बरकरार हैं.  

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गांधी परिवार को फिलहाल इससे संतोष मिल सकता है कि छत्तीसगढ़ में बगावत या विद्रोह की संस्कृति नहीं रही है. साथ ही आंकड़े मजबूती से बघेल के पक्ष में हैं. बीजेपी के पास 14 विधायक हैं, वहीं सिंह देव कैम्प में 14 से 15 विधायक माने जाते हैं. छत्तीसगढ़ मंत्रिमंडल में कुल मंत्रियों की संख्या 13 है. बघेल ने कम से कम दो दर्जन विधायकों को संसदीय सचिव, बोर्ड और निगमों के प्रमुख पदों से नवाज रखा है, दूसरे राज्यों में साधारण तौर पर इन पदों पर गैर विधायकों की नियुक्ति होती है.  

बघेल के सामने चुनौती, हालांकि सीबीआई, ईडी जैसी केंद्रीय एजेंसियों से है जो कथित तौर पर उनकी सरकार पर बाज जैसी नजरें गढ़ाए हुए हैं. बघेल राज्य में अपने ब्रैंड के बहुलवाद, क्षेत्रवाद को बढ़ावा दे रहे हैं, ये ऐसी बात है जो छत्तीसगढ़ बीजेपी को फूटी नहीं सुहाती. स्थानीय बीजेपी नेता राज्य में कमजोर कांग्रेस सीएम देखना चाहते हैं. 

2021 बस शुरू होने वाला है, ऐसे में सभी निगाहें गांधी परिवार, खास तौर पर प्रियंका पर हैं कि वो किस तरह राजस्थान और छत्तीसगढ़ में असहज स्थिति से निपटती हैं और कैसे खुद की अलग, त्वरित और स्वतंत्र पहचान कायम करती हैं.   

प्रियंका गांधी पर क्राइसिस मैनेजर (संकट मोचक), नेता, और सुनने वाले शख्स के तौर, एक ही जगह पर अधिक स्पॉटलाइट है जबकि राहुल गांधी ने एक और छुट्टी का विकल्प चुना है. समझा जाता है कि राहुल मिलान के पास स्थित ओर्बसानो में अपने ननिहाल जा रहे हैं जहां उनकी वयोवृद्ध नानी पाओला प्रेडेबॉन का स्वास्थ्य सही नहीं चल रहा. 

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पिता राजीव गांधी की तरह ही राहुल की छुट्टियां भी लगातार सुर्खियों और आलोचना के घेरे में रहती हैं. प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष (1984-1989) रहते हुए राजीव नियमित तौर पर क्रिसमस और नए साल पर छुट्टियों पर जाते थे. वे 1985 में मध्य प्रदेश के कान्हा नेशनल पार्क और 1986 में राजस्थान के रणथंभौर गए थे. 1987 में राजीव-सोनिया और उनकी निकट मित्र मंडली अंडमान गए थे. 1988 में उन्होंने लक्षद्वीप को चुना था. राजीव को फोटोग्राफी, वन्यजीवन में वास्तव में रूचि थी और वे परिवार और निकट मित्रों के साथ क्वालिटी टाइम बिताना पसंद करते थे.  

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