लोकसभा चुनाव के नतीजों में एनडीए को मिले बहुमत के बाद 9 जून को मोदी सरकार 3.0 का शपथ ग्रहण होना है. प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी का तीसरा कार्यकाल काफी चुनौतीपूर्ण रहने वाला है. दरअसल, इस बार बीजेपी को अपने दम पर बहुमत नहीं मिल सका है. इसलिए उसे सरकार बनाने और बचाने के लिए सहयोगी दलों पर निर्भर होना पड़ रहा है. ऐसे में मोदी सरकार 3.0 में सहयोगी दलों की भूमिका महत्वपूर्ण रहने वाली है.
नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल में टीडीपी, जेडीयू, शिवसेना और लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) की महत्वपूर्ण भूमिका रहने वाली है. इन 4 पार्टियों में कुल मिलाकर 40 सांसद हैं. इनमें से टीडीपी और जेडीयू अपने लिए मनपसंद मंत्रालय चाहती हैं और हर चार सांसद पर एक मंत्री की मांग कर रही हैं. इस लिहाज से टीडीपी (16) चार, जेडीयू (12) 3, शिवसेना (7) और चिराग पासवान (5) को दो-दो मंत्रालयों की उम्मीद है. टीडीपी स्पीकर पद भी चाहती है, हालांकि बीजेपी इसके लिए तैयार नहीं है. हालांकि, माना जा रहा है कि ज्यादा जोर देने पर डिप्टी स्पीकर पद टीडीपी को मिल सकता है. जेडीयू के पास पहले से ही राज्यसभा डिप्टी चेयरमैन का पद है.
संख्या के हिसाब से बनाने होंगे मंत्री
बता दें कि अभी तक मोदी के दो कार्यकाल में सहयोगी दलों को सांकेतिक प्रतिनिधित्व मिला है. यानी उनकी संख्या के अनुपात में मंत्री पद देने के बजाए केवल सांकेतिक नुमाइंदगी दी गई है. जबकि जेडीयू ने 2019 में संख्या के हिसाब से नुमाइंदगी की मांग की थी और ऐसा न होने पर सरकार में शामिल नहीं हुई थी. बदली परिस्थितियों में बीजेपी को संख्या के हिसाब से ही मंत्री बनाने होंगे. इसका मतलब होगा कि मंत्रिपरिषद में बीजेपी के मंत्रियों की संख्या घटेगी और सहयोगियों की संख्या बढ़ जाएगी. लेकिन कुछ शर्तों पर बीजेपी शायद ही समझौता करे.
रफ्तार धीमी नहीं करना चाहेगी BJP
माना जा रहा है कि केंद्र की नई सरकार सीसीएस (रक्षा, वित्त, गृह और विदेश) के चार मंत्रालयों में सहयोगी को जगह ना दे. इंफ्रास्ट्रक्चर, गरीब कल्याण, युवा से जुड़े और कृषि मंत्रालयों भी बीजेपी अपने पास ही रखना चाहेगी. यह मोदी की बताई गईं चार जातियों- गरीब, महिला, युवा और किसान के लिए योजनाओं को लागू करने के लिए अहम है. रेलवे, सड़क परिवहन आदि में बड़े सुधार किए गए हैं और बीजेपी इन्हें सहयोगियों को देकर सुधार की रफ्तार धीमी नहीं करना चाहेगी. रेलवे जिस किसी भी सरकार में सहयोगियों के पास रहा, तब लोकलुभावन नीतियों के चलते उसका बंटाधार हुआ है. बड़ी मुश्किल से उसे पटरी पर लाया जा रहा है.
दोनों कार्यकाल में सांकेतिक प्रतिनिधित्व
अगर मोदी सरकार-1 और मोदी सरकार-2 के कार्यकाल देखें तो सहयोगियों को सांकेतिक प्रतिनिधित्व में नागरिक उड्डयन, भारी उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण, स्टील और खाद्य, जन वितरण और उपभोक्ता मामले जैसे मंत्रालय दिए गए. खाद्य, जन वितरण एवं उपभोक्ता मामले (2014 में राम विलास पासवान के पास था). नागरिक उड्डयन (टीडीपी के पास रहा). भारी उद्योग एवं पब्लिक एंटरप्राइज (शिवसेना के पास रहा). खाद्य प्रसंस्करण (अकाली दल और बाद में पशुपति पारस के पास रहा), स्टील (जेडीयू के पास रहा).
वाजपेयी और नई BJP सरकार में अंतर
वाजपेयी सरकार की बात की जाए तो उसमें उद्योग, पेट्रोलियम, रसायन एवं उर्वरक, कानून एवं विधि, स्वास्थ्य, सड़क परिवहन, वन एवं पर्यावरण, स्टील एंड माइन्स, रेलवे, वाणिज्य और यहां तक कि रक्षा मंत्रालय भी सहयोगियों के पास रहा. अब फिर बीजेपी को सहयोगियों के आगे कुछ हद तक झुकना होगा. पंचायती राज्य और ग्रामीण विकास जैसे मंत्रालय जेडीयू को दिए जा सकते हैं. नागरिक उड्डयन, स्टील जैसे मंत्रालय टीडीपी को मिल सकते हैं. भारी उद्योग शिवसेना को मिल सकता है.
ये मंत्रालय टीडीपी को दे सकती है BJP
महत्वपूर्ण मंत्रालयों जैसे वित्त, रक्षा में सहयोगियों को राज्य मंत्री पद दिया जा सकता है. पर्यटन, एमएसएमई, स्किल डेवलपमेंट, साइंस टेक्नॉलॉजी एंड अर्थ साइंसेज, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता जैसे मंत्रालय सहयोगियों को देने पर बीजेपी को समस्या नहीं होनी चाहिए. हालांकि, टीडीपी इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MEITY) जैसा मंत्रालय भी मांग सकती है.