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कैप्टन अमरिंदर सिंह: 1984 में कांग्रेस से नाराज होकर छोड़ दी थी पार्टी, थामा था अकाली दल का दामन

अब कांग्रेस को तो झटका लग चुका है, एक बड़े चेहरे ने नाराज होकर इस्तीफा सौंप दिया है, लेकिन अब आगे क्या? अमरिंदर का अगला कदम क्या हो सकता है? इस सवाल का जवाब जानना मुश्किल है. आइए एक नजर डालते हैं उनके राजनीतिक सफर पर...

 अमरिंदर सिंह अमरिंदर सिंह
स्टोरी हाइलाइट्स
  • अमरिंदर सिंह का राजनीतिक सफर
  • कभी कांग्रेस छोड़ थामा था अकाली का दामन
  • भविष्य के विकल्प पर करने वाले हैं विचार

अमरिंदर सिंह अब पंजाब के कैप्टन नहीं रहे हैं. उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया है. उनके साथ पंजाब के सभी मंत्रियों का इस्तीफा भी राज्यपाल को सौंप दिया गया है. अब कांग्रेस को तो झटका लग चुका है, एक बड़े चेहरे ने नाराज होकर इस्तीफा सौंप दिया है, लेकिन अब आगे क्या? अमरिंदर का अगला कदम क्या हो सकता है? इस सवाल का जवाब जानना मुश्किल है, लेकिन उनके राजनीतिक सफर से इसकी हिंट जरूर मिलती है.

पंजाब की राजनीति में जब भी कांग्रेस की बात आती है तो सबसे ऊपर कैप्टन अमरिंदर सिंह का नाम आता है. अगर अकाली के साथ प्रकाश सिंह बादल का नाम जुड़ा हुआ है, तो पंजाब इकलौता ऐसा राज्य है जहां पर गांधी परिवार को छोड़ हर कोई अमरिंदर के नाम से ही कांग्रेस को पहचानता है और वोट देता है. ऐसे में अब पंजाब की राजनीति में कैप्टन अमरिंदर एक बड़ा चेहरा हैं जिन्होंने कई चुनाव भी जीते हैं, मुख्यमंत्री भी बने हैं.

राजीव का भरोसा....राजनीति में एंट्री

लेकिन इस राजनीति में कैप्टन को लाने का सारा श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को जाता है. अमरिंदर सिंह 1963 से 1966 तक भारतीय सेना में सेवारत रहे थे. उन्होंने 1965 की जंग से पहले ही अपना इस्तीफा दे दिया था लेकिन क्योंकि माहौल संवेदनशील था, ऐसे में उन्हें वापस बुलाया गया था. तब कैप्टन ने जमीन पर जाने के बजाय एडमिनिस्ट्रेटिव काम संभाल लिया था. लेकिन इसके बाद उनकी जिंदगी में बड़ा नाटकीय मोड़ आया.

कैप्टन और राजीव गांधी स्कूल के दिनों से एक दूसरे को जानते थे. जब राजनीति से कोई लेना-देना नहीं था, तब भी राजीव और अमरिंदर की दोस्ती काफी गहरी थी. उस दोस्ती को राजनीतिक रिश्ते में बदलने का मौका साल 1980 के लोकसभा चुनाव में मिला जब राजीव गांधी ने एक बड़े सिख लीडर के तौर पर पंजाब की राजनीति में कैप्टन अमरिंदर सिंह को उतार दिया. ये वो समय था जब अकाली दल काफी लोकप्रिय हो चुका था. ऐसे में उस लोकप्रियता से पार पाने के लिए राजीव गांधी ने अमरिंदर सिंह का चयन किया था. 

जब अकाली दामन थाम गए अमरिंदर

अमरिंदर को ज्यादा भरोसा नहीं था, लेकिन दोस्त की बात वे टाल नहीं सकते थे. ऐसे में अमरिंदर सिंह ने 1980 में पहली बार सक्रिय राजनीति में कदम रख दिया और उन्होंने अपनी पहली जीत भी हासिल कर ली. अब लोकसभा तो पहुंच गए लेकिन अपने उसूलों के काफी पक्के रहे.

इसी वजह से 1984 में जब गोल्डन टैंपल पर सैन्य कार्रवाई की गई थी, तब कैप्टन ने तुरंत लोकसभा से इस्तीफा दे दिया. वे कांग्रेस से काफी नाराज हो लिए थे. उस नाराजगी ने कैप्टन को एक ऐसा फैसला लेने पर मजबूर कर दिया जो आज उनकी राजनीतिक शैली की बड़ी पहचान बन गया है. 1984 में कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कांग्रेस छोड़ अकाली दल ज्वाइन कर ली थी. जी हां, अकाली दल जिसे हरा 2017 में फिर सीएम कुर्सी पर काबिज हुए थे अमरिंदर. 

उस समय पंजाब में अकाली दल की ही सरकार थी और सुरजीत सिंह बरनाला मुख्यमंत्री हुआ करते थे. तब अमरिंदर ने अकालियों से हाथ मिलाया था और उन्हें उस सरकार में मंत्री भी बना दिया गया. तब अमरिंदर एग्रीकल्चर, फॉरेस्ट, डेवेलपमेंट और पंचायत मंत्री के तौर पर काम किया. लेकिन वहां भी उनकी राजनीतिक पारी ज्यादा लंबी नहीं चली. सपने बड़े थे और खुद को पंजाब की राजनीति में स्थापित करना था.

खुद की पार्टी बना लड़ लिया चुनाव

ऐसे में अमरिंदर सिंह ने 1992 में अकाली दल को भी छोड़ दिया. अब ये फैसला उनके लिए ज्यादा बड़ा इसलिए रहा क्योंकि अब वे एक बिल्कुल ही नई पारी शुरू करना चाहते थे. उन्होंने फिर कांग्रेस में जाने के बजाय अपनी खुद ही पार्टी बना ली. नाम रख दिया- अकाली दल (पंथक). पूरे 6 साल तक अमरिंदर सिंह ने अपनी इस नई पार्टी को पंजाब में मजबूत करने की कोशिश की. इस दौरान राज्य में तीन बार चुनाव भी हुए, ऐसे में उन्हें अपनी ताकत आजमाने का पूरा मौका मिला. लेकिन उस नई पार्टी के साथ अमरिंदर का पंजाब का कैप्टन बनने का सपना पूरा नहीं हो पाया. उनकी पार्टी भी पंजाब की राजनीति में कोई छाप छोड़ती नहीं दिखी.

कांग्रेस में कैसे बढ़ा कद?

इसी वजह से अमरिंदर ने बाद में अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर लिया और फिर उनका रिश्ता सबसे पुरानी पार्टी संग अटूट रहा. लेकिन कांग्रेस में उनका सफर काफी उतार-चढ़ाव वाला रहा. 1997 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को तो करारी हार मिली ही थी, अमरिंदर भी पटियाला से बुरी तरह हार लिए थे. उन्हें तब मात्र 856 वोट पड़े थे और प्रोफेसर प्रेम सिंह चंदूमाजरा ने बड़े अंतर से जीत हासिल की थी.

लेकिन अमरिंदर को इस बात का अहसास था कि अगर पंजाब में कांग्रेस की वापसी करवानी है तो उन्हें अकालियों का तोड़ ढूंढना ही था, इसके साथ-साथ कांग्रेस संगठन को भी मजबूत करना था. उन्हें ये मौका साल 1999 में दे दिया गया और फिर 2002 में भी वे कांग्रेस के पंजाब अध्यक्ष बन गए. तब अमरिंदर ने जमीन पर जबरदस्त काम किया और उस काम के बदबूते पर ही 2002 के चुनाव में कांग्रेस को पंजाब में बड़ी जीत दिलवा दी. तब कांग्रेस राज्य की 62 सीटें जीतने में कामयाब रही.

पंजाब के कैप्टन के तौर पर पारी

कांग्रेस का शानदार प्रदर्शन का सारा श्रेय तब कैप्टन को दिया गया और वे पंजाब के मुख्यमंत्री बना दिए गए. 26 फरवरी 2002 को कैप्टन को सीएम बनाया गया था और वे 2007 तक सत्ता में रहे. लेकिन यहां भी कैप्टन और विवादों का नाता मजबूत होता गया. वे सीएम तो रहे लेकिन उन पर कई गंभीर आरोप भी लगते रहे. ऐसा ही एक आरोप 2008 में भी लग गया. ज़मीनी लेन-देन की ट्रांजेक्शंस में हेर-फेर का मामला सामने आया.

तब कार्रवाई भी हुई और उन्हें पंजाब विधानसभा की स्पेशल कमेटी से बर्खास्त कर दिया गया. इसके बाद 10 साल तक कांग्रेस भी पंजाब में सत्ता से दूर रही और अमरिंदर भी सक्रिय नहीं दिखे. जब अकाली-बीजेपी के गठबंधन को लगने लगा था कि पंजाब की राजनीति में वे सबसे ज्यादा ताकतवर बन गए हैं, तब फिर कांग्रेस का उभार हुआ.

2017 में मोदी लहर पर लगाया ब्रेक

जिस समय मोदी-शाह की जोड़ी देश के कई राज्यों को कांग्रेस मुक्त कर रही थी, तब अमरिंदर सिंह ने अकेले अपने दम पर साल 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बड़ी जीत दिलवा दी. बड़ी बात ये भी रही कि इस जीत का श्रेय राहुल गांधी या सोनिया को नहीं दिया गया, बल्कि जीत का सेहरा सिर्फ और सिर्फ कैप्टन के सिर पर बंधा. वे दूसरी बार मुख्यमंत्री भी बन लिए. लेकिन हाईकमान में राहुल गांधी संग उनकी तकरार कई मौकों पर सामने आई.

संन्यास नहीं....भविष्य के विकल्प पर करेंगे विचार

फिर जब नवजोत सिंह सिद्धू ने कांग्रेस का दामन थाम लिया, कैप्टन की राह और ज्यादा मुश्किल हो गई. पहले अपने बयानों से अमरिंदर को असहज किया गया, फिर कई विधायकों को अपने पाले में कर कैप्टन पर दवाब बनाया गया. नतीजा ये हुआ कि सिद्धू को पंजाब कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया गया. हस्तक्षेप बढ़ता गया, कैप्टन बनाम सिद्ध की जंग तेज हो गई और अब अमरिंदर का इस्तीफा हो गया. वे राजनीति से संन्यास नहीं ले रहे हैं, भविष्य वाले विकल्पों का जिक्र भी कर रहे हैं, ऐसे में पंजाब की राजनीति में अभी कैप्टन अध्याय जारी रहने वाला है.

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