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महिलाएं, पहली बार के मतदाता और पीएम मोदी... 6 फैक्टर जो विधानसभा चुनावों पर डाल सकते हैं असर

पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों की तारीखें नजदीक आ गई हैं. 2024 में होने वाले आम चुनावों से ठीक पहले हो रहे इन चुनावों के लिटमस टेस्ट के तौर पर भी देखा जा रहा है. चुनावों की शुरुआत 7 नवंबर से मिजोरम में होगी. 30 नवंबर को तेलंगाना मतदान होगा. 3 दिसंबर को मतगणना के साथ ये चुनाव समाप्त होंगे. ऐसे में उन x फैक्टर्स पर ध्यान देना जरूरी है जो पांच राज्यों में चुनाव के परिणाम निर्धारित कर सकते हैं.

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पांच राज्यों में शुरू होने वाली वोटिंग (फाइल फोटो)
पांच राज्यों में शुरू होने वाली वोटिंग (फाइल फोटो)

विधानसभा चुनाव 2023 का बिगुल बज चुका है. सभी पार्टियां चुनावी मैदान में आमने-सामने खड़ी हैं. अब मतदान की प्रक्रिया बाकी रह गई है. इसकी शुरुआत 7 नवंबर से मिजोरम में होगी. 30 नवंबर को तेलंगाना मतदान होगा. 3 दिसंबर को मतगणना के साथ समाप्त होगा. ऐसे में उन x फैक्टर्स पर ध्यान देना जरूरी है जो पांच राज्यों में चुनाव के परिणाम निर्धारित कर सकते हैं.

1. महिला मतदाताः 
छत्तीसगढ़ और मिजोरम में महिलाओं की संख्या पुरुषों से अधिक है. तेलंगाना में इनकी संख्या पुरुष मतदाताओं के बराबर है. पिछले कुछ वर्षों में, महिलाएं एक जरूरी वोट ब्लॉक के रूप में उभरी हैं. जागरूकता और साक्षरता के स्तर में वृद्धि ने बड़े पैमाने पर महिलाओं को मतदान में आजादी के साथ अपना खुद का निर्णय लेने के लिए प्रेरित किया है.

पुरुषों की तुलना में महिलाओं की ज़रूरतें, चाहत, इच्छाएं, आकांक्षाएं, मुद्दे और मांगें अलग हैं और राजनीतिक दल अब उन्हें खास योजनाओं और अलग घोषणापत्रों के साथ लुभाते नजर आते है. एक आम धारणा है कि महिलाएं जाति-वर्ग की पहचान के आधार पर नहीं बल्कि लिंग पहचान के आधार पर मतदान करती हैं.

समय बदलने के साथ महिलाएं तेजी से, पुरुषों की तुलना में अधिक संख्या में बाहर निकल रही हैं. 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों की तुलना में 0.17 प्रतिशत अधिक था. 2018 में हुए स्टेट इलेक्शन में मध्य प्रदेश को छोड़कर सभी पांच राज्यों में महिलाओं का मतदान पुरुषों की तुलना में एक से 2.5 प्रतिशत अधिक था.

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2. पहली बार मतदाता:
18-19 साल के 60 लाख से ज्यादा मतदाता ऐसे हैं, जो पहली बार किसी चुनाव में वोट डालेंगे. यह कुल आधार का लगभग चार प्रतिशत है. पहली बार मतदान करने वालों की संख्या मिज़ोरम में सबसे अधिक लगभग छह प्रतिशत, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में चार-चार प्रतिशत और तेलंगाना में तीन प्रतिशत है.

मध्य प्रदेश में इन मतदाताओं ने अपने अधिकांश जीवन में केवल शिवराज सिंह चौहान को ही मुख्यमंत्री के रूप में देखा है. राजस्थान में, उन्होंने अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे दोनों को बतौर सीएम देखा है. तेलंगाना में उन्होंने के.चंद्रशेखर राव को ही सीएम के रूप में देखा है, जबकि छत्तीसगढ़ में रमन सिंह और भूपेश बघेल ही अपने जीवनकाल में सीएम रहे हैं.

राज्य में जो भी सही या गलत हुआ है, उसका श्रेय और गलत की जिम्मेदारी इन नेताओं को ही जाती है.' ऐसे में उनकी तुलना के लिए कम ही तर्क हैं. युवा पीढ़ी जल्दी ऊब जाती है और नई चीजों को आजमाने से नहीं कतराती. ये मतदाता राजनीतिक स्पेक्ट्रम में युवा और नए चेहरों की तलाश में हो सकते हैं.

3. स्थानीय उम्मीदवार:
चुनावी रणनीति पर नजर डालें तो भारतीय जनता पार्टी ने अब इसमें बदलाव कर लिया है. पहले बीजेपी, उम्मीदवारों के आधार पर नहीं बल्कि प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की स्टार पावर और सिर्फ पार्टी के ब्रांड के आधार पर प्रचार करती थी. इस बार वह पहले ही मध्य प्रदेश में 60 फीसदी सीटों, छत्तीसगढ़ में 85-90 सीटों और राजस्थान में 20 फीसदी सीटों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा कर चुकी है.

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जैसे-जैसे कोई आम चुनाव से लेकर विधानसभा और नगरपालिका से लेकर पंचायत चुनाव तक की सीढ़ी चढ़ता जाता है, स्थानीय उम्मीदवार का महत्व बढ़ता जाता है. 2019 के आम चुनाव में 37 फीसदी मतदाताओं के लिए प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार सबसे महत्वपूर्ण कारक था.

वहीं, 35 फीसदी ने पार्टी के आधार पर और 25 फीसदी ने स्थानीय उम्मीदवार के आधार पर वोट किया. हालांकि, 2018 के राज्य चुनावों में, चार राज्यों के औसत से पता चला कि 39 प्रतिशत मतदाताओं के लिए, स्थानीय उम्मीदवार सबसे महत्वपूर्ण कारक थे. इसके बाद 35 प्रतिशत लोगों ने पार्टी को वोट दिया और 21 प्रतिशत लोगों ने नेतृत्व के आधार पर वोट किया.

सीट-दर-सीट चुनाव में, जहां भाजपा और कांग्रेस दोनों ही सीएम चेहरे का नाम देने से कतरा रहे हैं, स्थानीय उम्मीदवारों में उनकी छवि, किए गए काम, शिक्षा, दूरदर्शिता जैसे फैक्टर्स महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं.

4. जाति बनाम वर्ग:
इंडि गठबंधन पिछड़ों-वंचितों के वैज्ञानिक और लक्षित विकास के लिए जाति जनगणना को बड़ा चुनावी मुद्दा बना रहा है. इससे भाजपा के ओबीसी वोट बैंक में सेंध लगने की उम्मीद है. जबकि जाति भारत में चुनावों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. पिछले कुछ वर्षों में भाजपा ने गरीबों के लिए अपनी विभिन्न योजनाओं के माध्यम से एक वफादार श्रमिक वोट बैंक तैयार करते हुए भारतीय राजनीति में क्लास की राजनीति का तड़का दिया है.

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प्रधानमंत्री यह दावा करके कि गरीब उनके लिए सबसे बड़ी जाति और बिरादरी है. "जितनी आबादी, उतना हक" की मांग को बेअसर करने की कोशिश कर रहे हैं. जबकि मोदी ओबीसी समुदाय से आते हैं, वे अपनी गरीब और विनम्र पृष्ठभूमि को भी सामने रखते हैं. आज हर मतदाता की दोहरी पहचान है, एक जाति और एक सामाजिक-आर्थिक वर्ग, ये दोनों बूथ के फैसले को प्रभावित करते हैं.

5. मोदी फैक्टर:
भाजपा ने 2014 से (2016 में असम को छोड़कर) अपनाई गई अपनी रणनीति के अनुरूप, किसी भी राज्य में जहां वह विपक्ष में है: छत्तीसगढ़, तेलंगाना और राजस्थान में सीएम उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है. यहां तक ​​कि मध्य प्रदेश में भी, जहां वह सत्ता में है, उसने शिवराज सिंह चौहान को सीएम उम्मीदवार के रूप में पेश नहीं किया है. पार्टी मोदी के नाम पर वोट मांग रही है और स्थानीय उम्मीदवार कारक को भी ध्यान में रखते हुए संयुक्त राज्य नेतृत्व मॉडल पर चुनाव में जा रही है. क्या पीएम मोदी इन राज्यों में भाजपा को राहत दे सकते हैं जहां शुरुआती सर्वेक्षण उत्साहजनक तस्वीर नहीं दिखाते हैं?

2019 में, सीएसडीएस के चुनाव बाद के अध्ययन के अनुसार, भाजपा के 32 प्रतिशत समर्थकों ने मोदी के कारण पार्टी का समर्थन किया. इस साल अगस्त में जारी इंडिया टुडे मूड ऑफ द नेशन सर्वे के मुताबिक, अगर आज चुनाव हों तो 44 फीसदी मतदाता मोदी की वजह से बीजेपी को वोट देंगे. इसके उलट 2022 में मोदी के नाम पर सिर्फ आठ फीसदी ने वोट किया.

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मोदी फैक्टर ने उस पार्टी के लिए काफी अच्छा काम किया है जहां वह विपक्ष में थी: महाराष्ट्र, झारखंड, हरियाणा (2014), असम (2016), यूपी, उत्तराखंड, एचपी (2017), त्रिपुरा और कर्नाटक (2018). जहां पार्टी सत्ता में होती है, वहां राज्य सरकार के प्रदर्शन को प्राथमिकता दी जाती है. 2018 में तीन राज्यों - झारखंड (2019), हिमाचल प्रदेश (2022), और कर्नाटक (2023) में नुकसान यह दर्शाता है.

6. मतदाता का मूड:
मतदान वास्तव में एक भावनात्मक निर्णय है, जिसे उम्मीद और गुस्सा निर्देशित कर सकते हैं. जरूरी नहीं कि सभी फैसले ठीक से विचार किए हुए और तर्कसंगत हों. जब मतदाता मतदान केंद्र पर जाते हैं तो उनका मूड क्या होता है? चूंकि मतदान की तारीखें त्योहारी सीजन के दौरान पड़ती हैं, इसलिए मतदाता की आर्थिक स्थिति उनके मूड को निर्धारित कर सकती है.

अगस्त 2023 में इंडिया टुडे-सीवोटर मूड ऑफ द नेशन सर्वे में इस बात पर प्रकाश डाला गया कि कैसे अर्थव्यवस्था भाजपा के लिए एक समस्या बनकर उभर रही है. यह सभी राज्यों में बेरोजगारी और मुद्रास्फीति के शीर्ष मुद्दों में दिखाई देता है. संक्षेप में, राजनीतिक स्टॉक एक्सचेंज के लिए सी-वोटर की भविष्यवाणी के अनुसार कड़े चुनाव में, जहां विजेता और उपविजेता के बीच का अंतर बहुत कम है, ये एक्स फैक्टर निर्णायक के रूप में उभर सकते हैं.
Input: Amitabh Tiwari

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