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बैन ड्रग्स के लिए भारत में कितनी ज्यादा तलब? जाल में कैसे फंसते जा रहे युवा?

करीब 13 साल पहले संयुक्त राष्ट्र की एक ड्रग कंट्रोल बॉडी ने चेतावनी दी थी कि मशहूर हस्तियों के नशीली दवाओं के सेवन और इस बारे में अधिकारियों की लापरवाही समाज में बड़े पैमाने पर नशे की लत को बढ़ावा दे सकती है. इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ड्रग व्यापार को बढ़ावा मिलेगा.

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भारत में एक करोड़ से ज्यादा लोग ड्रग्स के शिकार (सांकेतिक-रॉयटर्स)
भारत में एक करोड़ से ज्यादा लोग ड्रग्स के शिकार (सांकेतिक-रॉयटर्स)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • देश में तीन करोड़ लोगों को कैनेबिस की लत
  • एक करोड़ से ज्यादा लोग लेते हैं सिडेटिव्स
  • 2017 में ड्रग्स से 22 हजार लोग भारत में मरे

मुंबई यानि मैक्सिमम सिटी... इस मायानगरी के ग्लैमर कॉरिडोर्स में बैन ड्रग्स का धड़ल्ले से इस्तेमाल कोई नई बात नहीं है. एक्टर सुशांत सिंह राजपूत की मौत ने बॉलीवुड वर्ल्ड में बड़े पैमाने पर अवैध ड्रग्स के इस्तेमाल को एक बार फिर से सुर्खियों में ला दिया है. जांच एजेंसियों के रडार पर बॉलीवुड का ड्रग्स कनेक्शन भी है, वहीं देश के लोग ये देखकर चकित हैं कि हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री में कितनी गहराई तक ड्रग पैडलर्स की पहुंच है. 

करीब 13 साल पहले संयुक्त राष्ट्र की एक ड्रग कंट्रोल बॉडी ने चेतावनी दी थी कि मशहूर हस्तियों के नशीली दवाओं के सेवन और इस बारे में अधिकारियों की लापरवाही समाज में बड़े पैमाने पर नशे की लत को बढ़ावा दे सकती है. इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ड्रग व्यापार को बढ़ावा मिलेगा.

2007 में इंटरनेशनल नारकोटिक्स कंट्रोल बोर्ड की रिपोर्ट में कहा गया, “सेलिब्रिटी ड्रग अपराधी सार्वजनिक रूप से नशीली दवाओं के दुरुपयोग के लिए लोगों को गहराई से प्रभावित कर सकते हैं, खासकर उन युवाओं को जो अभी तक ड्रग्स के मुद्दों पर दृढ़ और पूरी तरह से जागरूक नहीं हैं.” 

इस रिपोर्ट में कहा गया, “ड्रग्स लेने वाले सेलिब्रिटी अपराधियों से जुड़े केस न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता के बारे में आम लोगों की धारणाओं को गहराई से प्रभावित कर सकते हैं, खासकर अगर आम लोगों के साथ उसी तरह के अपराधों को लेकर ज्यादा सख्ती बरती जाए.” 

‘ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी 2017’ के आंकड़ों से पता चलता है कि 2017 में अवैध ड्रग्स ने दुनिया भर में करीब 7.5 लाख लोगों की जान ली. इनमें से 22,000 मौतें भारत में हुईं. समय से पहले होने वाली करीब 80 फीसदी मौतों के पीछे अवैध नशीली दवाओं का सेवन भी एक कारण है. कुछ अनुमानों के अनुसार, ग्लोबल ड्रग तस्करी का व्यापार 650 अरब डॉलर तक है.

भारत में नशीली दवाओं की खपत
भारत में 2018 में दर्ज किया गया कि ओपियोड (opioid) का इस्तेमाल करने वालों की संख्या करीब 2.3 करोड़ है. यह संख्या 14 सालों में 5 गुना बढ़ी है. इस दौरान हेरोइन की खपत में अधिकतम वृद्धि दर्ज की गई. 2004 में अफीम का इस्तेमाल करने वालों की संख्या (20,000) हेरोइन लेने वालों (9,000) की तुलना में दोगुनी थी. करीब 12 साल बाद ये रुझान उलट गया और हेरोइन यूजर्स की संख्या 2.5 लाख हो गई. ये संख्या अफीम यूजर्स की तुलना में करीब दोगुना है. 

इंडिया टुडे डेटा इंटेलीजेंस यूनिट (DIU) ने नेशनल ड्रग डिपेंडेंस ट्रीटमेंट सेंटर, AIIMS की मादक पदार्थों के सेवन पर एक रिपोर्ट का विश्लेषण किया और पाया कि भारत अवैध ड्रग्स के एक प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित हो गया है. इस रिपोर्ट में 10 से 75 वर्ष के आयुवर्ग के लोगों पर गौर किया गया है जो नशीली दवाओं की लत के शिकार हैं.

ड्रग कार्टेल के एक मजबूत नेटवर्क के जरिए भारत में पारंपरिक पौधों से बनी दवाओं जैसे कि कैनबिस, कोकीन और हेरोइन से लेकर ट्रामाडोल जैसी सिंथेटिक दवाओं तक की खपत कई गुना बढ़ी है. यूजर्स की संख्या के लिहाज से देखें तो भारत के अवैध ड्रग्स मार्केट में ज्यादातर कै​नबिस और ओपियोड का बोलबाला है. 

कैनबिस, पारंपरिक भांग का ही एक रूप है. भारत में भांग कानूनी रूप से वैध है, जबकि इसके अन्य रूप जैसे गांजा (मारिजुआना) और चरस (हशीश) गैरकानूनी हैं. ओपियोड को अफीम (डोडा, फुक्की या पॉपी हस्क), हेरोइन (ब्राउन शुगर, स्मैक) और फार्मा ओपियोड के रूप में बेचा जाता है. 

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की आबादी में करीब 2.8 फीसदी (3.1 करोड़) लोग भांग का इस्तेमाल करते हैं. इनमें से 1.3 करोड़ (1.2 प्रतिशत) लोग भांग के अवैध प्रोडक्ट जैसे गांजा और चरस का और बाकी भांग का इस्तेमाल करते हैं. कैनबिस के सबसे ज्यादा यूजर्स उत्तर प्रदेश, पंजाब, सिक्किम, छत्तीसगढ़ और दिल्ली में हैं. 

भारत में अवैध कैनबिस का उपयोग वैश्विक औसत की तुलना में बहुत कम- एक तिहाई से भी कम है. हालांकि, ओपियोड का इस्तेमाल वैश्विक औसत से तीन गुना ज्यादा है. एम्स के सर्वे के मुताबिक, 2018 में करीब 2.1 फीसदी आबादी (लगभग 2.3 करोड़) ओपियोड का इस्तेमाल कर रही थी. 

ओपियोड और नींद की दवा 
ओपियोड के कुल यूजर्स में से करीब 77 लाख या एक तिहाई से ज्यादा लोग नशे की खतरनाक श्रेणी में हैं. इस तरह के करीब एक तिहाई मामले उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली से हैं. उत्तर प्रदेश में करीब 10.7 लाख लोग बुरी तरह से लत के शिकार हैं, इसके बाद पंजाब (7.2 लाख), हरियाणा (5.9 लाख) और महाराष्ट्र (5.2 लाख) हैं. 

हालांकि, आबादी के प्रतिशत के लिहाज से देखें तो पूर्वोत्तर के राज्य इस सूची में टॉप पर हैं. मिजोरम की करीब 7 फीसदी आबादी ओपियोड का इस्तेमाल करती है, उसके बाद नगालैंड (6.5 फीसदी), अरुणाचल प्रदेश (5.7 फीसदी) और सिक्किम (5.1 फीसदी) हैं.

कई फार्मा प्रोडक्ट नींद लाने की दवा (sedative) के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं. भारत में करीब 1.08 करोड़ सिडेटिव यूजर्स हैं. इनकी सबसे ज्यादा संख्या उत्तर प्रदेश (19.6 लाख) में है, इसके बाद महाराष्ट्र (11.6 लाख), पंजाब (10.9 लाख) और आंध्र प्रदेश (7.4 लाख) में है. 

हालांकि, आबादी के प्रतिशत के रूप में देखें तो सिक्किम (8.6 प्रतिशत), नागालैंड (5.4 प्रतिशत) और मणिपुर (4.3 प्रतिशत) में इनकी प्रसार संख्या ज्यादा है. भारत में सिडेटिव का इस्तेमाल करने वाले करीब 11.8 लाख यूजर्स खतरनाक या ड्रग पर आश्रित की श्रेणी में हैं. 

सांस के जरिए नशा 
कुछ ड्रग्स यूजर सांस के जरिए साइकोएक्टिव ड्रग्स लेते हैं, जो दिमाग पर असर करती है. हालांकि ये संख्या बहुत कम है. ये नशा का ऐसा रूप है जो बच्चों में भी फैल रहा है. 0.58 फीसदी वयस्कों की तुलना में करीब 1.17 फीसदी बच्चे सांस के जरिये नशीली दवाइयों (Inhalants) का सेवन करते हैं. करीब 18 लाख वयस्क और 4.6 लाख बच्चे खतरनाक श्रेणी का नशा करते हैं. नशे की लत के शिकार सबसे ज्यादा बच्चे उत्तर प्रदेश (94,000), मध्य प्रदेश (50,000), महाराष्ट्र (40,000), दिल्ली (38,000) और हरियाणा (35,000) में हैं. 

कोकीन के भारत में करीब 10.7 लाख यूजर्स हैं. ये ऐसी अवैध ड्रग है जो भारत में कम लोकप्रिय है. बहुत महंगी होने के कारण इसका प्रयोग ज्यादातर अमीर लोग करते हैं. कोकीन के सबसे ज्यादा यूजर महाराष्ट्र (90,000), पंजाब (27,000), राजस्थान (10,000) और कर्नाटक (8,000) में हैं.

ओपियोड की तुलना में भारत में एटीएस (Amphetamine-type stimulants) का प्रयोग करने वाले भी काफी कम संख्या में हैं. भारत में एटीएस की प्रसार दर 0.18 फीसदी है यानी करीब 19.4 लाख लोग हैं जो इसका इस्तेमाल करते हैं. हालांकि, इनमें से 7 लाख लोग खतरनाक की श्रेणी में हैं. एटीएस के सबसे ज्यादा यूजर (5.3 लाख) महाराष्ट्र में हैं. 

इसके अलावा एक दूसरे कैटेगरी की दवा हॉल्यूसिनोजेन्स का इस्तेमाल भी एक सीमित सर्कल में किया जाता है. एम्स की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में इस श्रेणी के करीब 12.6 लाख यूजर हैं, जिनमें से एक-तिहाई खतरनाक श्रेणी में हैं. इसके सबसे ज्यादा यूजर महाराष्ट्र में (6 लाख) हैं, इसके बाद तेलंगाना (2 लाख), केरल (1 लाख) और दिल्ली (63,000) में हैं. 

रिपोर्ट कहती हैं कि भारत में इंजेक्शन से ड्रग्स (PWID) लेने वालों की संख्या करीब 8.5 लाख है. इनमें से करीब आधे (46 फीसदी) हेरोइन का इंजेक्शन लेते हैं, जबकि इतने ही लोग इंजेक्शन से ओपियोड का इस्तेमाल करते हैं. कुछ संख्या में लोग नींद की दवा या केटामाइन का इंजेक्शन लेते हैं. 

कोरोना का असर और ड्रग्स का बाजार 

कोरोना महामारी की वजह से लगाए गए लॉकडाउन ने ड्रग्स की सप्लाई को बाधित किया है. प्रयागराज (इलाहाबाद) के केल्विन अस्पताल में न्यूरोसाइकिऐट्रिक डॉ राकेश पासवान ने इंडिया टुडे को बताया कि महामारी और इसके चलते लागू हुए लॉकडाउन ने अवैध ड्रग्स के बाजार पर तगड़ा प्रहार किया है. 

डॉ पासवान ने कहा, “अवैध दवाओं का बाजार बाधित हुआ है और ड्रग्स का इस्तेमाल करने वाले सिंथेटिक ड्रग्स जैसे विकल्पों का सहारा ले रहे हैं. उदाहरण के लिए, वे नेल पेंट रिमूवर से रुमाल भिगोकर सांस के जरिए खींचते हैं.” 

कम सप्लाई की वजह से ड्रग्स में खूब मिलावट की जा रही है. उन्होंने बताया, “यहां तक कि लॉकडाउन में ढील के बाद हमारे पास ज्यादा केस आ रहे हैं, क्योंकि नौकरियां जाने और अस्थिरता की वजह से लोग तनाव में हैं.” 

आर्थिक संकट के चलते नौकरियां जाने और करियर में अस्थिरता ने युवा पीढ़ी के लिए तनाव का माहौल पैदा कर दिया है. कई लोग ड्रग्स के जरिए तनाव से मुक्त होने के लिए सहारा ढूंढते हैं और अक्सर वे खतरनाक ढंग से इसके चंगुल में फंस जाते हैं. 

यूनाइटेड नेशंस ऑफिस ऑन ड्रग्स एंड क्राइम (UNODC) के कार्यकारी निदेशक Ghada Waly का कहना है, “कोरोना संकट और आर्थिक मंदी ने ड्रग के खतरों को और भी बढ़ा दिया है. वह भी ऐसे समय जब हमारी स्वास्थ्य और सामाजिक प्रणाली पर संकट है और समाज इससे संघर्ष कर रहा है.”

 

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