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'एक आधार पर सभी धर्म में हो तलाक' की मांग वाली याचिका पर SC ने केंद्र को भेजा नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने सभी धर्मों के लिए तलाक का एक आधार किए जाने की म़ांग वाली याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है. केंद्र सरकार के जवाब के बाद सुप्रीम कोर्ट आगे की सुनवाई करेगी.

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सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)
सुप्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • बीजेपी नेता अश्विनी उपाध्याय की याचिका
  • SC ने केंद्र को नोटिस भेजकर मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने सभी धर्मों के लिए तलाक का एक आधार किए जाने की म़ांग वाली याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है. याचिका में मांग की गई है कि देश के सभी नागरिकों के लिए संविधान की भावना के अनुरूप तलाक का एक आधार हो. केंद्र सरकार के जवाब के बाद सुप्रीम कोर्ट आगे की सुनवाई करेगी.

मौजूदा परिस्थितियों में हिंदू, बौद्ध, सिख और जैन समुदाय के लोगों को हिंदू मैरिज एक्ट के तहत तलाक मिलता है, जबकि मुस्लिम, पारसियों, ईसाइयों के अपने पर्सनल लॉ हैं. इसके चलते बहुत सारे आधार मसलन बाल विवाह, कोढ़, नपुंसकता, कम उम्र में शादी जैसे आधार हिंदू मैरिज एक्ट के अंतर्गत बनते हैं, वो बाकी धर्म के पर्सनल लॉ में नहीं हैं.

क्या है याचिका
बीजेपी नेता और वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करके मांग की है कि तलाक और पति-पत्नी के बीच विवाद के दौरान मिलने वाले गुजारा भत्ता पर एक समान कानून बने. तलाक लेने के लिए क्या आधार होगा ये भी सब के लिए सामान होना चाहिए.

बीजेपी नेता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने अपनी याचिका में केंद्रीय गृह और कानून मंत्रालयों को यह निर्देश देने की अपील की है कि वे भरण-पोषण और गुजारा भत्ता के आधारों में मौजूदा विसंगतियों को दूर करने के लिए उचित कदम उठाएं और इन्हें धर्म, जाति, नस्ल, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव किए बिना सभी नागरिकों के लिए समान बनाएं.

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सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की वकील वकील मीनाक्षी अरोड़ा ने कहा कि भरण-पोषण और गुजारा भत्ता आजीविका का एकमात्र स्रोत होता है, इसलिए धर्म, जाति, नस्ल, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन के अधिकार, स्वतंत्रता व गरिमा के अधिकार पर सीधा हमला है.

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता से पूछा कि आप क्या पर्सनल लॉ को खत्म या दरकिनार करना चाहते हैं? CJI एसए बोबड़े के इस सवाल पर याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय का जवाब था कि वो संविधान के प्रावधानों के मुताबिक समानता चाहते हैं. सरकार कानून बनाकर ऐसा कर सकती है.

 

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