सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को पाकिस्तान में भारत का जासूस होने का दावा करने वाले एक शख्स को 10 लाख रुपये की आर्थिक मदद करने का निर्देश दिया. इसके साथ ही 75 वर्षीय याचिकाकर्ता को उसकी सेवा अवधि का बकाया वेतन और पेंशन आदि का लाभ देने का भी आदेश दिया.
याचिकाकर्ता ने कोर्ट के सामने दावा किया कि देश के लिए उसने जो किया उसके लिए उसे डाक विभाग में अपनी नौकरी भी गंवानी पड़ी थी क्योंकि वो लंबे समय तक देश से बाहर था. वो पाकिस्तानी सेना में भारत का अंडर कवर एजेंट था. पाकिस्तान में उसे 1970 में गिरफ्तार कर उस पर सैन्य अदालत में मुकदमा भी चलाया गया था.
पाकिस्तान में सुनाई गई थी 14 साल की सजा
चीफ जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस एस रविंद्र भट्ट की पीठ के सामने याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि वो जयपुर में रेल डाक सेवा का मुलाजिम था. उसे विशेष खुफिया ब्यूरो ने 1974 में देश के लिए पाकिस्तान मिशन पर जाने की पेशकश की. वो दो बार इस मिशन पर गया. पहली बार तो काम पूरा कर लौट भी आया, लेकिन दूसरी बार पाक रेंजर्स ने उसे 1976 की सर्दियों में 12 दिसंबर को पकड़ लिया. पाकिस्तान में ऑफिस सीक्रेट एक्ट के तहत उसके खिलाफ मुकदमा चला. दो साल चली सुनवाई के बाद सैन्य अदालत ने उसे 14 साल कैद की सजा सुनाई.
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछे सवाल
पीठ ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल से कहा कि सरकार ने उसके लिए कुछ क्यों नहीं किया. इस बारे में सरकार क्या सफाई दे रही है? सरकार ने उसे मिशन पर भेजा और चार साल बाद नौकरी से ये इल्जाम लगाकर हटा दिया कि बिना सूचना के वो लंबे समय तक गैर हाजिर रहा. याचिकाकर्ता के वकील ने दूतावास के साथ किए गए अपने पत्र व्यवहार की प्रतियां भी अदालत को दिखाईं. उसने पीठ को ये भी बताया कि भाई को लिखी ये चिट्ठियां गवाह हैं कि वो पाकिस्तान की जेल में बंद रहा.