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पत्नी से पैसे का हिसाब मांगना क्रूरता नहीं है, दहेज उत्पीड़न मामले पर सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी

यह मामला एक ऐसे दंपति से जुड़ा था, जो आपसी मतभेदों के चलते अलग रह रहे थे. पति-पत्नी को नियमित रूप से आर्थिक सहायता देता था, लेकिन जब उसने उस राशि के खर्च का विवरण मांगा तो पत्नी ने इसे मानसिक उत्पीड़न बताते हुए पति और उसके परिवार के खिलाफ धारा 498A और दहेज उत्पीड़न के आरोपों में एफआईआर दर्ज करा दी.

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दहेज उत्पीड़न के मामले पर क्या बोला सुप्रीम कोर्ट (Photo: PTI)
दहेज उत्पीड़न के मामले पर क्या बोला सुप्रीम कोर्ट (Photo: PTI)

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि पति द्वारा पत्नी से खर्च किए गए पैसों का हिसाब मांगने को क्रूरता नहीं माना जा सकता. अदालत ने कहा कि आपराधिक मुकदमेबाजी किसी से हिसाब चुकता करने या निजी दुश्मनी निकालने का जरिया नहीं बन सकती.

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने गुरुवार को यह टिप्पणी दहेज उत्पीड़न और क्रूरता के एक मामले को रद्द करते हुए की. इस मामले में पत्नी ने पति पर आरोप लगाया था कि वह घर के खर्चों का एक-एक पैसे का हिसाब रखने को मजबूर करता है.

सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें एफआईआर खारिज करने से इनकार किया गया था. इसे रद्द करते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि पति की कथित आर्थिक या वित्तीय प्रधानता, विशेष रूप से तब जब उससे कोई ठोस मानसिक या शारीरिक नुकसान साबित न हो, क्रूरता की श्रेणी में नहीं आती.

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अदालत ने यह भी माना कि खर्च और पैसों को लेकर विवाद वैवाहिक जीवन की रोजमर्रा की खींचतान का हिस्सा हो सकते हैं और हर ऐसे विवाद को आपराधिक मुक़दमे का रूप नहीं दिया जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि आपराधिक कानूनों का इस्तेमाल निजी बदले या हिसाब चुकता करने के लिए नहीं होना चाहिए.

अदालत के अनुसार, वैवाहिक मामलों में आरोपों की जांच बेहद सावधानी और व्यावहारिक दृष्टिकोण से की जानी चाहिए, ताकि कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग न हो और न्याय का हनन न हो. कोर्ट ने पत्नी के आरोपों को सामान्य, अस्पष्ट और दुर्भावनापूर्ण मंशा से प्रेरित पाया तथा कहा कि ऐसे आरोपों के आधार पर पति के खिलाफ कोई आपराधिक अपराध सिद्ध नहीं होता.

हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस फैसले का असर पति-पत्नी के बीच चल रही या भविष्य में चलने वाली अन्य वैवाहिक कार्यवाहियों जैसे तलाक, भरण-पोषण या घरेलू हिंसा के मामलों पर नहीं पड़ेगा. ऐसे सभी मामले अपने-अपने तथ्यों और कानून के अनुसार तय किए जाएंगे.

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