supreme court सुप्रीम कोर्ट में आज अरावली, स्ट्रे डॉग्स, सोनम वांगचुक की रिहाई और बांके बिहारी मंदिर से जुड़े मामले पर सुनवाई है. सुप्रीम कोर्ट अरावली की सटीक परिभाषा और अरावली पहाड़ियों के संरक्षण को लेकर सुनवाई करेगा. पूर्व वन अधिकारी आरपी बलवान की याचिका पर होने वाली यह सुनवाई हरियाणा और आसपास के क्षेत्रों में पर्यावरण के लिहाज से काफी अहम मानी जा रही है.
सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के मामले का स्वतः संज्ञान लिया था. सुप्रीम कोर्ट आवारा कुत्तों के काटने की घटनाओं और रेबीज के बढ़ते मामलों का संज्ञान लेकर सुनवाई कर रहा है. इस मामले में बड़ी संख्या में आवेदन कोर्ट को मिले हैं. इस पर कोर्ट ने कहा था कि इतने आवेदन तो इंसानों के केस में भी नहीं आते.
स्कूल, अस्पताल और रेलवे स्टेशनों जैसे सार्वजनिक स्थलों पर सुरक्षा और पशु कल्याण के संतुलन को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है. इस मामले में तीन जजों की विशेष बेंच सुनवाई कर रही है.
सुप्रीम कोर्ट में खड़े होकर एक याचिकाकर्ता ने 90 साल के व्यक्ति की तस्वीर दिखाई, जिनकी कथित रूप से आवारा कुत्तों के हमले में आई चोट के कारण मौत हो गई थी. याचिकाकर्ता ने कहा कि देखिए, जब आवारा कुत्ते हमला करते हैं, तब यही होता है. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तस्वीर दिखाने की कोई जरूरत नहीं है, आप दलीलें शुरू कीजिए. वकील ने कहा कि आवारा कुत्तों के कारण लोग परेशान हैं और मानवाधिकारों की रक्षा जरूरी है. उन्होंने तर्क दिया कि जापान और अमेरिका में ड्रामबॉक्स किल शेल्टर होते हैं. वहां लोग कुत्तों को सड़कों पर नहीं छोड़ते, शेल्टर होम्स में भेज दिए जाते हैं. यदि छोड़े गए कुत्तों को गोद नहीं लिया जाता, तो उन्हें यूथेनेशिया (दया-मृत्यु) दी जाती है. यही कारण है कि जापान में आवारा कुत्तों की समस्या नहीं है और 1950 से अब तक रेबीज से किसी की मौत नहीं हुई है. सुप्रीम कोर्ट में अब इस मामले पर अगली सुनवाई 8 जनवरी को होगी.
जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि समस्या केवल कुत्तों के काटने तक सीमित नहीं है. कुत्तों के कारण होने वाले खतरे और दुर्घटनाएं भी गंभीर मुद्दा हैं. उन्होंने कहा कि सुबह के समय कौन सा कुत्ता किस मूड में है, यह किसी को नहीं पता. उन्होंने रोकथाम पर जोर देते हुए कहा कि सिर्फ व्यवहार के आधार पर खतरनाक कुत्तों की पहचान करना संभव नहीं है. इससे सड़कों पर गलियों में आवारा कुत्तों की आबादी को नियंत्रित करने की चुनौती उजागर होती है.
सुप्रीम कोर्ट ने सिब्बल से एसओपी दिखाने के लिए कहा और यह भी जोड़ा कि एसओपी में नियमों का उल्लंघन कैसे हुआ है, यह दिखाइए. कपिल सिब्बल ने कहा कि नया एसओपी किसी भी वेटरनरी अस्पताल को नसबंदी और टीकाकरण की अनुमति देता है. जबकि एबीसी नियमों के अनुसार किसी भी एबीसी शेल्टर के लिए निर्धारित मानकों का पालन और एडब्ल्यूबीआई से प्रमाणित होना अनिवार्य है. उन्होंने कहा कि एबीसी नियमों में प्रति कुत्ता अनिवार्य फ़्लोर स्पेस और बाड़े के आकार का प्रावधान है. नया एसओपी इन मानकों को कम कर देता है, जो नियमों का उल्लंघन है.
कपिल सिब्बल ने कहा कि सभी कुत्तों को शेल्टर में रखना संभव नहीं है. आर्थिक रूप से भी यह व्यावहारिक नहीं है और यह इंसानों के लिए भी खतरनाक हो सकता है. उन्होंने सुझाव दिया कि वैज्ञानिकों को शामिल कर एक समिति बनाई जानी चाहिए, जो वैकल्पिक समाधान सुझा सके. क्योंकि हमारे पास आवश्यक डोमेन ज्ञान नहीं है. उन्होंने दोहराया कि मुख्य समस्या यह है कि एबीसी नियमों का पालन नहीं हो रहा. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नियम सभी राज्यों के लिए हैं. हमें लगातार निगरानी रखनी होगी. यह सुनिश्चित करना होगा कि इनका पालन हो. कोर्ट ने कहा कि आज सभी को धैर्यपूर्वक सुना जा रहा है, क्योंकि वकीलों और एक्टिविस्ट की यह शिकायत रही है कि उन्हें पहले नहीं सुना गया. कपिल सिब्बल ने कहा कि पशु कल्याण बोर्ड ने कोर्ट के आदेश पर एक नई एसओपी तैयार की है, जो एबीसी नियमों के विपरीत है.
सुप्रीम कोर्ट ने सिब्बल की दलील पर कहा कि रेलवे इंफ्रारेड ट्रैकिंग पर काम कर रहा है, यह खबर पढ़े हैं. कपिल सिब्बल ने यह माना कि बच्चों पर हमले की घटनाएं बेहद हृदयविदारक हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मसला सिर्फ काटने का नहीं है. कुत्ते जब बाइक या साइकिल सवारों का पीछा करते हैं, तो वह भी खतरनाक होता है और हादसों का कारण बन सकता है. कपिल सिब्बल ने कहा कि इसका मतलब यह नहीं कि सभी कुत्तों को पकड़ लें. जो कुत्ते हमला कर रहे हैं, उनकी पहचान की जा सकती है. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि सड़कें कुत्तों से साफ और सुरक्षित होनी चाहिए. हम यह नहीं कह रहे कि उन्हें मार दिया जाए, हम कह रहे हैं कि उन्हें शेल्टर में रखा जाए. हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि सभी नगर निगम और स्थानीय निकाय एबीसी नियमों का पालन करें. क्रमिक निगरानी के साथ संख्या अपने आप कम होगी.
कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में यह दलील दी कि आर्थिक दृष्टि से यदि समुदाय कुत्तों की देखभाल करता है, तो राज्य को यह जिम्मेदारी नहीं उठानी पड़ती. जहां समुदाय कुत्तों की देखभाल करता है, वहां काटने की घटनाएं कम होती हैं. प्रकृति यह सुनिश्चित करती है कि मनुष्य और पशु साथ रहें. अगर उन्हें चोट पहुंचाई जाएगी, तो वे काटेंगे. यह सिर्फ कुत्तों तक सीमित नहीं है. उन्होंने कहा कि अपनी दलील पूरी करनी है और फिर सोनम वांगचुक से जुड़े एक समान मामले में जाना है. इस पर बेंच ने पूछा कि क्या आप यहां कुत्तों की Preventive Detention के खिलाफ बहस कर रहे हैं? कपिल सिब्बल ने इस पर कहा कि देश भर में विभिन्न पशुओं के साथ मानव–पशु संघर्ष हो रहा है. उन्होंने उदाहरण दिया कि हाल ही में तमिलनाडु में हाथियों की मौत का मामला सामने आया था.
नोएडा की पीड़ित बच्ची के पिता ने आरोप लगाया कि नोएडा प्राधिकरण आवारा कुत्तों से जुड़ी शिकायतों पर कोई कार्रवाई नहीं कर रहा है. उन्होंने यह डिमांड भी की है कि आरडब्ल्यूए को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वह सोसाइटी को नो डॉग जोन घोषित कर सके. वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा हम यहां कुत्ता प्रेमी, पर्यावरण प्रेमी के रूप में आए हैं. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि अन्य जानवरों का क्या? मुर्गियों और बकरियों का क्या? क्या उनकी जान, जान नहीं है? इस पर सिब्बल ने कहा कि मैंने चिकन खाना बंद कर दिया है, क्योंकि उन्हें बेहद क्रूर तरीके से पिंजरों में रखा जाता है. लेकिन अगर एक बाघ आदमखोर हो जाए तो इसका मतलब यह नहीं कि सभी बाघ आदमखोर मानकर मार दिए जाएं. उन्होंने कहा कि दुनिया भर में 'कैच–स्टेरिलाइज–वैक्सीनेट–रिलीज़ (CSVR)' मॉडल अपनाया जाता है और इससे शहरों में कुत्तों की आबादी लगभग शून्य तक आ गई है. यह मॉडल सफल रहा है.
सुप्रीम कोर्ट में स्ट्रे डॉग्स पर सुनवाई के दौरान एनिमल एक्टिविस्ट ने कहा कि हम सभी स्ट्रे डॉग्स को शेल्टर में रखने की बात कर रहे हैं. अगर कुत्ते गायब हो गए तो कचरे और बंदरों की समस्या का क्या होगा? पिछले वर्ष नोएडा में आवारा कुत्तों के हमले में घायल हुई आठ साल की मासूम के पिता ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि एक अन्य मामले में आठ साल के बच्चे की मौत हो गई थी.
राज्यों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दिए हलफनामे के मुताबिक 2691 आवारा मवेशियों को सड़कों से हटाकर गौशालाओं में भेजा गया है. हालांकि, हाईवे के उन हिस्सों का कोई डेटा नहीं दिया गया है जो आवारा मवेशियों के कारण संवेदनशील हैं. हलफनामे में यह भी स्पष्ट नहीं किया गया है कि कितने शेल्टर उपलब्ध हैं. एनएचएआई और पशुपालन विभाग के बीच समन्वय का विवरण भी हलफनामे में नहीं है. पकड़े गए मवेशियों को आखिर कहां ले जाया जा रहा है, यह सवाल भी उठा है.
स्ट्रे डॉग्स पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वकील ने कहा कि मेरे मुवक्किल एक वरिष्ठ नागरिक हैं, जिन्हें कुत्ते ने काटा है. उन्होंने कहा कि यहां कई कुत्ता प्रेमी मौजूद हैं, लेकिन हम कुत्तों के खिलाफ नहीं हैं. याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि आवारा कुत्तों पर नियंत्रण जरूरी है.
स्ट्रे डॉग्स पर सुनवाई के दौरान सॉलिसीटर जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में यह दलील दी है कि पूरा मुद्दा पशु प्रेमियों की बजाय केवल कुत्ता प्रेमियों के इर्द-गिर्द ही केंद्रित हो गया है. उन्होंने कहा कि गेटेड कॉलोनी में कुत्तों को घूमने दिया जाए या नहीं, यह फैसला आरडब्ल्यूए को करना चाहिए. सॉलिसीटर जनरल ने कहा कि दिक्कत यह है कि कई मामलों में 90 % निवासी कुत्तों को खतरनाक मानते हैं, लेकिन 10% लोग उन्हें रखने पर अड़े रहते हैं. उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अगर कल कोई कहे कि वह अपने घर में भैंस या गाय रखना चाहता है, तो उसका क्या होगा? सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि व्यक्तिगत, भावनात्मक या सहानुभूतिपूर्ण तर्कों की बजाय निर्णय आरडब्ल्यूए पर छोड़ा जाना चाहिए.
स्ट्रे डॉग्स के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है. सुप्रीम कोर्ट में एमिकस क्यूरी ने यह जानकारी दी है कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक और पंजाब समेत 10 राज्यों ने हलफनामा नहीं दिया है. राजस्थान और ओडिशआ ने हलफनामे देर से दाखिल किए, जिसकी वजह से उन्हें एमिकस नोट में शामिल नहीं किया जा सका. राज्यों ने हलफनामे में स्ट्रे डॉग्स को पकड़ने, जॉग पाउंड और एनिमल बर्थ कंट्रोल केंद्रों की पहचान से जुड़े अनुपालन आंकड़े बताए गए हैं.