सुप्रीम कोर्ट ने राजद्रोह कानून को लेकर चल रहे मामलों पर अहम निर्देश जारी किया है. अदालत ने कहा है कि देश की अदालतें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124-ए (राजद्रोह) से संबंधित पुराने मुकदमों की सुनवाई आगे बढ़ा सकती हैं. लेकिन ऐसा तभी किया जा सकेगा जब खुद आरोपी को इस सुनवाई पर कोई आपत्ति न हो.
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की तीन सदस्यीय पीठ ने ये आदेश सुनाया है. अदालत ने राजद्रोह के एक मामले में पिछले 17 सालों से जेल में बंद एक आरोपी की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया.
पीठ ने मामले की स्थिति को साफ करते हुए कहा, 'याचिकाकर्ता की शिकायत ये है कि अगर उसकी आपराधिक अपील पर धारा 124-ए के तहत लगाए गए आरोपों सहित पूरी सुनवाई की जाती है, तो उसे इस पर कोई आपत्ति नहीं है.'
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि जहां भी आरोपी को धारा 124-ए के तहत दायर चार्जशीट साथ मुकदमे, अपील या किसी अन्य अदालती कार्यवाही पर कोई आपत्ति नहीं है, वहां अदालतों को ऐसे मामलों का गुण-दोष और कानून के मुताबिक फैसला सुनाने में कोई रुकावट या बाधा नहीं होगी.
साल 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने लगाई थी रोक
11 मई 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए राजद्रोह से जुड़े इस पुराने कानून पर अंतरिम रोक लगा दी थी. अदालत ने इस दंडात्मक प्रावधान को तब तक के लिए स्थगित कर दिया था, जब तक कि केंद्र सरकार इस पुराने कानून की अपनी समीक्षा पूरी नहीं कर लेती.
पहले आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने साफ निर्देश दिया था कि देश भर में इस अपराध से संबंधित कोई भी नया मामला दर्ज न किया जाए. इसके साथ ही, पूरे देश में राजद्रोह कानून के तहत पहले से चल रही सभी जांचों, अदालतों में लंबित मुकदमों और सभी कानूनी कार्यवाहियों को तत्काल प्रभाव से स्थगित रखने के लिए कहा गया था.
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फिलहाल भारतीय दंड संहिता की धारा 124-ए के तहत इस अपराध की प्रासंगिकता और इसकी उपयोगिता को लेकर कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर जांच चल रही है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस नए आदेश के बाद, अब उन आरोपियों को राहत मिल सकेगी जो सालों से जेल में बंद हैं और अपने मुकदमों का जल्द से जल्द निपटारा चाहते हैं.
IPC की धारा 124-ए के बारे में
बता दें कि IPC की धारा 124-ए राजद्रोह से जुड़ा एक कानून है जो औपनिवेशिक काल से चला आ रहा है. इस कानून के तहत अगर कोई व्यक्ति सरकार के खिलाफ लिखित, मौखिक, संकेतों या दृश्यों के जरिए नफरत, अवमानना या विद्रोह भड़काने की कोशिश करता है, तो उसे राजद्रोह का दोषी माना जाता है. यह एक गैर-जमानती अपराध है, जिसमें दोषी पाए जाने पर तीन साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है.