जनवरी 1026 के शुरुआती दिन भारतीय इतिहास में दुखद यादों के रूप में दर्ज हैं. 6 जनवरी को, गजनी के सुल्तान महमूद सोमनाथ के तट पर पहुंचे, जहां प्राचीन और पूजनीय मंदिर हिंदू भक्ति और दृढ़ता का प्रतीक था. मंदिर की रक्षा करने वाले किले में ब्राह्मण और उत्साही भक्त तैनात थे, जो आक्रमणकारियों के हर हमले का जवाब देने को तैयार थे.
नाजिम मुहम्मद अपनी किताब, "The Life And Times Of Sultan Mahmud Of Ghazna" में लिखते हैं 'आखिरकार सोमनाथ नजर आने लगा. सुल्तान गुरुवार (6 जनवरी, 1026) को वहां पहुंचे और उन्होंने समुद्र तट पर निर्मित एक मजबूत किला देखा. इसकी प्राचीरें अविश्वासी ब्राह्मणों से भरी हुई थीं, जो आक्रमणकारियों का उपहास कर रहे थे और दावा कर रहे थे कि शक्तिशाली सोमेश्वर ने भारत के देवताओं के अपमानों का बदला लेने के लिए मुसलमानों को वहां बुलाया था. हालांकि, किले का सेनापति, संभवतः आक्रमणकारियों का सामना करने की अपनी क्षमता और उन्हें नष्ट करने के लिए मूर्ति (शिवलिंग) से मिलने की शक्ति दोनों के प्रति शंका में था, इसलिए वह एक द्वीप पर भाग गया और सुल्तान के देश छोड़ने तक वापस नहीं लौटा.'
7 जनवरी को, धार्मिक उत्साह और दृढ़ संकल्प से प्रेरित रक्षकों ने हमले का डटकर मुकाबला किया. मुस्लिम सेनाओं के निरंतर हमले से बुरी तरह प्रभावित होने के बावजूद, हिंदुओं ने वीरतापूर्ण जवाबी हमला किया और आक्रमणकारियों को अस्थायी रूप से खदेड़ दिया.
7 जनवरी 1026 की तारीख, जब श्रद्धालुओं के जत्थे पर हुआ तीरों से हमला
नाजिम मुहम्मद लिखते हैं कि 'सुल्तान ने सोमनाथ किले को घेर लिया. ब्राह्मणों और शिवभक्तों की सहायता से किले की सेना ने कट्टरपंथियों के साहस और हताशा के साथ किले की रक्षा की, लेकिन अगली सुबह, शुक्रवार (7 जनवरी) को मुसलमानों ने उन पर तीरों की इतनी घातक बौछार की कि उन्हें प्राचीरों पर अपनी चौकियां छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा. दोपहर में, जुमे की नमाज के समय के आसपास, मुसलमानों ने किले की दीवारों पर चढ़कर अजान देकर अपनी जीत की घोषणा की.
हिंदू मंदिर में प्रवेश कर गए, मूर्ति (शिवलिंग) के सामने झुक गए, उससे विजय की प्रार्थना की और नई आशा और साहस के साथ अपने हमलावरों पर एक जोरदार हमला किया. मुसलमान इस भयंकर हमले से स्तब्ध रह गए और शाम होने से पहले ही हिंदुओं ने उन्हें उस स्थान से खदेड़ दिया जिस पर उन्होंने कब्जा कर लिया था.'

हालांकि, 8 जनवरी को युद्ध और भी तेज हो गया. हमलावर और भी अधिक बल और सामरिक दक्षता के साथ लौटे, उन्होंने किलेबंदी पर कब्जा कर लिया और रक्षकों को मंदिर के द्वार तक खदेड़ दिया. इसके बाद एक खूनी और भयंकर संघर्ष हुआ, जिसमें हिंदू योद्धाओं की टुकड़ियों ने मूर्ति (शिवजी) का आशीर्वाद लेकर दुश्मनों पर जोरदार हमला बोल दिया.
अनुमान है कि सोमनाथ की रक्षा के इन वीर प्रयासों में 50,000 से अधिक हिंदुओं ने अपने प्राणों की आहुति दी. अपने साहस और कट्टरता के बावजूद, रक्षक सुल्तान महमूद की सेनाओं की रणनीतिक क्षमता और शक्ति का सामना नहीं कर सके. सुल्तान ने मंदिर में प्रवेश किया, मूर्ति (शिवलिंग) को विकृत करके और उसके अवशेषों को जलाकर उसका अपमान किया, कथित तौर पर 2 करोड़ दीनार के खजाने को लूटा और मंदिर को राख में बदल दिया.
मंदिर परिसर और किले में हुआ भीषण रक्तपात
नाजिम मुहम्मद ने अपनी पुस्तक "सुल्तान महमूद ग़ज़ना का जीवन और समय" में लिखा है 'अगली सुबह, शनिवार (8 जनवरी, 1026), मुसलमानों ने और भी अधिक जोश के साथ हमला दोहराया, किले पर कब्जा कर लिया और हिंदुओं को मंदिर के द्वार तक खदेड़ दिया, जहां भयानक झड़प हुई. हिंदुओं के समूह मंदिर में प्रवेश करते, मूर्ति (शिवलिंग) से सहायता के लिए भावभीनी प्रार्थना करते और फिर हमलावरों पर टूट पड़ते. लेकिन हिंदू कट्टरता मुस्लिम शौर्य और कुशल सेनापति के आगे कुछ भी नहीं थी. सुल्तान ने अपने लाभ का फायदा उठाते हुए किले पर कब्जा कर लिया. इसके बाद भीषण रक्तपात और नरसंहार हुए.
कहा जाता है कि कम से कम 50,000 भक्तों ने अपने देवता की रक्षा में अपने प्राणों की आहुति दे दी. बचे हुए लोगों ने नावों में भागने की कोशिश की, लेकिन सुल्तान द्वारा समुद्र तट पर तैनात पहरेदारों ने उनका पीछा किया और उन्हें डुबो दिया या मार डाला. अब सुल्तान मंदिर में दाखिल हुआ. जब उसने मूर्ति को देखा, तो उसने कुल्हाड़ियों से उसके ऊपरी हिस्से को विकृत करने का आदेश दिया और इसके चारों ओर आग लगाई गई ताकि यह छोटे-छोटे टुकड़ों में टूट जाए. फिर मंदिर को उसकी संपत्ति से वंचित कर दिया गया, जो कहा जाता है कि 20,000,000 दीनार थी, और उसे जलाकर राख कर दिया गया.
सोमनाथ का पतन एक दुखद अध्याय बना हुआ है, जो न केवल एक पवित्र स्थल के खोने का प्रतीक है, बल्कि आक्रमणों से अपने धर्म की रक्षा के लिए हजारों हिंदुओं द्वारा किए गए अदम्य बलिदानों का भी प्रतीक है. 6, 7 और 8 जनवरी 1026 की घटनाएं भारत के उथल-पुथल भरे इतिहास में दुखद याद की तरह हैं. जो भक्ति और विजय की अनमोल कीमत के बारे में सोचने के लिए आज भी मजबूर करती हैं.