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दिल्ली अगले दो हफ्ते में ले सकेगी साफ हवा में सांस, जल्दी बंद होगा पराली जलना

पंजाब के कृषि अधिकारियों का कहना है कि 95 फीसदी तक धान की कटाई हो चुकी है और बाकी एक हफ्ते में पूरी हो जाएगी.

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जल्दी बंद होगा पराली जलना (सांकेतिक फोटो)
जल्दी बंद होगा पराली जलना (सांकेतिक फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • खेतों में लगाई जाने वाली आग अब नियंत्रित
  • 15 दिन के बाद पराली जलाने की कोई घटना नहीं होगी
  • राजधानी दिल्ली जल्द साफ हवा में ले सकेगी सांस

दिल्ली वालों के लिए आखिरकार कुछ अच्छी खबर है. धान की कटाई का मौसम पंजाब और अन्य उत्तर भारतीय राज्यों में खत्म हो रहा है. इसके मायने हैं कि अब खेतों में पराली नहीं जलाई जाएगी और देश की राजधानी जल्दी ही साफ हवा में सांस ले सकती है. 

पंजाब के कृषि अधिकारियों का कहना है कि 95 फीसदी तक धान की कटाई हो चुकी है और बाकी एक हफ्ते में पूरी हो जाएगी. अधिकारियों के मुताबिक शेष पांच प्रतिशत फसल जो अभी कटनी है, उसमें पूसा जैसी देर से पकने वाली किस्में शामिल हैं. इससे संकेत मिलता है कि अगले 15 दिन के बाद पराली जलाने की कोई घटना नहीं होगी.  

किसान भी इस पर सहमति जताते हैं. बुजुर्ग किसान नेता बलबीर सिंह राजेवाल ने आजतक से कहा, “धान की कटाई का मौसम लगभग खत्म हो चुका है. बचे हुए खेतों को एक हफ्ते में साफ कर दिया जाएगा.”  

मौसम विभाग भी आशान्वित है. चंडीगढ़ मौसम विभाग के एक अधिकारी ने कहा, “दिवाली की बारिश के बाद वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) में सुधार शुरू हुआ है. पराली जलने की घटनाओं में भी कमी आई है. इससे हवा की क्वालिटी और सुधरेगी.”  

पंजाब में प्रशासन ने कृषि क्षेत्र में कार्यरत विभिन्न गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) के साथ टाई अप किया है जिससे कि पराली को बायो फ्यूल (जैव-ईंधन) में तब्दील करने के तरीकों को आजमाया जा सके. ये प्रक्रिया कुछ किसानों की ओर से अपनाई गई है और इससे पराली जलाना कम किया जा सका है. 

5-15 नवंबर की ताजा सैटेलाइट तस्वीरों से भी पता चलता है खेतों में लगाई जाने वाली आग संभवत: नियंत्रित की जा चुकी है. मुख्य तौर पर पंजाब में ये आग इतनी बड़ी होती थी कि 30 किलोमीटर की ऊंचाई से भी नंगी आंख से देखी जा सकती थी.   

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मिसाल के लिए, पंजाब के पटियाला जिले के समाना शहर के पश्चिम में पिछले 10 दिनों में सैटेलाइट तस्वीरों से अच्छे बदलाव देखे गए हैं. इससे वायु प्रदूषण भी कम हुआ है. 

 

एनसीआर के ऊपर प्रदूषण 

पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली में खेतों की आग में कमी ने इस बेल्ट में प्रमुख शहरों में स्मॉग भी कम कर दिया है. पराली जलने से निकलने वाला धुआं, जो धीरे-धीरे खिसकता है, हवा के कारण दक्षिण-पूर्वी दिशा में बढ़ता है. यह प्रमुख शहरों की ऊंची इमारतों में फंस जाता है और खतरनाक स्थिति उत्पन्न करता है. विजिबिलिटी कम होने से सड़क, रेल और हवाई यात्रा समेत सभी तरह का यातायात प्रभावित होता है. 

पिछले 15 दिन के दौरान ली गई सैटेलाइट तस्वीरों से पता चलता है कि दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों में प्रदूषण का स्तर काफी कम हो गया है. 15 नवंबर की सैटेलाइट तस्वीर संकेत देती है कि कोहरा संभवतः दिवाली के पटाखों की वजह से था जो अस्थायी कारण है. 

बीते चार साल में इस साल सबसे ज्यादा जली पराली 

पंजाब सरकार ने दावा किया है कि धान की खेती के तहत क्षेत्र को कम किया गया है, और जल्दी पकने वाली धान की किस्मों और पराली प्रबंधन ने खेतों में आग की घटनाओं में कमी लाने में मदद की है. हालांकि, राज्य में 2017 के बाद से इस वर्ष सबसे अधिक पराली जलाने की घटनाएं सामने आईं. 

पंजाब ने 2016 में 80,879 पराली जलने की घटनाओं की सूचना दी, जो अगले साल 2017 में घटकर 43,660 रह गईं. 2018 में ऐसी 49,905 घटनाएं रिपोर्ट हुईं जो 2019 में फिर थोड़ा बढ़कर 51,946 हो गईं. इस साल,  पंजाब में 21 सितंबर से 17 नवंबर के बीच 74,236 पराली जलने के मामले सामने आए जो 2016 के आंकड़ों से कम है, लेकिन पिछले चार वर्षों में सबसे अधिक है. 

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के अधिकारियों का कहना है कि पराली जलने की घटनाएं 4-7 नवंबर के दौरान शीर्ष पर रहीं. सैटेलाइट डेटा ने 5 नवंबर को अधिकतम खेतों में 4,135 आग की घटनाओं को दिखाया.  

पंजाब रिमोट सेंसिंग सेंटर की ओर से जारी 17 नवंबर के फार्म फायर के आंकड़ों के मुताबिक मंगलवार को सिर्फ 248 ऐसी घटनाएं सामने आईं. मुक्तसर जिले में उस दिन 96 मामले दर्ज हुए, उसके बाद फाजिल्का (88), फिरोजपुर (28) और बठिंडा (22) का नंबर था. 

नासा की सैटेलाइट तस्वीरों ने चावल उत्पादक चार राज्यों पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में नवंबर के मध्य में 87,000 पराली जलने की घटनाओं का पता लगाया। 

पराली जलने की अधिक घटनाओं के पीछे क्या किसानों का गुस्सा? 

कई किसान नेताओं ने केंद्र सरकार की ओर से हाल में लागू किए तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के गुस्से को पराली जलने की अधिक घटनाओं के लिए जिम्मेदार ठहराया. 

राजेवाल कहते हैं, “इसमें कोई संदेह नहीं है कि केंद्र के तीन कृषि कानूनों के कारण किसानों में नाराजगी है. कई स्थानों पर, पराली को इन कानूनों पर विरोध जताने के लिए जलाया गया. कुछ जगह किसानों को राज्य सरकार की ओर से मुआवजा देने में विफलता के विरोध में भी जलाया गया.”


 

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