scorecardresearch
 

मैं वैरागी नहीं, आश्रम या कुटिया की बजाय शहर में रहना पसंद, 'सीधी बात' में बोलीं जया किशोरी

'आजतक' के खास कार्यक्रम 'सीधी बात' में कथावाचक जया किशोरी ने कहा, मेरा बचपन आम लोगों की तरह बीता. मैंने खेल-कूद किया. मुझे मनोरंजन पसंद है. अध्यात्म और धर्म पसंद है. मुझे तुलना करना पसंद नहीं है. आज तुलना के कारण ही युवा डिप्रेशन में जा रहा है. मैं शुरू से ही कहती हूं कि मैं साधु-संत नहीं हूं. साधु होना बहुत बड़ी पदवी है. मेरे अंदर ये चीज नहीं है.

Advertisement
X
कथावाचक जया किशोरी.
कथावाचक जया किशोरी.

Seedhi Baat with Jaya Kishori: फेमस कथावाचक और मोटिवेशनल स्पीकर जया किशोरी ने शनिवार को आजतक के खास कार्यक्रम 'सीधी बात' में सुधीर चौधरी के सवालों के जवाब दिए. उन्होंने बेहतर जीवन बिताने के लिए सकरात्मक अनछुए पहलुओं पर खुलकर बात की. जया किशोरी से पूछा गया कि उनकी पहचान किससे है- साध्वी, आध्यात्मिक गुरु, कथावाचक या सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर से? 

इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, सब-कुछ थोड़ा-थोड़ा. मेरी पहचान सबसे पहले कथावाचक के तौर पर होनी चाहिए. क्योंकि जब मैंने मोटिवेशन सेशन शुरू किए थे तो उसका बहुत कारण था युवाओं को धर्म से जोड़ना था. चूंकि, कथा सात दिन की होती है और 3-4 घंटे तक चलती है. आज के समय में युवाओं के लिए पॉसिबल नहीं होता उतना समय देना. उनकी प्रॉब्लम ने मुझे दूसरा रास्ता मोटिवेशनल का दिया था. सोशल मीडिया को लेकर कहा, प्रॉब्लम बहुत ज्यादा बढ़ गई है. श्रीमद्भागवत में तीन चीजें कहते हैं. सत, चित्त और आनंद. यानी सच्चिदानंद. आनंद ही भगवान हैं. जब आप जान जाते हैं कि सब कुछ टेम्परेरी है तो फिर लोग भगवान के पास आ जाते हैं.

'वैरागी के लिए नियम होते हैं'

जया किशोरी ने कहा, पूर्ण रूप से वैरागी के लिए माना गया है कि कुछ नियम होते हैं. अपनी छोटी सी कुटिया में रहना होता है. उनको किसी से लेना-देना नहीं होता है. लेकिन, अगर आप नहीं कर रहे हैं तो आप गृहस्थ में हैं तो मुझे बीच का रास्ता अपनाना अच्छा नहीं लगता. मुझे गुफा-कुटिया में नहीं रहना है. मुझे शहर में रहना है. इसलिए इस बात को मैं कभी छिपाकर नहीं रखती हूं.

Advertisement

'मेरे सेशन बहुत साधारण होते हैं'

उन्होंने कहा, कोई नियम नहीं होते हैं कि भगवान के पास आने के लिए यही करना होगा. ये जरूरी नहीं होता है. आप कमल बनकर यानी सबके बीच रहकर भी काम कर सकते हैं. उद्देश्य आपका सीखना है. मेरे सेशन बहुत साधारण होते हैं. उसका कारण है- लोगों तक नॉलेज पहुंचाना. मैंने जब शुरुआत की थी, तब कथाएं समझने में दिक्कत हुई थी. तब मैंने सोचा था कि जब मैं शुरू करूंगी तो बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक को कथा समझ में आए, इस तरह अपनी बात समझाऊंगी.

'हर व्यक्ति की जिंदगी अलग होती है'

क्या जया किशोरी अध्यात्म को लेकर कहीं से कोई ट्रेनिंग हासिल की है? इस पर उन्होंने कहा, मुझे तुलना करना पसंद नहीं है. यही एक कारण है कि आज का युवा डिप्रेशन में जा रहा है. आप तुलना करने लग जाते हैं. हर व्यक्ति अलग है. उसकी जिंदगी अलग है. उनकी जर्नी अलग है. मैं शुरुआत से ही कहा है कि मैं साधु-संत नहीं हूं. मैं अपने आपको उस पदवी पर नहीं डालती हूं. साधु के लिए बैलेंस माइंड होना जरूरी होती है. सुख-दुख कोई मायने नहीं रखता है. जब ये होता है, तभी वो माना जाता है कि साधु-संत है. 

Advertisement

'मैं 6 साल की उम्र से कथा सुना रही'

मैंने 6 साल की उम्र से काम करना शुरू कर दिया था. नए लोगों और नई जगह जाकर सीख रहे हैं. मुझे आज काम करने का अच्छा खासा समय हो गया है. करीब 21-22 साल से अपना काम कर रही हूं. अगर आप कर रहे हैं और नए-नए लोगों से मिल रहे हैं. नई जगहों पर जा रहे हैं तो आपको बहुत कुछ सीखने को मिल रहा है. आप जो सीख रहे हैं, वो लोगों तक जाना चाहिए.

प्रतिभा की ट्रेनिंग कहां से ली? उन्होंने कहा, मैंने पहली कथा- नानी बाई का मायरा, वो मैंने घर से शिक्षा ली. स्वामी रामसुखदास महाराज की कथाओं का सुना. मेरी कथाएं उनसे काफी हद तक मुलती जुलती हैं. मेरे पिता और दादा जी भी उनकी कथा सुनते थे.

'मेरे घर का माहौल धर्म मय रहा'

मैंने श्रीराम और कृष्ण की कहानियां सुनी हैं. ये रुचि बचपन से जागी है. मेरे घर का माहौल ही ऐसा रहा. मैंने श्रीमद्भागवत की शिक्षा ली है. पं विनोद जी सहल ने गुरु दक्षिणा ली है. उन्होंने ही मुझे श्रीमद्भागवत कथा सिखाई है. बचपन में मैंने 3 साल तक संगीत सीखा. मैं एक स्टूडेंट हूं. पढ़ रही हूं और सीख रही हूं. मेरी रुचि अभी सिर्फ भजनों में हैं. आगे के बारे में अभी सोचा नहीं है. 

Advertisement

देश का युवा Views और Followers के लिए जान भी देने को तैयार है. आपका कोई टारगेट ऑडियंस है? इस पर उन्होंने कहा, मेरा कोई टारगेट ऑडियंस नहीं है. मुझे ऐसा लगता है कि जिसे भगवान अच्छे लगते हैं, वो मेरी कथा में आए. जो नकरात्मकता से दुखी हैं, उसे 3-4 घंटे में खुशी हो रही है, वो आकर कथा सुने. मैं ये नहीं कहती कि मेरी कथा को लेकर कोई टारगेट ऑडियंस है. मेरी कथा का उद्देश्य अध्यात्म से है.

रील्स और फॉलोअर्स के जमाने में...

उन्होंने कहा, आपका फाउंडेशन होना चाहिए. लोग व्यूज के पीछे भाग रहे हैं. कंटेंट पर ध्यान नहीं दे रहे हैं. कुछ लोग आज ये सब चीजें नहीं देख रहे हैं. हालांकि, कुछ लोग इन बातों को ध्यान में रखते हैं. मैं यह कह सकती हूं कि व्यूज के पीछे मत भागिए. कंटेंट को ध्यान में रखकर काम कीजिए. मेरा व्यूज मोटिव कभी नहीं होता है. मेरी पहली दुनिया कथा है. मैं ये ध्यान रखती हूं कि ज्यादातर लोगों तक अच्छी बात पहुंचे. दूसरे की लाइफ में क्या फर्क पड़ेगा, इस पर काम करना चाहिए.

कथा या प्रवचन को किस तरह तैयार करती हैं? उन्होंने कहा, कथा और कहानियों को लेकर ज्यादा तैयारियों की जरूरत नहीं पड़ती है. हर जगह नया नहीं हो सकता है. बीच-बीच में नई-नई किताबें पढ़ते रहते हैं.

Advertisement
Advertisement