राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने लाल किले हमले के आंतकी आरिफ की दया याचिका खारिज कर दी है. 25 जुलाई 2022 को पदभार ग्रहण करने के बाद ऐसा दूसरी बार है जब राष्ट्रपति ने किसी की दया याचिका खारिज की है. सुप्रीम कोर्ट ने 3 नवंबर 2022 को आरिफ की पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दी थी. कोर्ट ने उसके अपराध के लिए उसकी मौत की सजा को बरकरार रखा था.
हालांकि अब उसके लिए सजा पर अमल का रास्ता साफ हो गया है. कानून के जानकारों के मुताबिक, मौत की सजा तय हुए अपराधी के पास संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सजा सुनाए जाने में लंबे समय तक हुई देरी के आधार पर अपनी सजा में कमी के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है.
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आरिफ की याचिका पर 27 मई को हुआ था विचार
राष्ट्रपति भवन के सूत्रों ने राष्ट्रपति सचिवालय के 29 मई के आदेश के हवाले से बताया कि 15 मई को आरिफ की दया याचिका दाखिल हुई थी. उसे विचार के बाद 27 मई को खारिज कर दिया गया. सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा बरकरार रखते हुए कहा था कि आरिफ के पक्ष में कोई भी ऐसा साक्ष्य नहीं था, जिससे उसके अपराध की गंभीरता कम होती हो.
22 दिसंबर 2000 को लाल किला पर हुआ था हमला
गौरतलब है कि, 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि लाल किले पर हमला भारत की एकता, अखंडता और संप्रभुता के लिए खतरा था. कोर्ट ने कहा था कि दोषी के पक्ष में कोई भी परिस्थितियां नहीं थीं. यह हमला 22 दिसंबर, 2000 को हुआ था. हमले में लाल किले के अंदर तैनात 7 राजपूताना राइफल्स यूनिट के तीन सैन्यकर्मी मारे गए थे.
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लाल किले हमले के बाद गिरफ्तार किया गया था आतंकी आरिफ
हमले के चार दिन बाद मोहम्मद आरिफ को गिरफ्तार किया गया था. वह एक पाकिस्तानी नागरिक है और आतंकी समूह लश्कर-ए-तैयबा (LeT) का सदस्य है. उसे पहली बार अक्टूबर 2005 में सेना के जवानों पर हमला करने की साजिश रचने का दोषी पाया गया था. उसके बाद उसे मौत की सजा सुनाई गई थी. आरिफ और लश्कर के तीन अन्य आतंकवादी 1999 में भारत में घुसे थे. श्रीनगर के एक घर में लाल किले पर हमला करने की योजना बनाई थी.