मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने जब धार स्थित भोजशाला परिसर को 'देवी वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर' घोषित किया है. इस आदेश के लगभग एक हफ्ते बाद आज वह पहला शुक्रवार है, जब यहां 'वाग्देवी' की पूजा फिर से की जा रही है. मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की भीड़ है और पूजा की तैयारियां हो रही हैं.
721 साल बाद फिर से पूजा परंपरा की शुरुआत
एक तरह से लगभग 721 साल बाद यह ऐसा मौका है, जब धार भोजशाला में पहली बार शु्क्रवार को फिर से वैदिक मंत्र गूंजेंगे. आरती-दीपक की लौ की ज्योति जगमगाएगी और शंख-घंटे-घड़ियालों का नाद फिर से दूर-दूर तक पहुंचेंगा.
बीते हफ्ते जब कोर्ट की पीठ ने भोजशाला को लेकर अहम फैसला सुनाया तो इसके केंद्र में एक ऐसी प्रतिमा थी, जो इस वक्त लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी हुई है. फैसला आने से वह प्रतिमा भी प्रासंगिक हो गई है और उसे वापस लाने की जोर-शोर से मांग उठ रही है.
इस प्रतिमा को वाग्देवी की प्रतिमा बताया जाता है. पुराणों में 'वाग्देवी', विद्या और ज्ञान की देवी सरस्वती का ही एक नाम बताया गया है. स्वर, वाणी, बोलने की शक्ति और प्रथम शब्द शक्ति होने के कारण ही देवी का नाम वाग्देवी पड़ा है.
गायत्री छंद की परंपरा में देवी का मंत्र वाग्देवी के ही नाम से आता है, उसमें 'सरस्वती' नाम का जिक्र नहीं मिलता है.
'ॐ वाग्देव्यैच विद्महे ब्रह्म-पत्न्यैच धीमहि। तन्नो वाणी प्रचोदयात्॥'
ब्रिटिश म्यूजियम में कैसे पहुंची प्रतिमा?
ब्रिटिश म्यूजियम में रखी यह प्रतिमा इन्हीं वाग्देवी की है, लेकिन एक दावा और है जिसमें इस देवी प्रतिमा का नाम अंबिका बताया जाता है. अंबिका नाम जैन परंपरा से लिया गया है. कोर्ट के 242 पन्नों के फैसले में जिक्र आया है कि '1875 में ब्रिटिश शासन के दौरान मेजर जनरल विलियम किंकैड ने भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर की खुदाई कराई थी.

इसी खुदाई में एक प्रतिमा मिली, जिसे हिंदू पक्ष देवी वाग्देवी यानी सरस्वती की मूर्ति मानता है. बाद में यह प्रतिमा इंग्लैंड पहुंच गई. रिकॉर्ड बताते हैं कि यह मूर्ति 1886 में लंदन पहुंची और 1909 में औपचारिक रूप से ब्रिटिश म्यूजियम के संग्रह का हिस्सा बन गई.'
दो भुजाएं, हाथ में पाश... कैसी है वाग्देवी की प्रतिमा
हालांकि ब्रिटिश म्यूजियम इस प्रतिमा को देवी सरस्वती नहीं मानता. संग्रहालय की आधिकारिक वेबसाइट पर इसे 'जैन यक्षिणी अंबिका' बताया गया है. करीब चार फीट ऊंची और लगभग 250 किलो वजनी इस प्रतिमा को सफेद संगमरमर पर उकेरा गया है. संग्रहालय के विवरण के मुताबिक प्रतिमा मूल रूप से चार भुजाओं वाली थी, जिनमें से दो टूट चुकी हैं. बची हुई भुजाओं में देवी अंकुश और संभवतः पाश या किसी पौधे का डंठल पकड़े हुए दिखाई देती हैं. सिर पर करंड मुकुट है और बाल एक ओर बंधे हुए हैं.
जैन यक्षिणी अंबिका की प्रतिमा?
यहीं से प्रतिमा की पहचान को लेकर विवाद शुरू होता है. प्रसिद्ध कला इतिहासकार ओसी गांगुली और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के पूर्व महानिदेशक केएन दीक्षित ने इसे 'राजा भोज की सरस्वती' बताया था. उनके अध्ययन में दावा किया गया कि यह वही प्रतिमा है, जो भोजशाला में स्थापित थी. लेकिन 1980 के दशक से इस पहचान को चुनौती मिलने लगी.
संस्कृत और प्राकृत के विद्वान एचसी भायाणी ने 1981 में प्रतिमा पर लिखे शिलालेख का अध्ययन कर निष्कर्ष निकाला कि यह प्रतिमा जैन देवी अंबिका की है. बाद में ब्रिटिश म्यूजियम के क्यूरेटर माइकल विलिस ने भी 2011 में लंदन के SOAS में आयोजित जैन स्टडीज वर्कशॉप में इसी निष्कर्ष का समर्थन किया. वर्तमान में ब्रिटिश म्यूजियम इसी व्याख्या को मान्यता देता है.

प्रतिमा पर भी अंकित है प्रमुख परिचय
प्रतिमा के आधार पर संस्कृत में एक महत्वपूर्ण शिलालेख भी अंकित है. यह विक्रम संवत 1091 यानी 1034-35 ईस्वी का माना जाता है. अदालत ने अपने फैसले में इसका पूरा अनुवाद शामिल किया है. शिलालेख के अनुसार, राजा भोज के धार्मिक अधिकारी वररुचि ने पहले “वाग्देवी” की प्रतिमा बनवाई और उसके बाद “अंबा” की एक सुंदर प्रतिमा का निर्माण कराया. इसे शिल्पकार साहिरा के पुत्र मानथल ने बनाया था.
यहीं एक बड़ा प्रश्न खड़ा होता है. शिलालेख स्पष्ट रूप से दो प्रतिमाओं का उल्लेख करता है 'पहली वाग्देवी और दूसरी अंबा'. यानी जो प्रतिमा आज लंदन में है, वह संभवतः अंबिका हो सकती है, जबकि शिलालेख में वर्णित मूल वाग्देवी प्रतिमा या तो नष्ट हो चुकी है या अब तक नहीं मिली है. फैसले में भी इस विश्लेषण का उल्लेख किया गया है.
हाईकोर्ट ने अंबा, अंबिका और वाग्देवी को माना एक
हालांकि हाईकोर्ट ने अपने निष्कर्ष में कहा है कि 'अंबा, अंबिका और वाग्देवी' सभी देवी सरस्वती के ही रूप हैं. पौराणिक मान्यताएं भी कोर्ट की इस व्याख्या को स्वीकार करती हैं. क्योंकि देवी सरस्वती को त्रिदेवियों में पहली देवी माना जाता है.
अंबा का संस्कृत में अर्थ माता ही होता है. अंबिका भी देवियों के लिए प्रयोग होने वाला कॉमन नेम है. कई कहानियों में लक्ष्मी के अवतारों को भी अंबा कहा गया है.
ऋग्वेद में सरस्वती को "अम्बितमे, नदीतमे, देवितमे" (अर्थात श्रेष्ठ माता, श्रेष्ठ नदी और श्रेष्ठ देवी) कहा गया है.
कोर्ट ने माना कि भारतीय परंपरा में जैन और हिंदू धर्म अलग-अलग इकाइयां नहीं हैं और दोनों में एक ही सर्वोच्च सत्ता की उपासना की जाती रही है. अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि जैन तीर्थंकरों या जैन प्रतीकों का किसी हिंदू मंदिर में मिलना अस्वाभाविक नहीं है.

जैन ग्रंथ में भी मिलता है भोजशाला का जिक्र
जैन ग्रंथ प्रबंध चिंतामणि में भोजशाला का जिक्र मिलता है. इसकी मानें तो परमार शासक राजा भोज ने 1034 ईस्वी में मध्यप्रदेश के धार में देवी सरस्वती की पूजा के लिए भोजशाला मंदिर बनवाया. यह मंदिर हिंदू दर्शन और संस्कृत भाषा का प्रमुख केंद्र था. इसके साथ ही यह एक बड़ा और प्रसिद्ध आवासीय विश्वविद्यालय भी था. यहां लगभग 1400 महान विद्वान, कवि और धर्मशास्त्री, जैसे माघ, बाणभट्ट, कालिदास, भवभूति, मानतुंग, भास्कर भट्ट और धनपाल आदि राजा भोज के संरक्षण में रहे.
कैसे होती थी देवी की पूजा? यहां रचे गए कई महान ग्रंथ
देवी सरस्वती की पूजा का सीधा मतलब विद्या की साधना है. यह एक प्राचीन विद्यालय था. जो 'ज्ञान' का सबसे बड़ा केंद्र था और ज्ञान ही सरस्वती साधना का तरीका है. भोजशाला में अवनी कूर्मशतम, सरस्वती कंठा भरण, राजमार्तंड और तिथि सारणिका जैसे अनेक विश्व प्रसिद्ध ग्रंथ रचे गए.
परिसर एक प्राचीन और बड़ा हवनकुंड भी मिला है, जो बताता है कि यहां वेदमंत्रो के पाठ, वैदिक यज्ञ और हवन की लंबी परंपरा रही है. महासरस्वती यज्ञ की परंपरा का पुराणों में जिक्र है. ऋग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए कहा गया है.
प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु I
(सरस्वती देवी परम चेतना हैं और वे हमारी बुद्धि, प्रज्ञा, और मनोवृत्तियों की रक्षा करती हैं.)
धार जिला गजेटियर में भी यह जिक्र मिलता है कि भोजशाला उस समय लगभग सभी प्रचलित भारतीय आस्थाओं और विद्याओं के अध्ययन का महान केंद्र थी. खुद राजा भोज 72 प्रकार की कलाओं और 36 प्रकार की सैनिक विद्याओं में निपुण थे. उन्होंने ज्योतिष, आयुर्वेद, व्याकरण, राजनीति, मूर्तिशास्त्र, दर्शन, रसायन, वास्तु आदि विविध विषयों पर 84 ग्रंथों की रचना की थी.
प्रतिमा कब आएगी वापस?
हाईकोर्ट ने जो फैसला सुनाया है, वह केवल प्रतिमा की पहचान तक सीमित नहीं है, बल्कि अदालत ने ASI की 98 दिनों तक चली सर्वे रिपोर्ट, ऐतिहासिक दस्तावेजों और स्थापत्य साक्ष्यों के आधार पर भोजशाला को मूल रूप से सरस्वती मंदिर माना. अदालत ने कहा कि यहां हिंदू पूजा की निरंतरता कभी समाप्त नहीं हुई. इसी के साथ कोर्ट ने 2003 के उस ASI आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसमें हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों को परिसर में पूजा-अर्चना की अनुमति दी गई थी.

हालांकि अदालत ने ब्रिटिश म्यूजियम से प्रतिमा वापस लाने का सीधा आदेश नहीं दिया. कोर्ट ने केवल इतना कहा कि इस संबंध में जो आवेदन और प्रतिनिधित्व सरकार के पास लंबित हैं, उन पर केंद्र सरकार विचार कर सकती है. अदालत ने ASI को भोजशाला परिसर के संरक्षण और निगरानी का पूर्ण अधिकार भी दिया.
पहले भी उठती रही है प्रतिमा वापसी की मांग
प्रतिमा की वापसी की मांग पहले भी कई बार उठ चुकी है. मध्य प्रदेश सरकार वर्षों से यूनेस्को और भारत सरकार के जरिए इस प्रतिमा को वापस लाने की कोशिश की बात कहती रही है. 2022 में जब ऋषि सुनक ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बने थे, तब तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी वाग्देवी प्रतिमा को वापस लाने के प्रयास तेज करने की बात कही थी.