हिमालय के ऊपरी सिरे की चट्टानी और बर्फ से ढकी जमीन एक बार फिर कांप रही है. जम्मू और कश्मीर के साथ फिर से नया सवाल सिर उठा रहा है. मसला ये है कि जम्मू-कश्मीर पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष सज्जाद लोन ने कहा 'अब समय आ गया है कि जम्मू और कश्मीर के बीच अब अलगाव हो जाए और ये सौहार्द के साथ हो. उन्होंने कहा कि, अब 'कश्मीर और जम्मू के बीच प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर फिर से सोचने का समय आ गया है.'
जम्मू में उठती रही है अलग राज्य की मांग
जम्मू में अलग राज्य की मांग समय-समय पर उठती रही है, लेकिन घाटी से आने वाले किसी बड़े नेता द्वारा पहली बार यह कहा गया है कि इस हिमालयी क्षेत्र के ये दो हिस्से शायद अलग-अलग रहकर बेहतर भविष्य गढ़ सकते हैं, लेकिन आज यह रिश्ता इतना तनावपूर्ण क्यों है, इसे समझने के लिए हमें उस दौर में लौटना होगा, जब यह गठबंधन बना था, यूं समझिए कि ये ऐसी शादी थी, जो जनता की इच्छा पर नहीं, बल्कि एक बिक्री रसीद पर आधारित था.
आज जम्मू और कश्मीर को इतिहास के जुड़े हुए जुड़वां की तरह माना जाता है कि दोनों अलग-अलग हैं ही नहीं, लेकिन आज़ादी से महज़ एक सदी पहले तक ये दोनों बिल्कुल अलग इकाइयां थीं. उन्हें जोड़ कर रखते थे तो सिर्फ दुर्गम पहाड़ी रास्ते और कुछ महत्वाकांक्षी लोगों की राजनीतिक चालें. विडंबना है कि उनका यह मेल एक ढहते साम्राज्य और एक हताश महारानी और उसके वज़ीर के बीच हुए “अवैध” सत्ता खेल का नतीजा था.

तो कहानी कुछ यूं है कि...
जून 1839 में जब पंजाब के शेर, महाराजा रणजीत सिंह का निधन हुआ, तो वे अपने पीछे एक ऐसा साम्राज्य छोड़ गए जो खैबर दर्रे से सतलुज नदी तक, कश्मीर की पहाड़ियों से मुल्तान के रेगिस्तान तक फैला था. लेकिन इस वैभवशाली और बड़े राज्य के साथ अराजकता भी विरासत में मिली. महज चार वर्षों के भीतर तीन महाराज, खड़क सिंह, नौनिहाल सिंह, शेर सिंह और एक रीजेंट की हत्या कर दी गई. सिंहासन खून से सना हुआ था. कभी शक्तिशाली रहा सिख साम्राज्य अब षड्यंत्रों का अखाड़ा बन चुका था.
इस उथल-पुथल के केंद्र में दो विवादास्पद किरदार थे, महारानी जिन्दन कौर, रणजीत सिंह की सबसे छोटी रानी जो बालक महाराजा दलीप सिंह की मां थीं और उनके वज़ीर (प्रधानमंत्री) लाल सिंह, जिन्हें दबी जुबान में उनका प्रेमी भी कहा जाता है. हालांकि यह कभी स्पष्ट तौर नहीं रहा.
चाहे उनका रिश्ता निजी हो या सिर्फ राजनीतिक सुविधा का, सत्ता के गलियारों में जिन्दन कौर और लाल सिंह को अलग नहीं किया जा सकता था. दोनों मिलकर उस साम्राज्य को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे थे, जहां असली ताकत खालसा सेना के पास थी, और वह सेना उन्हें घृणा से देख रही थी. लेकिन इस खतरनाक खेल में एक और खिलाड़ी था, जो जम्मू की पहाड़ियों से एक पहाड़ी बिल्ली की तरह धैर्य से सब कुछ देख रहा था.
जम्मू के राजा गुलाब सिंह कोई साधारण सामंत नहीं थे. एक छोटे डोगरा राजपूत कुल से आने वाले गुलाब सिंह ने सैन्य कौशल, प्रशासनिक चतुराई और दरबारी षड्यंत्रों से बच निकलने की अद्भुत क्षमता के बल पर अपनी जगह बनाई थी. रणजीत सिंह ने उन्हें जम्मू की जागीर सौंपी थी, जिसे उन्होंने एक मज़बूत शक्ति केंद्र में बदल दिया. जब लाहौर के महलों में दूसरे सरदार सत्ता के लिए लड़ते और मरते रहे, गुलाब सिंह ने बहुत शांति से अपने क्षेत्र का विस्तार किया.
उनके सेनापति ज़ोरावर सिंह ने 1834 में लद्दाख पर विजय पाई, फिर बाल्टिस्तान और पश्चिमी तिब्बत तक पहुंच बना ली. 1840 के दशक तक उनके अधीन एक विशाल पहाड़ी इलाका था, जो तकनीकी रूप से सिख साम्राज्य का हिस्सा था, हालांकि वह एक तरह से लगभग आजाद था.
वे लाहौर को टैक्स देते थे, लेकिन अपनी डोगरा सेना को अच्छी तरह प्रशिक्षित और वेतनभोगी रखते थे. उन्होंने देखा कि जिन्दन कौर और लाल सिंह कैसे 80 हज़ार से अधिक की खालसा सेना को संभालने में नाकाम हो रहे थे और वे इंतज़ार करते रहे.
महारानी और वज़ीर का रिश्ता चाहे वह प्रेम का हो या सत्ता की मजबूरी का, आख़िरकार गुलाब सिंह के लिए एक मौका बन गया. खालसा की नाराज़गी, दरबार की हताशा और आने वाले विश्वासघात, सब कुछ उनके पक्ष में जाता दिख रहा था.
1809 की अमृतसर संधि के बाद सतलुज नदी सिख साम्राज्य (पश्चिम) और ब्रिटिश संरक्षित इलाकों (पूर्व) के बीच स्पष्ट सीमा बन गई थी. महाराजा रणजीत सिंह ने तीन दशकों तक इस सीमा का सम्मान किया, लेकिन 1839 के बाद अंग्रेजो की नजर में पंजाब एक 'पका हुआ फल' बन चुका था. उन्होंने फिरोज़पुर, लुधियाना और अंबाला जैसे सिस-सतलुज इलाकों में सेना बढ़ानी शुरू कर दी जो संधि का उल्लंघन था.

इतिहासकार जेडी कनिंघम लिखते हैं कि अंग्रेज़ पहले से ही पंजाब को भावी ब्रिटिश प्रांत मानने लगे थे. 1845 की सर्दियों तक सतलुज एक सीमा नहीं, बल्कि बारूद की लकीर बन चुकी थी. सीमा पर ब्रिटिश सैनिकों की संख्या 40 हज़ार से अधिक हो गई थी. सबसे उकसाने वाली बात यह थी कि सिंध से नावों का बेड़ा मंगवाया गया, यानी नदी पार करने की तैयारी शुरू हो रही थी.
फंसी हुई स्थिति में थे रानी जिंदन और लाल सिंह
लाहौर में केंद्रीय सत्ता ढह चुकी थी. इस शून्य में खालसा सेना ही असली शासक बन गई थी. कनिंघम के अनुसार, खालसा सिर्फ एक सेना नहीं थी, बल्कि सिखों के लिए रिप्रेंजेंटेटिव थी, जो सैनिक पंचायतों के ज़रिये चलती थी. सैनिकों को यकीन हो गया था कि अंग्रेज़ उन्हें चारों ओर से घेर रहे हैं और एकमात्र रास्ता पहले हमला करना है. उधर, लाहौर के महल के भीतर एक और खेल चल रहा था. रानी जिन्दन और उनके सलाहकार लाल सिंह और तेज सिंह बुरी स्थिति में फंसे थे. वे नाममात्र के शासक थे, लेकिन अपनी ही सेना के बंधक बन चुके थे.
कनिंघम लिखते हैं कि रानी और उनके मंत्रियों ने सेना को युद्ध के लिए उकसाया, ताकि उस ताकत से छुटकारा पाया जा सके जिसे वे अब नियंत्रित नहीं कर पा रहे थे. उन्हें लगा कि सेना या तो बिखर जाएगी या नष्ट हो जाएगी. आखिरी चिंगारी ब्रिटिश अधिकारी मेजर जॉर्ज ब्रॉडफुट ने जलाई. उन्होंने घोषणा कर दी कि नदी के उस पार स्थित सिख ज़मींदारियों पर अब ब्रिटिश अधिकार होगा.
11 दिसंबर 1845 को खालसा सेना ने वही किया, जिसका डर और इंतजार दोनों को था, उन्होंने सतलुज पार कर ब्रिटिश इलाके में प्रवेश किया. यह हमला बिना उकसावे का था या अंग्रेजी घेराबंदी के ख़िलाफ़ एक पूर्व-प्रहार, या फिर लाल सिंह और तेज सिंह की साज़िश, इस पर आज भी बहस है. लेकिन इतना तय है कि सिख सैनिक पूरे आत्मविश्वास के साथ मैदान में उतरे थे. ब्रिटिश गवर्नर-जनरल लॉर्ड हार्डिंग और सेनापति ह्यूग गफ पूरी तैयारी में थे. और अगर बाद के आरोप सही हैं, तो उन्होंने पहले ही एक अहम खिलाड़ी, जम्मू के राजा गुलाब सिंह से तटस्थ रहने का वादा हासिल कर लिया था.
इस बीच यह भी कहा गया कि लाल सिंह ब्रिटिश अधिकारियों को गुप्त पत्र लिख रहे थे, जिन्हें बाद में उनके विश्वासघात के सबूत के तौर पर पेश किया गया.
लड़ाइयां तेज़ी से हुईं और हर वार पहले से ज़्यादा खूनी था. 18 दिसंबर को मुदकी में लाल सिंह की घुड़सवार सेना ने ब्रिटिश लाइन पर ज़ोरदार हमला किया, लेकिन अहम मौके पर वे पीछे हट गए. अंग्रेज अफसरों में चर्चा थी कि यह हार जानबूझकर दी गई. तीन दिन बाद फिरोजशाह में 40 हजार सिख सैनिकों ने अंग्रेजी हमले का सामना किया. 21 दिसंबर की शाम अंग्रेज बाहरी मोर्चे पर क़ब्ज़ा कर चुके थे, लेकिन युद्ध अधर में लटका था. अगली सुबह जब थके हुए ब्रिटिश सैनिक आख़िरी लड़ाई के लिए तैयार हो रहे थे, तब तेज सिंह ताज़ा सिख सेना लेकर पहुंचे, और फिर बिना लड़े लौट गए.
या तो यह घोर सैन्य अक्षमता थी, या खुली ग़द्दारी. खालसा के वीर सैनिक समझने लगे थे कि उनके सेनापति उन्हें बेच रहे हैं. फिर भी सेना में लड़ने की ताकत बची थी. आख़िरी दांव खेला जाना था और इसके लिए सोब्राओं का मैदान चुना गया. फिर जो हुआ वह इतिहास है.