दिसंबर 1845 में, महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद सिख साम्राज्य की सत्ता कमजोर पड़ चुकी थी. इसी मौके का फायदा उठाते हुए ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने सीमाओं पर अपनी सेनाएं बढ़ा दीं. खतरे को भांपते हुए खालसा सेना ने सतलुज नदी पार की, लेकिन शुरुआती लड़ाइयों में उसे लगातार हार ही मिली. खून-खराबे से भरे इसी निष्कर्ष और संधियों के मेल से ही उस जम्मू-कश्मीर का जन्म हुआ, जो आज हमें नजर आता है.
सोबरांव का संहार
1845 की सर्दियों में तीन पराजयों के बाद सिखों ने सतलुज के दक्षिण का सारा इलाका छोड़ दिया. उन्होंने सिर्फ सोबरांव गांव के पास लगभग तीन मील लंबी एक भारी किलेबंद पट्टी पर अपना कब्जा जमाए रखा. सोबरांव अमृतसर से लगभग 30 मील दक्षिण में था.
करीब 35,000 खालसा सैनिक वहां मोर्चा संभाले हुए थे. बंदूकें भरी हुई थीं, तोपें तैनात थीं. गढ़ की कमान तेज सिंह के हाथ में थी, जिन पर पहले से ही विश्वासघात के आरोप लग चुके थे. उन्होंने परत-दर-परत खाइयों और मोर्चों का निर्माण कराया था. उत्तरी किनारे पर लाल सिंह तोपखाने का नेतृत्व कर रहे थे. दोनों किनारों को सतलुज पर बने नावों के पुल से जोड़ा गया था. पीछे, सर्दियों की बारिश से उफनाई सतलुज दहाड़ती हुई बह रही थी.
10 फरवरी 1846 की सुबह, जैसे ही नदी पर छाया कोहरा छंटा, ब्रिटिश तोपों ने आग उगलनी शुरू कर दी. गोलाबारी विनाशकारी थी. तोप के गोले सिख मोर्चों को चीरते चले गए और घंटों तक खालसा सैनिक नरक जैसी स्थिति झेलते रहे. मध्य सुबह के आसपास, मेजर जनरल रॉबर्ट डिक ने पश्चिम से हमला बोला और रक्षा पंक्ति में सेंध लगा दी.
खून से लाल हो गई जमीन
ब्रिटिश पैदल सेना लहरों में मिट्टी की दीवारों पर टूट पड़ी. सिखों ने ऐसी भीषण प्रतिरोध किया कि अनुभवी ब्रिटिश अधिकारी भी सन्न रह गए. एक ब्रिटिश अधिकारी ने बाद में सिखों की हताश वीरता का वर्णन करते हुए लिखा, 'जिन सिख तोपचियों से हमारा सामना हुआ, वे साहस और कद-काठी दोनों में चुने हुए लोग थे… तोपखाना चौकी तक पहुंचने से पहले हमने भारी नुकसान उठाया, मानो हमें शेर के मुंह में धकेल दिया गया हो. जब हम वहां पहुंचे, तो तोपची अपनी तलवारें लेकर उतर आए और हम अपनी संगीनों से टकरा रहे थे. फिर लोहे से लोहे की भयानक टक्कर शुरू हुई. कुछ ही मिनटों में जमीन सैकड़ों बहादुरों के खून से लाल हो गई.
वे विशालकाय तोपची असाधारण साहस से लड़े. जब हमारे कुछ सैनिकों ने संगीनें घोंपीं, तो उन्होंने बाईं हथेली से संगीन की नाल पकड़ ली और अपनी भारी तलवार से हमारे सैनिकों के सिर काट दिए. गहरे दुःख के साथ मैंने अपने कई साथियों को इस तरह मरते देखा.' (लेफ्टिनेंट जे. डब्ल्यू. बाल्डविन, सोबरांव युद्ध की स्मृति में)
शेर-ए-पंजाब रणजीत सिंह की विरासत बचाने उतरे थे सिख
सिख जानते थे कि वे केवल एक मोर्चा नहीं, बल्कि अपना साम्राज्य, सम्मान और महाराजा रणजीत सिंह द्वारा बनाई गई हर चीज की रक्षा कर रहे हैं. अनुभवी योद्धा शमशेर सिंह अटारीवाला सबसे भीषण संघर्ष वाले हिस्से में डटे रहे. जब उनसे पीछे हटने को कहा गया, तो उन्होंने कथित तौर पर जवाब दिया कि सिख योद्धा वहीं मरता है जहां वह खड़ा होता है. बाद में उनका शव मृतकों के ढेर में मिला, जिसे उनके अनुयायी गोलियों की बौछार के बीच बेड़ों पर रखकर नदी पार ले गए.
लेकिन केवल साहस से मोर्चा नहीं बचाया जा सकता था.
...लेकिन पुल के टूटने से सतलुज बन गई सिख सैनिकों की कब्रगाह
जैसे-जैसे ब्रिटिश घुड़सवार सेना और घोड़ा-तोपखाना दीवारों में बने छेदों से भीतर घुसता गया, सिख पंक्तियों में अफरातफरी फैलने लगी. सैनिकों की निगाहें सतलुज पर बने नावों के पुल पर टिक गईं, जो उनका एकमात्र भागने का रास्ता था. और तभी वह पुल टूट गया. ब्रिटिश दस्तावेजों के अनुसार, हजारों घबराए सैनिकों के एक साथ चढ़ने और उफनती नदी के दबाव से पुल ढह गया.
लेकिन बचे हुए सिख सैनिकों की कहानी और भी भयावह है. उनके अनुसार, तेज सिंह, जो लड़ाई की शुरुआत में ही भाग चुके थे, उन्होंने जानबूझकर पुल को नष्ट कराया ताकि ब्रिटिश पीछा न कर सकें और संभवतः उस खालसा सेना का अंत हो जाए, जो उनकी राजनीतिक स्थिति के लिए खतरा बन चुकी थी. सच जो भी हो, परिणाम विनाशकारी था. हजारों सिख सैनिक, ब्रिटिश तोपों और उफनती नदी के बीच फंस गए. कईयों ने आत्मसमर्पण की बजाय डूबकर मरना चुना. नदी किनारे तैनात ब्रिटिश घोड़ा-तोपखाने ने पानी में संघर्ष करते जनसमूह पर गोलियां बरसाईं. सतलुज का पानी लाल हो गया.
जब कत्लेआम रुका, तब कम से कम 10,000 सिख मारे जा चुके थे, घायल थे या डूब गए थे. ब्रिटिश हताहतों की संख्या भी 2,000 से अधिक थी, जो पूरे युद्ध में उनकी सबसे बड़ी क्षति थी. खालसा सेना, जो सिख साम्राज्य का गौरव थी, टूट चुकी थी. बचे हुए सैनिक निराश और नेतृत्वविहीन होकर लाहौर लौटे.
विश्वासघात की बहस
पहले एंग्लो-सिख युद्ध में, विशेषकर सोबरांव में, लाल सिंह और तेज सिंह की भूमिका आज भी इतिहासकारों के बीच तीखी बहस का विषय है. तेज सिंह औपचारिक रूप से सोबरांव में सिख सेना के सेनापति थे, लेकिन वे लड़ाई के शुरुआती चरण में ही भाग गए. सबसे गंभीर आरोप सतलुज पर बने पुल के टूटने को लेकर है. जहां ब्रिटिश इसे प्राकृतिक कारण बताते हैं, वहीं सिख कथाएं इसे जानबूझकर किया गया कारनाम मानती हैं. कहा जाता है कि तेज सिंह ने या तो पुल की एक नाव अलग कर दी या उस पर गोलियां चलाने का आदेश दिया, ताकि फंसी हुई सेना नष्ट हो जाए और ब्रिटिश पंजाब में आगे न बढ़ सकें.
लाल सिंह की भूमिका अधिक अस्पष्ट है. कुछ स्रोत उन्हें तेज सिंह के साथ सोबरांव में बताते हैं, जबकि अन्य के अनुसार वे मीलों दूर बड़ी संख्या में गोरचुर्रा (अनियमित घुड़सवार) के साथ थे और जनरल गफ की कमजोर आपूर्ति लाइनों पर हमला करने का अवसर होते हुए भी निष्क्रिय रहे.
दोनों पर ब्रिटिशों से मिलीभगत, रिश्वत लेने या युद्ध के बाद सत्ता के वादे स्वीकार करने के आरोप लगे. हालांकि कुछ इतिहासकार मानते हैं कि उनके निर्णय बिगड़ती सैन्य स्थिति के यथार्थवादी आकलन का परिणाम थे, न कि विश्वासघात.
लाहौर की संधि
ब्रिटिश सेना बिना किसी विरोध के लाहौर की ओर बढ़ी. महल में, महारानी जिंद कौर अपने नन्हें पुत्र को गोद में लिए समझ चुकी थीं कि साम्राज्य समाप्त हो चुका है. उनके वज़ीर लाल सिंह असहाय होकर देखते रहे, जब ब्रिटिशों ने अपनी शर्तें थोप दीं.
9 मार्च 1846 को लाहौर की संधि पर हस्ताक्षर हुए. शर्तें बेहद कठोर थीं:
* जालंधर दोआब (ब्यास और सतलुज के बीच का उपजाऊ क्षेत्र), हजारा का पहाड़ी इलाका और अन्य क्षेत्र ब्रिटिशों को सौंपे जाएंगे.
* सिखों को 1.5 करोड़ नानकशाही रुपये का युद्ध हर्जाना देना होगा, जिसे लाहौर का खजाना चुकाने में असमर्थ था.
* गर्वित खालसा सेना को बहुत सीमित कर दिया जाएगा.
* लाहौर में ब्रिटिश रेजिडेंट और सैनिक टुकड़ी तैनात होगी, जिससे सिख राज्य ब्रिटिश कठपुतली बन जाएगा.
चूंकि पूरी रकम देना संभव नहीं था, इसलिए ब्रिटिशों ने क्षेत्रीय मुआवजा स्वीकार किया. कश्मीर घाटी सहित पहाड़ी इलाके, जिनका मूल्य एक करोड़ रुपये आंका गया, वे सभी ब्रिटिश नियंत्रण में चले गए.
अमृतसर का सौदा
सिर्फ सात दिन बाद, 16 मार्च 1846 को, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और जम्मू के राजा गुलाब सिंह के बीच एक और संधि हुई.
अमृतसर की यह संधि मूलतः बिक्री पत्र थी. इसके पहले अनुच्छेद में कहा गया:
'ब्रिटिश सरकार, महाराजा गुलाब सिंह तथा उनके पुरुष वंशजों को सिंधु नदी के पूर्व और रावी नदी के पश्चिम स्थित सभी पहाड़ी या पर्वतीय क्षेत्रों को, चंबा सहित और लाहौल को छोड़कर, हमेशा के लिए स्वतंत्र अधिकार में सौंपती है. ये वे क्षेत्र हैं जिन्हें लाहौर की संधि (9 मार्च 1846) के अनुच्छेद 4 के तहत ब्रिटिश सरकार को सौंपा गया था.'
साधारण शब्दों में: ब्रिटिश कश्मीर को गुलाब सिंह को बेच रहे थे.
कीमत थी 75 लाख नानकशाही रुपये, किस्तों में देय. भारत की सबसे सुंदर घाटियों में से एक, जहां लाखों लोग रहते थे, संपत्ति की तरह खरीदी-बेची जा रही थी.
गुलाब सिंह के लिए यह वर्षों की चतुर कूटनीति और रणनीतिक तटस्थता का परिणाम था.
इस तरह एक साथ आ गए जम्मू और कश्मीर
ब्रिटिशों को युद्ध खर्च की भरपाई के लिए 75 लाख रुपये मिले, दुर्गम पहाड़ी इलाके के सीधे प्रशासन से मुक्ति मिली और रूस व अफगानिस्तान के खिलाफ एक मित्रवत बफर राज्य भी बन गया. गुलाब सिंह को एक साम्राज्य मिला. उन्होंने हिंदुओं, मुसलमानों, बौद्धों और सिखों के साथ ही किसानों, चरवाहों, व्यापारियों और पहाड़ी योद्धाओं पर शासन किया.
जम्मू और कश्मीर, जो पहले अलग-अलग इकाइयां थे और केवल सिख साम्राज्य की प्रशासनिक संरचना से जुड़े थे, अब एक औपनिवेशिक सौदे के जरिए स्थायी रूप से एक साथ बांध दिए गए.