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सिंघु बॉर्डर पर किसानों के साथ चट्टान की तरह साथ निभाती महिलाएं

प्रदर्शन में शामिल महिलाओं का कहना है कि जब सरकार चाहती है कि वोट हमें मिले, हम उसके अनुयायी हैं हमने इस सरकार को वोट दिया है ... और अब वह हमें भूल गई है ... हम सभी खालिस्तानी बन गए हैं, यह लोहड़ी एक काली लोहड़ी है ... सभी दिवाली और सारे त्योहार काले दिन हैं. जब तक यह जारी रहेगा हम यहीं बैठेंगे.

किसानों के साथ कंपकंपाती ठंड में महिलाएं भी दे रहीं पूरा साथ (फोटो- मौसमी सिंह) किसानों के साथ कंपकंपाती ठंड में महिलाएं भी दे रहीं पूरा साथ (फोटो- मौसमी सिंह)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • किसान आंदोलन में बड़ी संख्या में महिलाओं की भागीदारी
  • पंजाब-हरियाणा की महिलाएं कई दिनों से आंदोलन में शामिल
  • यह किसी क्रांति से कम नहींः प्रदर्शनकारी रतिंदर कौर

केंद्र के कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे किसानों ने 18 जनवरी को 'महिला किसान दिवस' के रूप में अपने आंदोलन को तेज करने के लिए कमर कस ली है. प्रदर्शन में बड़ी संख्या में महिलाएं भी डटी हुई हैं. टेंट, ट्रैक्टर और बड़ी संख्या में शामिल प्रदर्शनकारी... बूढ़े और जवान लोगों के बीच नारी शक्ति भी पूरा साथ दे रही है निर्विवाद, बेपरवाह और पत्थर जैसी ठोस. अपने घर, खेत, जमीन और परिवार सब छोड़छाड़ कर दिल्ली के सिंघु बॉर्डर पर महिलाएं भी मजबूती के साथ डटी हुई हैं. इन सबके बीच उन सभी दादी और माताओं के लिए कठिन वक्त हैं जो महसूस करती हैं कि यह 'करो या मरो' की लड़ाई है.

बॉर्डर पर प्रदर्शन करती बुजुर्ग महिलाएं (मौसमी सिंह)

किसान आंदोलन में जो कुछ भी सामने आया है वह संभवतः अतीत का प्रतिबिंब ही है. ऐतिहासिक रूप से पंजाब की महिलाओं ने सदियों से संघर्ष किया और शासन किया है. उन्होंने संगठनों का बेहतर प्रबंधन किया और समुदायों को प्रोत्साहित किया. उन्हें नायाब रणनीतिकार और साहसी लड़ाका के रूप में जाना जाता है. वर्तमान में महिलाओं की ओर से जारी मैराथन धरने की वजह से केंद्र का मजबूत सरकार भी पसोपेश में है.

रणजीत कौर, सिंघु बॉर्डर पर अपने 50 दिन पूरे कर चुकी हैं, बैग और सामान के साथ यहीं पर शिफ्ट हुईं ... अच्छी तरह से! उनके परिवार के 11 लोग कुंडली से टिकरी तक अलग-अलग जगहों पर प्रदर्शन कर रहे हैं. उनकी बेटियां काफी उत्साहित हैं. 

उनका कहना है कि 'जब सरकार चाहती है कि वोट हमें मिले, हम उसके अनुयायी हैं हमने इस सरकार को वोट दिया है ... और अब वह हमें भूल गई है ... हम सभी खालिस्तानी बन गए हैं, यह लोहड़ी एक काली लोहड़ी है ... सभी दिवाली और सारे त्योहार काले दिन हैं. जब तक यह जारी रहेगा हम यहीं बैठेंगे और सुनिश्चित करेंगे कि हम मोदी सरकार को हराएं. '

तरनतारण स्थित घर पर उनकी बहू है जो पूरे घर की देखभाल कर रही है. उनकी जमीन करीब 30 एकड़ क्षेत्र में फैला है और वही उसे देखती है. यह हर घर की कहानी है, जहां इस तरह से खेती हो रही है और दिहाड़ी मजदूर को फसलों की कटाई के लिए काम पर रखा गया है.

रणजीत कौर के साथ हरियाणा की महिला किसान भी हैं. जसबीर के मोटे हाथ और झुर्रीदार चेहरे उनके मेहनत को दर्शाती है. वह नौसिखिया नहीं हैं और उन्होंने अपने खेतों को खून-पसीना दिया है... उन्होंने अपने पिता से खेती की बारीकियां सीखीं और अब उन्हें लगता है कि यह अस्तित्व की लड़ाई है.

'एमएसपी का कोई उल्लेख नहीं है. इस सीजन में यह हमारे लिए आसान नहीं था ... हम ही जानते हैं कि हमने अपना गेहूं कैसे बेचा ... गेहूं पैदा करने के लिए इसकी लागत करीब 1500-1400 रुपये है और हमें 1200 रुपये की दर मिली है ... अब यह मोदी सरकार चाहती है हमारी जमीन की नीलामी भी हो जाए यह कैसे सही है?'

महिलाएं बेहद निराश हैं कि सुप्रीम कोर्ट उन्हें बुजुर्गों और बच्चों के साथ लौटने के लिए कहेगा लेकिन वे कभी पीछे हटना नहीं जानती हैं. कंपकंपाती ठंड में टेंट के नीचे ऐसी मां भी रह रही हैं जिनके पास एक साल का बच्चा है.

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रतिंदर कौर जो एक छोटे से टेंटनुमा घर में हफ्तों तक रह रही है, जिसे वह घर बुलाती हैं. जब उनसे पूछा गया कि वह अपने दुधमुंहे बच्चे के लिए भोजन और दूध का प्रबंधन कैसे करती हैं, तो वह कहती हैं 'यह किसी क्रांति से कम नहीं है, जहां हमारे पूर्वजों ने स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया था ... मैं चाहती हूं कि मेरे बच्चे इस क्रांति का हिस्सा बनें ... यहां पर भोजन या दूध की कोई कमी नहीं है .... हमारे भाइयों ने सुनिश्चित किया है कि दूध लगातार मिलता रहे.

किसान आंदोलन को महिलाओं के सशक्त योगदान के लिए भी याद किया जाएगा. कंपकंपाती ठंड में टेंट के नीचे रहकर किसानों और खेती के लिए जिस तरह से महिलाएं संघर्ष कर रही हैं उससे किसानों का मनोबल और बढ़ा ही है. 

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