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'बकरीद पर बंद हो जानवरों की कुर्बानी', बंगाल में मुस्लिम शख्स की मांग, रखा 72 घंटे का रोजा

पश्चिम बंगाल के अल्ताब हुसैन ने ईद उल अजहा (Eid ul adha 2021) यानी बकरीद (Bakrid) पर जानवरों की कुर्बानी नहीं करने की गुजारिश की है.

अल्ताब हुसैन (फोटो- इंस्टाग्राम) अल्ताब हुसैन (फोटो- इंस्टाग्राम)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • बंगाल के मुस्लिम शख्स ने ईद पर 72 घंटे का रोजा रखा
  • शख्स ने जानवरों की कुर्बानी नहीं करने की गुजारिश की

ईद उल अजहा (Eid ul adha 2021) यानी बकरीद (Bakrid) के त्योहार को आज दुनियाभर में मनाया जा रहा है. लेकिन इस त्योहार को 33 साल के एक मुस्लिम शख्स ने बिना मटन बिरयानी खाकर मनाने का फैसला किया है.

पश्चिम बंगाल के कोलकाता के रहने वाले अल्ताब हुसैन ने ईद पर जानवरों की कुर्बानी के खिलाफ आवाज उठाते हुए 72 घंटे का रोजा (उपवास) रखा है. हुसैन का यह रोजा मंगलवार रात से शुरू हुआ. हर बार की तरह हुसैन के भाई ईद के मौके पर काटने के लिए बकरा लाए, इसे देखकर वह दुखी थे.

अल्ताब हुसैन ने कहा, 'पशुओं के प्रति क्रूरता बहुत बढ़ गई है और कोई इसके खिलाफ आवाज नहीं उठा रहा. मैं इसकी तरफ लोगों का ध्यान खींचना चाहता हूं, इसलिए 72 घंटे का उपवास करने का फैसला लिया है.'

साल 2014 में शाकाहारी बने थे अल्ताब हुसैन

अल्ताब हुसैन साल 2014 में शाकाहारी कार्यकर्ता बने थे. उस वक्त हुसैन ने डेयरी कारोबार से जुड़ा एक वीडियो देखा था, जिसमें पशु के साथ क्रूरता हो रही थी. उसके बाद से उन्होंने मांस खाना छोड़ दिया. इतना ही नहीं वह लेदर के उत्पाद का भी इस्तेमाल नहीं करते. तीन साल पहले भी हुसैन के भाई कुर्बानी के लिए घर में जानवर लाए थे, जिनको उन्होंने किसी तरह बचा लिया था. लेकिन परिवार अब भी हुसैन के विचारों से सहमत नहीं है, उनको अब भी लगता है कि कुर्बानी जरूरी है.

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हुसैन बताते हैं कि जब से उन्होंने पशुओं के प्रति क्रूरता पर बात रखनी शुरू की है, तब से उन्हें सोशल मीडिया पर धमकियां दी जाने लगी हैं. हिंदू समुदाय के कई लोग भी उनके खिलाफ हैं क्योंकि वह डेयरी प्रोडक्ट के इस्तेमाल के भी खिलाफ हैं. लेकिन कई ऐसे लोग भी हैं जो उनके सपोर्ट में हैं. 

वीडियो देखा और छोड़ दिया मांस खाना

हुसैन अपने शाकाहारी होने की कहानी को याद करते हुए बताते हैं, 'मैं भी पहले कुर्बानी का हिस्सा हुआ करता था. लेकिन फिर मैंने एक वीडियो देखा. इसमें एक जानवर को पीटा जा रहा था. ज्यादा दूध के लिए इंजेक्शन लगाए जा रहे थे. बच्चे को उससे अलग किया जा रहा था. नर को बूचड़खाने में भेज दिया गया था. तब से मेरा मन बदल गया. मैंने मांस, मछली सब छोड़ दिया. लेदर के उत्पाद, शहद सबका उपयोग बंद कर दिया.'

हालांकि, कई मौलवी अल्ताब हुसैन से सहमत नहीं हैं. उनका कहना है कि अल्ताब हुसैन अभी इस्लाम या कुर्बानी के बारे में सही से जानते नहीं हैं. नखोदा मस्जिद के इमाम मौलाना शफीक कासमी ने कहा, 'कुर्बानी की प्रथा कई धर्मों में है. हिंदू धर्म में भी, कोलकाता के मंदिर में भी कुर्बानी होती है.' मौलाना का कहना है कि अल्ताब हुसैन को ईद के मौके पर ऐसी बातें करने के लिए माफी मांगनी चाहिए.

(रिपोर्ट - प्रेमा राजाराम)

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