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कोरोना: स्वास्थ्य मंत्रालय और ICMR के आंकड़ों में मेल न होने से भ्रम

स्वास्थ्य मंत्रालय की वेबसाइट ने 3 मई और 11 मई को ICMR की तुलना में लगभग 9,000 और 12,000 कम केसों की सूचना दी है. इससे पता चलता है कि संख्या की रिपोर्टिंग में भी अंतर धीरे-धीरे बढ़ता गया. 

ICMR की तुलना में 10,000 कम केस दर्ज किए गए ICMR की तुलना में 10,000 कम केस दर्ज किए गए
स्टोरी हाइलाइट्स
  • औसतन ICMR की तुलना में 10,000 कम केस दर्ज किए गए
  • ICMR की तुलना में लगभग 9,000 और 12,000 कम केसों की सूचना दी
  • ICMR और स्वास्थ्य मंत्रालय की संख्या के बीच बहुत बड़ा अंतर

इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) की ओर कराए गए पहले राष्ट्रीय जनसंख्या-आधारित सीरो-सर्वेक्षण के निष्कर्षों ने भारत में कोरोना वायरस डेटा रिपोर्टिंग के बारे में कई सवाल उठाए हैं. ऐसे वक्त में जब भारत हर दिन करीब एक लाख केस रिपोर्ट कर रहा है, ICMR के सीरो-सर्वेक्षण परिणाम ने महामारी को कम करने में मदद की पेशकश की जगह सवाल ज्यादा उठाए हैं. वहीं ये परिणाम भी तीन महीने की देरी से आए हैं.

10 सितंबर, 2020 को इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च में प्रकाशित राष्ट्रीय सीरो-प्रीवेलेंस सर्वे में उसी को दोहराया गया है जो ICMR अधिकारियों ने अपनी 11 जून की प्रेस ब्रीफिंग में कहा था. इसमें कहा गया था कि भारत में 0.73% वयस्क मई के शुरू में कोरोना वायरस की चपेट में आ गए थे. ये 64 लाख संक्रमण के करीब बैठता है. यह 7 मई के उस कुल केसों की संख्या से विरोधाभासी है, जो 52592 थी. 

देरी से आए सर्वेक्षण के परिणाम से यह भी पता चलता है कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) ने मई की शुरुआत में कम से कम दो मौकों पर ICMR डेटाबेस में दर्ज किए गए केसों की संख्या से लगभग 10,000 कम कोविड-19 केसों की जानकारी दी. डेटा रिपोर्टिंग में इस तरह की विसंगति पर विशेषज्ञ चिंता जता रहे हैं क्योंकि हो सकता है कि इन आंकड़ों के आधार पर लिए गए कई फैसले प्रभावित हुए हों. 

सीरो-सर्वे पर ICMR पेपर के प्रमुख लेखक डॉ. मनोज वी मुरेकर ने आजतक/इंडिया टुडे को बताया, "हमने  हर दिन की संख्या के लिए ICMR डेटाबेस का इस्तेमाल किया. सभी लैब्स अपने-अपने डेटा ICMR डेटाबेस में जमा करती हैं." 

70 से अधिक विशेषज्ञों की ओर से लिखे गए ICMR पेपर में बताया गया है कि 11 मई और 3 मई, 2020 को 'भारत में संबंधित तारीखों को कुल 79,230 और 49,720 कोविड-19 केस रिपोर्ट हुए'. हालांकि, स्वास्थ्य मंत्रालय ने दी गई तारीखों पर क्रमश: 67,152 और 40,263  केसों की सूचना दी. जिसका मतलब है कि औसतन ICMR की तुलना में 10,000 कम केस दर्ज किए गए.

कोविड-19 डेटा में विसंगति 

स्वास्थ्य मंत्रालय की वेबसाइट ने क्रमशः 3 मई और 11 मई को ICMR की तुलना में लगभग 9,000 और 12,000 कम केसों की सूचना दी है. इससे पता चलता है कि संख्या की रिपोर्टिंग में भी अंतर धीरे-धीरे बढ़ता गया. विशेषज्ञों ने कहा कि यह ICMR और स्वास्थ्य मंत्रालय की संख्या के बीच बहुत बड़ा अंतर है. यह कोविड-19 की डेटा रिपोर्टिंग के बारे में संदेह पैदा करता है. 

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर ऑफ सोशल मेडिसिन एंड कम्युनिटी हेल्थ के डॉ. विकास बाजपेयी ने इंडिया टुडे से कहा, 'यदि आप उस समय कुल कोरोना केसों की संख्या देखें जो एक लाख से भी कम थे, तो 10,000 एक बहुत बड़ा अंतर है. कोई नहीं जानता लेकिन यह अंतर आज और भी बड़ा हो सकता है. सरकार को इस तरह की विसंगति को स्पष्ट करना चाहिए.' 

कुछ विशेषज्ञों का कहना है विसंगति इसलिए हो सकती है क्योंकि उस वक्त केसो की संख्या तेजी से बढ़ रही थी और स्वास्थ्य मंत्रालय के डैशबोर्ड तक पहुंचने में औसतन 2-3 दिन लगते थे. मिडलसेक्स यूनिवर्सिटी, लंदन के गणितज्ञ मुराद बानाजी कहते हैं, "स्वास्थ्य मंत्रालय की संख्या का यह टाइम लैग बताता है कि डेटा एकत्र करने और उसे समेटने में कुछ अक्षमताएं और देरियां थी. यह एक मुद्दा है."  

स्वास्थ्य मंत्रालय की वेबसाइट में राज्य डेटा टैब के फुटनोट में लिखा गया है, 'हमारे आंकड़े ICMR के साथ सामंजस्य स्थापित कर रहे हैं', लेकिन वेबसाइट में कोई भी पुराना डेटा नहीं है. सामंजस्यपूर्ण (Reconciled) डेटा को वैरीफाई करने के लिए इंडिया टुडे की डेटा इंटेलिजेंस यूनिट (DIU) ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के कोविड-19 डैशबोर्ड को चेक किया. हमने पाया कि भारत से रिपोर्ट किए गए केसों को 3 मई और 11 मई को क्रमश: 39,980 और 67,152 के रूप में लिस्टेड किया गया था. जबकि 11 मई का डेटा स्वास्थ्य मंत्रालय से मेल खाता है, वहीं 3 मई को लिस्टेड केस मंत्रालय की ओर से दर्ज किए गए केसों से भी कम थे. दोनों डेटा अभी भी ICMR की ओर से उसी दिन दर्ज किए गए डेटा से कम थे. 

स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, अगर कोई डेटा विसंगति है तो उसे मंत्रालय, ICMR और राज्यों द्वारा एक साथ बताया जाएगा. स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के सचिव राजेश भूषण ने कहा, 'देश में लगभग 30 राज्यों और अन्य केंद्र शासित प्रदेशों से डेटा आए. ऐसे में जब भी रोजाना रीयल टाइम के आधार पर आप बड़े डेटाबेस को मेंटेन करते हैं तो डेटा विसंगतियां होती हैं, लेकिन इन्हें दैनिक आधार पर बताया जाता है क्योंकि यह एक जारी रहने वाली प्रक्रिया है. ICMR, मंत्रालय की टीम के साथ-साथ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की टीमें इसे बताती हैं.'

डेटा विसंगति क्यों मायने रखती है? 

DIU ने ICMR के सीरो-सर्वेक्षण रिसर्च पेपर के विश्लेषण के दौरान कोविड डेटा में इस अंतर को देखा. हमने पाया कि ICMR ने संक्रमण की गणना में केस अनुपात के लिए लगभग 10,000 और केसों का उल्लेख किया है. ICMR ने संक्रमण और केस अनुपात को 3 मई और 11 मई को क्रमशः 130.1 और 81.6 बताया. आसान शब्दों में, केस अनुपात के लिए संक्रमण का अर्थ है कि कोविड-19 के हर एक RT-PCR पुष्टि के लिए, भारत में 82-130 अन्य संक्रमित लोग थे, जिन्हें हमने सर्वे अवधि के दौरान मिस किया.

डॉ. बानाजी ने बताया कि किसी निश्चित तिथि के लिए रिपोर्ट किए गए केसों में परिवर्तन के साथ केस संक्रमण अनुपात बदल जाएगा. डॉ बानाजी ने आगे कहा, "स्वास्थ्य मंत्रालय डेटा का उपयोग करते हुए 3 मई के लिए संक्रमण केस अनुपात 130 से 160 तक चला जाएगा. 11 मई के लिए अनुपात 82 से बढ़कर 96 हो जाएगा. लेकिन मुझे लगता है कि ICMR की संख्या सही है. संक्रमण केस अनुपात का अनुमान लगाने में कई अनिश्चितताएं हैं. सबसे बड़ी अनिश्चितता कुल संक्रमणों में है. 95% कॉन्फिडेंस इंटरवल 3.82 मिलियन से 11.1 मिलियन है, जो बहुत व्यापक है. सबसे बेहतर हम यह कह सकते हैं कि संक्रमण केस अनुपात अधिक था, उस वक्त कुल संक्रमणो के लगभग 1%  का ही पता चला था.” 

ICMR, हालांकि, इस बात से सहमत था कि रिपोर्ट किए गए केसों की दी गई संख्या में बदलाव होने पर भी सीरो-प्रीवेलेंस नहीं बदलेगा. डॉ. मनोज ने कहा, 'समग्र निष्कर्ष (मई 2020 की शुरुआत में SARS-CoV-2 प्रसार कम था) और साथ ही सीरो-प्रीवेलेंस भी नहीं बदलेगा. हालांकि, स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से रिपोर्ट किए गए RT-PCR + केसों की कम संख्या के साथ संक्रमण केस अनुपात उस गणना से अधिक होगा, जो हमने की थी.'

महामारी के समय में उसका असर कम रखने और व्यावहारिक रणनीतियां बनाने के लिए डेटा पारदर्शिता अहम है. ट्रेसिंग से लेकर आइसोलेशन और अन्य नीतिगत कदम केसों की प्रीवेलेंस की मैपिंग पर निर्भर करते हैं. डेटा की विसंगति न केवल सरकारी एजेंसियों में विश्वास को कमजोर करती है, बल्कि उनके आधार पर किए शोध के निष्कर्षों पर भी संदेह उत्पन्न करती है.

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