कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा ऐसे समय पर हो रही है, जबकि उसके सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं. इनमें सबसे बड़ी चुनौती ये कि अपने नेताओं को कैसे पार्टी छोड़ने से रोका जाए और कुछ नेताओं को वापस भी लाया जाए. इसके अलावा अपने कार्यकर्ताओं को कैसे एक्टिव किया जाए और जनता को अपने साथ लाया जाए ताकि 2024 के चुनाव में पार्टी बेहतर प्रदर्शन करे. राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा अपने उद्देश्यों के साथ इन चुनौतियों का भी सामना कर रही है.
कांग्रेस अगर आज अपने अस्तित्व के संकट का सामना कर रही है तो 1998 और 2004 के बीच भी पार्टी की हालत अच्छी नहीं थी. साल 1998 में बीजेपी 13 दिनों के कार्यकाल के बाद सत्ता में लौटी. 2004 के लोकसभा चुनावों में प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जीत के लिए पूरी तरह तैयार थे. शाइनिंग इंडिया के नारे के साथ ही ज्यादातर मीडिया पोल बीजेपी के पक्ष में थे, लेकिन इस चुनाव के परिणामों ने सबको चौंका दिया. वाजपेयी ने कहा कि यह एक ऐसा चुनाव था जिसमें विजेताओं को जीतने की उम्मीद नहीं थी और हमें हारने की.
2004 के चुनाव में कोई नहीं जानता था किस फैक्टर ने काम किया जो कांग्रेस को जीत मिली. ऐसी संभावना जताई जाती है कि शायद एक नारा, जो हरियाणा के सोनीपत में एक चुनावी रैली के दौरान आया था, उसने काम किया. जो जल्दी ही पार्टी का नारा बन गया. भारत चमक रहा है, लेकिन आम आदमी को क्या मिला?
कांग्रेस की 1998 वाली ही हालत साल 2014 में होनी शुरू हो गई, जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार बनी. क्या राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा भारत की राजनीति में नया मोड दे सकती है? इस यात्रा ने कांग्रेस और उसके समर्थकों में मनोबल बढ़ाने की उम्मीद जगाई है, लेकिन क्या ये भावनाएं पार्टियों की चुनावी किस्मत में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकती हैं?
हालांकि इसका जवाब आने वाले महीनों में ही मिल सकता है. आइए एक नजर उन लंबी पदयात्राओं पर डालते हैं, जो संकटग्रस्त राजनेताओं ने की थीं, जिनकी वजह से कई बड़े बदलाव आए क्योंकि अतीत में अकसर भविष्य के संकेत होते हैं. हम बाद में भारत जोड़ो यात्रा पर वापस आएंगे.
1- चंद्रशेखर, 1983
समाजवादी नेता चंद्रशेखर ने 1983 में राहुल गांधी की दादी और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ 4,200 किलोमीटर की भारत यात्रा की, जो तीन साल पहले उनकी जनता पार्टी को हराकर सत्ता में लौटी थीं. चंद्रशेखर लोगों का विश्वास वापस जीतना चाहते थे. कन्याकुमारी से दिल्ली तक की अपनी चार महीने की पदयात्रा के अंत में वह राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गए. वह गुरुग्राम के भोंडसी में अपने आश्रम में थे जब उन्होंने इंदिरा गांधी की हत्या की खबर सुनी.
साल 1989 के लोकसभा चुनाव में चंद्रशेखर ने एक लोकप्रिय नेता और राजीव गांधी के दोस्त से दुश्मन बने वीपी सिंह और दूसरी पार्टियों ने जनता दल का गठन किया. चंद्रशेखर को वीपी सिंह के प्रधानमंत्री बनने का तरीका पसंद नहीं आया. लालकृष्ण आडवाणी की गिरफ्तारी के बाद बीजेपी ने अपना वीपी सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया और ये सरकार गिर गई. बाद में चंद्रशेखर ने राजीव गांधी के समर्थन से अपनी सरकार बनाई और प्रधानमंत्री बने, लेकिन कांग्रेस की समर्थन वापसी के बाद महज 8 महीनों में ही ये सरकार गिर गई.
2- वाईएस राजशेखर रेड्डी, 2003
साल 2003, जब आंध्र प्रदेश विभाजित नहीं हुआ था, उस समय कांग्रेस निराशाजनक थी. राज्य में तेलुगु देशम पार्टी (TDP) ने करीब 3 दशकों तक शासन किया था. प्रदेश कांग्रेस के नेता वाईएस राजशेखर रेड्डी ने सत्ता का रास्ता समझा. उन्होंने 'प्रजा प्रस्थानम' नामक दो महीने की पदयात्रा की. उन्होंने अपने चुनाव अभियान के हिस्से के रूप में राज्य के कई जिलों में भीषण गर्मी के महीनों के दौरान लगभग 1,500 किमी की पैदल यात्रा की.
बड़े पैमाने पर जन-संपर्क कार्यक्रम ने लोकप्रिय भावनाओं को उलट दिया और चंद्रबाबू नायडू के नेतृत्व वाले टीडीपी के शासन को समाप्त कर दिया. रेड्डी ने मई 2004 में मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली और 2009 में विधानसभा चुनाव भी जीते. हालांकि उसी साल एक हेलीकॉप्टर हादसे में उनका निधन हो गया.
3: चंद्रबाबू नायडू, 2014
साल 2004 में वाईएस राजशेखर रेड्डी की पदयात्रा ने चंद्रबाबू नायडू को हराया था, उसके बाद 2009 में भी उन्हें हार का सामना करना पड़ा. उसके बाद टीडीपी नेता नायडू ने भी साल 2013 में वही रणनीति अपनाई. नायडू ने 208 दिन की 2,800 किमी की पदयात्रा की, जिसे वास्तुना मीकोसम (मैं आपके लिए आ रहा हूं) का नाम दिया गया. इस यात्रा ने चंद्रबाबू नायडू को प्रदेश की राजनीति में पुनर्स्थापित किया.
यात्रा के दौरान नायडू जनता के बीच खोई हुई अपनी पकड़ को फिर से स्थापित करते हुए नजर आए. साल 2014 के विधानसभा में उनकी पार्टी सत्ता में आई. यह वही साल था, जबकि चंद्रशेखर राव के नेतृत्व में तेलंगाना राष्ट्र समिति ने आंध्र प्रदेश से अलग हुए नए राज्य के रूप में तेलंगाना मिल गया था.
4- वाईएस जगन मोहन रेड्डी, 2017
अपने पिता वाईएस राजशेखर रेड्डी के निधन के बाद जगन मोहन रेड्डी ने भी लोगों से मिलने और उन्हें सांत्वना देने के लिए आंध्र प्रदेश का दौरा शुरू किया. जगन मोहन रेड्डी और कांग्रेस के बीच खटास थी, जिसके बाद उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और 2011 में अपनी खुद की वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (YSRCP) बनाई. साल 2012 में जब कांग्रेस केंद्र में थी, तब जगन को भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. 2014 के चुनाव में जगन मोहन रेड्डी की पार्टी चुनाव हार गई. लेकिन वह नेता प्रतिपक्ष बने. उसके बाद जगन ने आंध्र प्रदेश में 3648 किमी लंबी पैदल यात्रा शुरू की, जो 341 दिन तक चली. साल 2019 के विधानसभा चुनाव में जगन मोहन रेड्डी मुख्यमंत्री बने.
5: दिग्विजय सिंह, 2017
कांग्रेस के सीनियर नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने 2017 में राज्य में नर्मदा नदी के किनारे 3,300 किलोमीटर की यात्रा की. दिग्विजय ने इस परिक्रमा को पूरी तरह से गैर-राजनीतिक बताया और कहा कि यह धार्मिक और आध्यात्मिक है. लेकिन यह स्पष्ट था कि 6 महीने की इस यात्रा में एक व्यापक जन संपर्क कार्यक्रम था. बाद में साल 2018 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने बीजेपी को हराया और कमलनाथ मुख्यमंत्री बने, लेकिन बाद में ज्योतिरादित्य सिंधिया की बगावत ने बीजेपी को सत्ता दिला दी. खैर दिग्विजय की इस यात्रा ने कांग्रेस को राज्य में पुनर्जीवित किया और सत्ता दिलाई.
राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा, 2022
कन्याकुमारी से कश्मीर तक राहुल गांधी की 5 महीने की भारत जोड़ो यात्रा हाल के सालों में सबसे लंबी यात्रा है. राहुल को बारिश में सुनने के लिए लोग पहुंच रहे हैं. यात्रा में छोटे बच्चों, युवाओं, बुजुर्गों, महिलाओं को गले लगाने या अपनी मां सोनिया गांधी के जूते के फीते बांधने की फोटो भी वायरल हो रही हैं.
कांग्रेस की टीम राहुल को एक सम्मानित और प्यार करने वाले राजनेता के रूप में पेश करने की कोशिश कर रही है. वहीं सीनियर नेता जयराम रमेश की सकारात्मक आक्रामक संचार रणनीति चीजों को संतुलित कर रही है. पार्टी के प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत और पवन खेड़ा किसी भी तरह की गलत सूचना पर आक्रामक रुख अपना रहे हैं.
भारत जोड़ो यात्रा कांग्रेस और राहुल गांधी को आने वाले चुनावों में कितनी मदद करेगी ये तो समय ही बताएगा. लेकिन ऐसा पहली बार देखा जा रहा है जबकि राहुल गांधी जनता के बीच ऐसे चल रहे हैं. इससे लोगों के मन में राहुल के प्रति सद्भावना पैदा हो रही है. कांग्रेस पार्टी का मानना है कि उसे नए वोटर नहीं चाहिए. उसे वही चाहिए जो साल 2014 में उसका साथ छोड़कर चले गए थे.
वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार इफ्तिखार गिलानी कहते हैं कि राजनीति बॉलीवुड फिल्म की तरह है क्योंकि कोई नहीं जानता कि जनता को क्या अच्छा लगेगा. यात्राएं कुछ हद तक पार्टी कार्यकर्ताओं को उत्साहित करने में काम कर सकती हैं, लेकिन मतदाताओं की पसंद पर उनका सीमित प्रभाव है.
गिलानी ने कहा कि 2014 की हार दरअसल राहुल गांधी के लिए एक मौका था, जिसमें वो पार्टी में नए और युवा चेहरों को सामने लेकर आ सकते थे, नए रास्ता बना सकते थे, लेकिन वह सफल नहीं हुए. वह मोदी सरकार की विफलताओं का इंतजार कर रहे थे, जैसा कि 1977 में इंदिरा गांधी ने किया था. भाजपा के पास अपनी विचारधारा में मजबूत कैडर आधार है. कांग्रेस यह नहीं जानती कि इसका सामना कैसे किया जाए. इसलिए राहुल गांधी कभी धर्मनिरपेक्षता की तो कभी नरम हिंदुत्व की शरण लेते हैं.
भारत जोड़ो यात्रा राजनीति में अहम मोड?
दरअसल यह एक कठिन सवाल है. क्या 2022 का भारत जोड़ो 2004 के आम आदमी को क्या मिला के नारे के रूप में प्रभावी साबित हो सकता है, विशेष रूप से यह देखते हुए कि भाजपा की चुनावी मशीन कैसे संचालित होती है.