राजधानी दिल्ली के कमानी ऑडिटोरियम में मंचित नाटक ‘हमारे राम’ ने पौराणिक कथानक के जरिए सम-सामयिक मुद्दों को बेहद संवेदनशीलता के साथ उठाता है. इस नाटक में राजा से सवाल पूछने की जरूरत से लेकर नारी अस्मिता, मैरिटल रेप और समानता के अधिकारों जैसे गंभीर मुद्दों पर गहरी चर्चा की गई है. दर्शकों ने न केवल इस नाटक को सराहा, बल्कि इसके द्वारा प्रस्तुत किए गए सामाजिक और न्यायिक मुद्दों पर गंभीरता से विचार करने के लिए प्रेरित भी हुए.
लव-कुश के सवाल और सनातन की खूबसूरती
नाटक का एक महत्वपूर्ण दृश्य वह था, जिसमें महर्षि वाल्मीकि लव-कुश को श्रीराम के सामने प्रस्तुत करते हैं और उन्हें गले लगाने को कहते हैं. लेकिन मां के जाने के दुख से व्यथित लव-कुश श्रीराम को कठघरे में खड़ा कर देते हैं और उन्हें व्यंग्यात्मक रूप में ‘सम्राट’ कहते हुए उनसे प्रश्न पूछते हैं. यह दृश्य सनातन परंपरा और भारतीय राजनीति की परिपक्वता को दर्शाता है, जहां राजा सर्वेसर्वा होते हुए भी व्यवस्था से बड़ा नहीं होता. राजा या सम्राट किसी भी प्रश्न से परे नहीं हो सकता, और जब वह खुद को इस विधान से अलग कर लेता है, तो वह राजा नहीं रह जाता. यह सीन नाटक की सबसे बड़ी खूबसूरती बनकर सामने आता है.

रावण ने भी बताए राजा के जरूरी गुण
इसी एक बात नाटक में, महाकाव्य का सबसे बड़ा खलनायक रावण भी कहता हुआ सुनाई देता है. नाटक के आखिरी सीन में, जहां रावण, मृत्यु से पहले घायल अवस्था में लक्ष्मण को जीवन दर्शन का ज्ञान देता है, तो वह कहता है कि, जो कोई भी व्यक्ति व्यवस्था बनाता है, वह खुद भी व्यवस्था से बड़ा नहीं हो सकता है. जिस दिन वह खुद को अपनी ही बनाई व्यवस्था से अलग, उससे बड़ा और खुद को किसी भी व्यवस्था से परे मानना शुरू कर देगा, उस दिन सबसे पहले वही व्यवस्था को तोड़ने वाला बन जाएगा. यह श्रीराम की नीति और मर्यादा नहीं है. वह किसी मर्यादा को बनाते हैं तो पहले खुद उसका पालन करते हैं और अंतिम क्षण तक पालन करते हैं. यही करना भी चाहिए.
सम-सामयिक विषयों पर व्यंग्य और सवाल
नाटक केवल पौराणिक दृष्टिकोण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कई सम-सामयिक मुद्दों को भी चुटीले व्यंग्यों और तीखे सवालों के माध्यम से सामने लाया गया. नाटक ने मैरिटल रेप, स्त्री अधिकार, नारी स्वतंत्रता, न्याय व्यवस्था, और धर्म की वास्तविक पहचान जैसे मुद्दों को अपनी कहानी के केंद्र में रखा. नाटक ने इस बात पर भी प्रहार किया कि आज का समाज सनातन मूल्यों से कितना दूर हो गया है और श्रीराम के गुणों को समझने के बजाय उन्हें केवल पूजा तक सीमित कर दिया गया है.
रंभा का दुष्कर्म और मैरिटल रेप का मुद्दा
नाटक में एक दृश्य में रावण द्वारा अप्सरा रंभा के साथ दुष्कर्म का अभिनय किया गया है. रंभा, जो नलकुबेर की पत्नी थी, रावण को यह याद दिलाती है कि वह उसके लिए श्वसुर समान है. इसके बावजूद, रावण अपनी वासना में इतना अंधा हो जाता है कि वह उसे अपमानित करता है. रंभा इस दौरान रावण की उपेक्षा करते हुए कि विवाह के भीतर भी जबरदस्ती से बनाए गए संबंध भी दुष्कर्म ही होते हैं. यह दृश्य मौजूदा समय में मैरिटल रेप पर चल रही बहस को नई दिशा देता है, जहां आज भी इस मुद्दे पर स्पष्टता की कमी है और कोर्ट में अभी भी दलीलों का सिलसिला जारी है.

सीता स्वयंवर और पत्नी के अधिकार
नाटक में राम-सीता के स्वयंवर का दृश्य भी बेहद प्रभावशाली था. इस दृश्य में श्रीराम सीता को विवाह के समय एक पत्नीव्रत बने रहने का वचन देते हैं और यह कहते हैं कि राम के जीवन में केवल एक ही पत्नी रहेगी. यह संदेश आधुनिक समाज में पति-पत्नी के रिश्ते में समानता और सम्मान का प्रतीक है. श्रीराम के इस वचन ने दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर किया कि पति-पत्नी के संबंधों में नारी के अधिकार और सम्मान को किस तरह से सुनिश्चित किया जा सकता है.
जटायु का अंतिम संस्कार और मानवीयता का संदेश
सीताहरण के बाद, श्रीराम द्वारा गिद्धराज जटायु का अपने पिता समान दाह संस्कार करने का दृश्य मानवीयता की एक अद्वितीय मिसाल प्रस्तुत करता है. इस दृश्य ने न केवल पौराणिकता को जीवंत किया, बल्कि मानवीय संबंधों के महत्व को भी दर्शाया. श्रीराम द्वारा जटायु को पिता तुल्य कहकर संबोधित करना इस बात का प्रतीक था कि धर्म केवल देवताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें सभी प्राणियों के प्रति समानता और सम्मान की भावना होनी चाहिए.

आशुतोष राणा ने जीवंत किया रावण का किरदार
तीन घंटे तक चले इस नाटक में श्रीराम की संस्कृति और रावण की संस्कृति के बीच के अंतर को सामने रखा गया. दोनों के संवादों ने दर्शकों को गहरे जीवन दर्शन और मानव संघर्षों के बारे में सोचने पर मजबूर किया. नाटक का सेट, प्रकाश व्यवस्था और संगीत भी मंत्रमुग्ध कर देने वाला और प्रभावशाली था, जिसने कहानी को और अधिक जीवंत और प्रेरक बना दिया. नाटक ‘हमारे राम’ ने दर्शकों को बेहद प्रभावित किया और नाटक के अंत ही नहीं, बल्कि बीच-बीच में हर खास मौके पर ऑडिटोरियम में तालियों की गड़गड़ाहट गूंजता रहा. आशुतोष राणा के रावण के जटिल और बहुआयामी चरित्र को बखूबी निभाने की सराहना हर ओर से सुनाई दी. कई दर्शकों ने पहली बार रावण को एक विद्वान और ज्ञानी के रूप में देखा, जिसकी आत्म-खोज और मोक्ष की यात्रा को इतने गहरे दृष्टिकोण से समझाया गया.
‘हमारे राम’ नाटक ने न केवल पौराणिक पात्रों को नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया, बल्कि नारी अस्मिता, मैरिटल रेप और समानता के अधिकार जैसे मुद्दों पर भी ध्यान आकर्षित किया. आशुतोष राणा के अभिनय और निर्देशन ने नाटक को एक यादगार अनुभव बना दिया, जिसने दर्शकों को मनोरंजन के साथ-साथ समाज के प्रति एक नई सोच भी दी.