जिस आदमी या समूह की सफलता की कहानी लिखी गई, जिसके बिजनेस ग्रोथ और एम्पायर की ख़ूब बात हुई, उस अडानी ग्रुप के भविष्य को लेकर आशंका के बादल हैं, मुश्किलें हैं जो कम होने का नाम नहीं ले रही हैं. उनकी सात मेन लिस्टेड कम्पनियां अडानी एंटरप्राइजेज 50 प्रतिशत से अधिक, अडानी ग्रीन एनर्जी & अडानी टोटल गैस 40 प्रतिशत से अधिक, अडानी ट्रांसमिशन & अडानी पोर्ट्स 35 प्रतिशत के करीब, अडानी पॉवर और अडानी विल्मर हफ्ते भर में 20 प्रतिशत तक लुढ़क गईं हैं. इनके अलावा अडानी ग्रुप ने जिन कम्पनियों का अधिग्रहण किया है, एसीसी सीमेंट, अम्बुजा सीमेंट से लेकर एनडीटीवी तक, इनके शेयर्स में भी भारी गिरावट आई है. वजह एक रिपोर्ट जिसको फॉरेंसिक फाइनेशियल रिसर्च फर्म हिंडनबर्ग ने जारी किया और 88 सवाल पूछकर कई गम्भीर आरोप लगाएं.
लेकिन अब मामला ये केवल बिजनेस तक ही सीमित नहीं रह गया है. राजनीति इस पर हावी हो गई है, विपक्ष अडानी ग्रुप पर लगे आरोपों की जांच के लिए JPC यानी जॉइंट पार्लियामेंट्री कमिटी के गठन की मांग कर रहा है ताकि आरोपों की ईमानदार जांच हो सके. उधर निवेशक हों, चाहे लोन देने वाले बैंक या फिर आम लोग, वे इस उलझन में हैं कि अडानी ग्रुप का आगे क्या होगा, जिस स्केल का डाउनफॉल है, उबरने में कितना समय लग सकता है? 'आज का दिन' में सुनने के लिए क्लिक करें.
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कुछ दिनों पहले बसपा प्रमुख मायावती का एक बयान आया. उन्होंने कहा कि आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनाव में बसपा अकेले लड़ेगी. इसके बाद बसपा के राजनीतिक भविष्य की बात होने लगी. लेकिन अभी इस ऐलान को ठीक से महीना भर भी नहीं हुआ था कि हाथी की चाल बदल गई. गठबंधन में ना आने का फैसला करने वाली मायावती ने लगभग अब ये तय कर किया है कि वो पंजाब में 2024 लोकसभा चुनाव शिरोमणि अकाली दल के साथ लड़ेंगी. दिल्ली में दोनों पार्टियों के बीच इस विषय पर कल बातचीत हुई जिसे मायावती ने पॉजिटिव कहा है. ये दोनों ऐसी पार्टियां हैं जिनकी एक समय पंजाब और यूपी में धाक थी लेकिन वक़्त बदला और चीज़ें भी. पिछले साल यूपी चुनाव में बसपा को एक सीट मिली तो पंजाब में शिरोमणि अकाली दल के खाते में मात्र तीन सीटें आईं. लेकिन पंजाब में ये जो साथ आने का प्रयास है, वो नया नहीं है. इससे पहले 1996 में बसपा और अकाली दल ने साथ में लोकसभा चुनाव लड़ा था और 13 में से 11 सीटें जीती थीं. इसके बाद दोनों पार्टियां पिछले पंजाब विधानसभा चुनाव में साथ आईं थी लेकिन कुछ कमाल न कर सकीं. सवाल है कि इस बार दोनों का साथ आना लोकसभा चुनाव के लिहाज़ से किसके लिए फ़ायदेमंद होगा? शिरोमणि अकाली दल ले लिए, बसपा के लिए या किसी तीसरे / चौथे के लिए. जब बसपा ने ये ऐलान कर दिया था कि वो अब गठबंधन में चुनाव नहीं लड़ेगी तो इसके बाद उसने शिरोमणी अकाली दल के साथ आने का फैसला क्यों किया? ये साथ इनके फ्यूचर के लिए कितना अहम है और ये कितना इफेक्टिव हो सकता है, चुनाव में? 'आज का दिन' में सुनने के लिए क्लिक करें.
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सऊदी अरब, बस इतना गूगल करिए. चमचमाती गगनचुंबी इमारतें, लम्बी - चौड़ी सड़कें और पर्यटन के लिए अपनी ओर खींचते एक से एक दिलचस्प विज्ञापन का अंबार लग जाएगा. लेकिन जैसा छुटपन में हम एक कहावत पढ़ते कि ऑल दैट ग्लिटर्स इज नॉट गोल्ड यानी हर चमकने वाली चीज़ सोना नहीं होती. सऊदी अरब की दुनिया भी हर मायने में इतनी सुंदर नहीं. मिसाल के तौर पर वहां दी जाने वाली क्रूर सज़ाएं, असंतोष की हर आवाज़ को कुचलने में उनका महारथ. हम ये इसलिए बता रहे हैं आपको कि कल एक रिपोर्ट आई, ब्रिटिश न्यूज़पेपर द गार्डियन में. इसमें कहा गया कि मोहम्मद बिन सलमान, एमबीएस, जो वहां के मौजूदा क्राउन प्रिंस है, उनके शासन में सऊदी अरब में मौत की सज़ा ऐतिहासिक तौर पर बढ़ी है. साल 2015 से 2022 के बीच हर साल औसतन 129 फांसी दी गई. ये आंकड़ा 2010-14 की तुलना में 82 फीसदी अधिक था. पिछले साल, 147 लोगों को फांसी दे दी गई. एक ओर एमबीएस की शो कॉल्ड उदार छवि जहां वे महिलाओं के अधिकार, अरब स्टेट को प्रोग्रेसिव बनाने की वक़ालत करते हैं, इस दिशा में उनके कुछ कदमों की तारीफ़ भी हुई, चाहें वो महिलाओं को पहले ड्राइविंग की इजाजत देना, उन्हें हिजाब पहनने की बाध्यता से छुटकारा दिलाना. लेकिन दूसरी ओर सज़ा के नाम पर इस तरह की भयानक संकीर्णता, बेरहमी, ये MBS को बतौर शासक और सऊदी के हालात को किस तरह पेश करता है? MBS की चीन से नज़दीकियों और अमेरिका से एक खटास की भी बहुत बात होती है, तो क्या ये एक तरह का चीन मॉडल है जहां चमचमाती गाड़ियां हैं, बड़े बड़े टावर्स हैं, आर्थिक तरक्की है लेकिन आपको बोलने की आज़ादी नहीं है? 'आज का दिन' में सुनने के लिए क्लिक करें.