महाराष्ट्र में सियासी तस्वीर तेजी से बदल रही है. महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने शनिवार को देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री और अजित पवार को उपमुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई. कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और शिवसेना ने सुप्रीम कोर्ट में इसे चुनौती दी है. जस्टिस एनवी रमन, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस संजीव खन्ना की बेंच रविवार को इस मामले पर सुनवाई करने वाली है.
राजनीतिक घटनाक्रम जिस तरह से आगे बढ़ रहा है, उससे लग रहा है कि महाराष्ट्र की सियासत उस मोड़ पर पहुंच गई है, जहां 2018 में कर्नाटक की राजनीति पहुंची थी. महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगा हुआ था लेकिन शनिवार सुबह जो कुछ हुआ उसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी. देवेंद्र फडणवीस ने सीएम पद की शपथ ले ली. इससे पूरे सियासी गलियारे में सभी हैरान रह गए. शाम होते-होते यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया.
महाराष्ट्र में नई सरकार को लेकर शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी ने सु्प्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करके राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी के उस आदेश को रद्द करने की मांग की है, जिसमें उन्होंने सूबे में सरकार बनाने के लिए देवेंद्र फडणवीस को आमंत्रित किया था. सुप्रीम कोर्ट तीनों दलों की याचिका पर सुनवाई करेगी. यह सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की कोर्ट नंबर 2 में आज सुबह 11:30 बजे होगी.
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका में शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी ने 288 सदस्यीय महाराष्ट्र विधानसभा में 154 विधायकों के समर्थन का दावा भी किया. तीनों पार्टियों ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया कि अदालत जल्द से जल्द और संभव हो तो रविवार को ही विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर फ्लोर टेस्ट का निर्देश दे. इससे यह स्पष्ट हो जाएगा कि बहुमत उद्धव ठाकरे के पास है या देवेंद्र फडणवीस के पास.
2018 में क्या हुआ था कर्नाटक में?
अब सवाल है कि महाराष्ट्र का सियासी घटनाचक्र क्या वहीं पहुंच गया है, जहां 2018 में कर्नाटक की राजनीति पहुंच गई थी. असल में, 2018 में कर्नाटक में विधानसभा चुनाव के बाद राज्यपाल वजुभाई वाला ने सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया और बीजेपी नेता बीएस येदियुरप्पा ने मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली.
राज्यपाल ने सबसे अधिक सीटों पर जीत हासिल करने वाली पार्टी मतलब बीजेपी को सरकार बनाने का न्योता दिया. लेकिन कांग्रेस और जेडीएस ने इसका विरोध किया है और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. दोनों दलों ने सुप्रीम कोर्ट के सामने फौरन फ्लोर टेस्ट कराए जाने की मांग रखी. सुप्रीम कोर्ट ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके बीएस येदियुरप्पा को अपना बहुमत साबित करने का आदेश दिया. उस दौरान कर्नाटक में बीजेपी के पास 104 विधायक थे और माना जा रहा था कि उसके लिए कांग्रेस और जेडीएस के विधायकों को तोड़ना आसान नहीं है.
इससे पहले राज्यपाल ने येदियुरप्पा को विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए 15 दिनों का वक्त दिया था. इस पर कांग्रेस का कहना था कि ऐसा करके राज्यपाल ने विधायकों की खरीद-फरोख़्त के लिए रास्ता साफ कर दिया है. बाद में कांग्रेस ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और अदालत ने कहा कि 19 मई 2018 को शाम चार बजे ही बहुमत साबित करना होगा. बीजेपी की सरकार विधानसभा में फ्लोर टेस्ट का सामना नहीं कर सकी और मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने इस्तीफा दे दिया. इसके बाद कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन की सरकार बनी
कर्नाटक में बीजेपी ने खूब कोशिशें कीं और लगातार माहौल बनाया कि उसके पास कांग्रेस और जेडीएस के कुछ विधायकों का समर्थन है. लेकिन आखिरकार ये सब धरा रह गया. 19 मई को कर्नाटक विधानसभा में बहुमत साबित करने से पहले येदियुरप्पा ने विधानसभा में इमोशनल भाषण दिया और फिर इस्तीफे की घोषणा कर दी. मतलब साफ था कि उनके पास बहुमत नहीं था.
अब ऐसी ही तस्वीर महाराष्ट्र में बनती हुई दिख रही है. हालांकि अभी यह देखना होगा कि राष्ट्रवादी कांग्रेस और शिवसेना की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट क्या फैसला सुनाता है. बहरहाल, फैसला चाहे जो हो लेकिन महाराष्ट्र की सियासत का कानून की गलियों से होकर गुजरने के घटनाक्रम पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं.