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महाराष्ट्र में हिंसाः CM फड़नवीस के सामने सबसे बड़ा राजनीतिक संकट

महाराष्ट्र के हृदय में जो आग धधक रही है, वो फड़नवीस की मुश्किलें बढ़ाने वाली है. मराठा महासंघ अगले महीने से आरक्षण को लेकर अपना आंदोलन दोबारा शुरू करने की तैयारी में है.

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महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस

देवेंद्र फड़नवीस अपने तीन साल के कार्यकाल में बतौर मुख्यमंत्री महाराष्ट्र में सबसे बड़े राजनीतिक संकट का सामना कर रहे हैं. उग्र दलित आंदोलनों और अपर कास्ट राइट विंग हिंदुत्व की आक्रामकता में फंसे फड़नवीस के लिए आने दिनों में भी राहत की उम्मीद नहीं दिख रही है.

टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक महाराष्ट्र के हृदय में जो आग धधक रही है, वो फड़नवीस की मुश्किलें बढ़ाने वाली है. मराठा महासंघ अगले महीने से आरक्षण को लेकर अपना आंदोलन दोबारा शुरू करने की तैयारी में है.

राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो मराठा समुदाय की मांग यह भी है कि अत्याचार अधिनियम में ढील दी जानी चाहिए. इसकी वजह से दलित संगठनों में उबाल है.

दूसरी ओर बीजेपी के अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि शरद पवार की पार्टी एनसीपी देवेंद्र फड़नवीस के लिए मुश्किलें खड़ी कर रही है. एनसीपी के लिए यह आसान भी है क्योंकि फड़नवीस ब्राह्मण समुदाय से आते हैं.

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बीजेपी के एक नेता के मुताबिक महाराष्ट्र में जाति की राजनीति को बढ़ावा देने के लिए एनसीपी मराठा कार्ड खेल रही है. हालांकि दलित संगठन बीजेपी की इस बात से सहमत नहीं है. दलित जन शक्ति संगठन के मुख्य रणनीतिकार अर्जुन डांगले बीजेपी के इन आरोपों से सहमत नहीं दिखते.

उन्होंने पवार के खिलाफ आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि शरद पवार ही पहले शख्स थे, जिन्होंने सामाजिक सौहार्द बनाए रखने की अपील की.

इससे पहले देवेंद्र फड़नवीस के लिए किसानों से जुड़े मुद्दे परीक्षा लेते रहे हैं. चाहे वो मामला विदर्भ में सूखे का हो या किसानों की आत्महत्या और कर्जमाफी का. फड़नवीस सरकार ने किसान कर्जमाफी करके किसी तरह मामले को संभाल लिया.

हालांकि इस मुद्दे पर उसे अपनी ही सहयोगी पार्टी शिवसेना के प्रकोप का सामना करना पड़ा. लेकिन हाल में उठा जातिगत हिंसा का मामला किसान कर्जमाफी से ज्यादा खतरनाक है. जातियों के बीच टकराव की कीमत फड़नवीस और बीजेपी को भारी पड़ सकती है.

सूत्रों के मुताबिक बीजेपी के लिए दो बड़ी चिंताएं नजर आ रही हैं. पहली ये कि दलितों ने बुधवार को राज्य भर में अपनी ताकत का प्रदर्शन किया है. पुणे, सातारा, कोल्हापुर, जलगांव, औरंगाबाद और कोंकण जैसे जिलों में जिंदगी ठहर सी गई. ये सभी इलाके बीजेपी, कांग्रेस, शिवसेना और एनसीपी जैसी पार्टियों के गढ़ हैं.

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दूसरा ये कि राज्य में जिस तरह से जातीय हिंसा की घटनाएं बढ़ी हैं, उससे बीजेपी के माथे पर चिंता की लकीरें हैं. जातीय हिंसा एक तरीके से ग्रामीण मुद्दा माना जाता रहा है, लेकिन बुधवार के महाराष्ट्र बंद ने मुंबई को घंटों रोके रखा.

खबरों के मुताबिक पूरे मामले पर निगाह रखे हुए हैं. ये माना जा रहा है कि पार्टी हाईकमान ने देवेंद्र फड़नवीस को इस बात का निर्देश दिया कि पूरे मामले में शांति से निपटा जाए. यही वजह है कि मुंबई पुलिस ने दलित प्रदर्शनकारियों पर कड़ी कार्रवाई नहीं की.

राज्य सरकार की कोशिश थी कि दलित का आक्रोश सड़क पर निकल जाए. हालांकि बीजेपी में ही कई लोगों का मानना है कि पार्टी हिंदुत्व के झंडाबरदारों के पर न कतरने की कीमत चुका रही है.

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