राजनीति के पटल पर कुछ नाम ऐसे होते हैं जो केवल सत्ता के गलियारों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वे अपने काम और व्यक्तित्व से एक अमिट छाप छोड़ जाते हैं. महाराष्ट्र की राजनीति के 'दादा' कहे जाने वाले अजित पवार का जाना राज्य के लिए एक ऐसे युग का अंत है, जिसे उनके काम करने की शैली, अनुशासन और विकास के प्रति उनके जुनून के लिए याद किया जाएगा.
वरिष्ठ पत्रकार अभिजीत करंडे ने अजित पवार के साथ बिताए दो दशकों के अनुभवों को साझा करते हुए उनके व्यक्तित्व के उन पहलुओं को उजागर किया है, जो अक्सर सुर्खियों से दूर रहे.
अभिजीत बताते हैं, "आज (बुधवार) सुबह जब मैंने अजित पवार के दुखद निधन की खबर सुनी, तो दिमाग अचानक राजनीति से हटकर साहित्य की ओर चला गया. अमृता प्रीतम की एक किताब याद आई, जिसकी पहली पंक्ति है, 'मरने के बाद आदमी का क्या रह जाता है?'
यही सवाल मेरे मन में भी था. क्योंकि पिछले बीस सालों से मैं अजित पवार की राजनीति को बहुत करीब से देख रहा था. अगर उनके राजनीतिक जीवन को समझना हो, तो मुझे लगता है कि उसे तीन-चार दायरों में देखना जरूरी है."
शरद पवार की छाया से अपनी पहचान तक
अजित पवार के राजनीतिक जीवन की शुरुआत उनके चाचा और मेंटर शरद पवार के मार्गदर्शन में हुई. 1991 में जब वे पहली बार लोकसभा के लिए चुने गए, तब वे राजनीति में एक नए सितारे थे. लेकिन कुछ ही समय बाद शरद पवार के लिए सीट खाली करने और महाराष्ट्र की राजनीति में लौटने के बाद उन्होंने मुड़कर नहीं देखा.
अक्सर कहा जाता है कि एक विशाल वटवृक्ष के नीचे छोटे पौधे पनप नहीं पाते, लेकिन अजित पवार ने इस कहावत को गलत साबित किया. उन्होंने शरद पवार की विशाल राजनीतिक छाया में रहते हुए भी अपनी एक स्वतंत्र और सशक्त पहचान बनाई. 1995 से 2024 तक लगातार छह बार बारामती से विधायक चुनकर आना उनकी लोकप्रियता और उनके जमीनी काम का सबसे बड़ा प्रमाण है.
प्रशासन का अनुशासन और विकास का विजन
अजित पवार की सबसे बड़ी पहचान उनके काम करने के तरीके से थी. वे एक ऐसे नेता थे जो लेटलतीफी को कतई बर्दाश्त नहीं करते थे. चाहे पुलिस अफसर हों या प्रशासनिक अधिकारी, अजित पवार के नाम का एक खौफ सिस्टम में रहता था. यह खौफ किसी तानाशाही का नहीं, बल्कि काम के प्रति उनकी जवाबदेही का था. उन्हें प्रक्रिया की गहरी समझ थी और वे खुद समय के इतने पाबंद थे कि अधिकारी भी उनके साथ काम करने के लिए हमेशा मुस्तैद रहते थे.
पुणे और पिंपरी-चिंचवाड़ की आज जो सूरत हम देखते हैं, चाहे वह हिंजवड़ी का आईटी हब हो, मोशी या चाकन की एमआईडीसी हो, या शहर का आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर. इसकी ईंट-दर-ईंट अजित पवार के हाथों रखी गई है. जब वे पुणे के पालक मंत्री थे, तब उन्होंने जिस तरह से इन शहरों को विकसित किया, वह आज के नेताओं के लिए एक केस स्टडी है.
सहकारिता और अजित दादा का कुनबा
पश्चिमी महाराष्ट्र की राजनीति की रीढ़ कहे जाने वाले सहकारिता क्षेत्र पर अजित पवार की गहरी पकड़ थी. शुगर मिलों से लेकर जिला बैंकों तक, उन्होंने केवल संस्थाएं नहीं चलाईं, बल्कि लोगों को राजनीतिक और आर्थिक रूप से खड़ा किया. उन्होंने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के भीतर अपना एक ऐसा समर्पित 'कुनबा' तैयार किया था, जिनके लिए अजित पवार ही उनके सर्वेसर्वा और मार्गदर्शक थे. खेती, सिंचाई और सहकारिता में उनकी रुचि केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि तकनीकी रूप से भी बहुत गहरी थी.
अजित पवार को बाहर से एक कठोर और बेबाक नेता माना जाता था. उनका एक प्रसिद्ध डायलॉग था, "मैं किसी के काम में टांग अड़ाता नहीं और अगर कोई मेरे सामने आ जाए तो मैं उसे छोड़ता नहीं." लेकिन इस कठोरता के पीछे एक बेहद संवेदनशील और भावुक हृदय भी था.
अभिजीत करंडे ने एक किस्सा साझा करते हुए बताया कि कैसे एक बार अजित पवार ने एक छोटे कार्यकर्ता को उसकी फाइल के लिए पहले तो झाड़ा, लेकिन बाद में अधिकारियों को निर्देश देते हुए कहा कि अगर हम इन कार्यकर्ताओं का काम नहीं करेंगे और इन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं बनाएंगे, तो क्या ये सिर्फ हमारे झंडे ढोते रहेंगे? यह दिखाता है कि वे अपने कार्यकर्ताओं के प्रति कितने फिक्रमंद थे.
राजनीतिक संघर्ष और पारिवारिक पीड़ा
अजित पवार का जीवन विवादों और चुनौतियों से भी अछूता नहीं रहा. सिंचाई घोटाले के आरोपों और उसके बाद उनकी बहनों के घरों पर हुई ईडी की छापेमारी ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया था. उनके करीबियों के अनुसार, जब उनका परिवार इन विवादों में घसीटा गया, तब वे काफी निराश और गुमसुम रहने लगे थे. अपने परिवार और राजनीतिक अस्तित्व को बचाने की जद्दोजहद ही शायद वह वजह थी जिसने उन्हें भाजपा के साथ जाने का कठिन फैसला लेने पर मजबूर किया.
बीजेपी के साथ जाने के बाद कई लोगों को लगा कि वे शरद पवार के सामने टिक नहीं पाएंगे, लेकिन 2024 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने कड़ी मेहनत की और 40 से अधिक विधायक जिताकर अपनी ताकत साबित की.
बारामती: जहां से सफर शुरू हुआ, वहीं थमीं सांसें
अजित पवार का दिल हमेशा महाराष्ट्र की मिट्टी में धड़कता रहा. उन्होंने कभी दिल्ली की राजनीति में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई. उनका पूरा संसार बारामती और महाराष्ट्र के लोगों तक सीमित था. वे बारामती को अपना घर मानते थे और बारामती के लोगों ने भी उन्हें हमेशा रिकॉर्ड वोटों से जिताकर अपना प्यार दिया.
यह नियति की एक दुखद विडंबना ही है कि जो नेता अपने लोगों के लिए हमेशा उपलब्ध रहा, जिसकी राजनीति बारामती की गलियों से शुरू हुई, उसकी जीवन यात्रा भी बारामती की उसी मिट्टी में समाप्त हुई. जब वे चुनाव प्रचार के लिए अपने क्षेत्र की ओर जा रहे थे, तभी उन्होंने अंतिम सांस ली.
अजित पवार के निधन से महाराष्ट्र ने एक ऐसा 'एडमिनिस्ट्रेटर' खो दिया है जिसकी कमी लंबे समय तक महसूस की जाएगी. वे एक ऐसे योद्धा थे जिन्होंने अपनी शर्तों पर राजनीति की और अंत तक अपने काम के प्रति समर्पित रहे.