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मध्य प्रदेशः पानी के लिए बच्चों की जान दांव पर

आजादी के 67 साल बीत जाने के बाद भी बच्चों को पीने के पानी के लिए अपनी जान दांव पर लगाना पड़ रहा है. गांव के लोगों ने इस बारे में प्रशासन से कई बार शिकायत की, लेकिन नतीजा सिफर ही रहा. वहीं पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग के आला अफसर भी वहां के पानी में फ्लोराइड होने की बात कहकर पल्ला झाड़ रहे हैं.

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आजादी के 67 साल बीत जाने के बाद भी बच्चों को पीने के पानी के लिए अपनी जान दांव पर लगाना पड़ रहा है. गांव के लोगों ने इस बारे में प्रशासन से कई बार शिकायत की, लेकिन नतीजा सिफर ही रहा. वहीं पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग के आला अफसर भी वहां के पानी में फ्लोराइड होने की बात कहकर पल्ला झाड़ रहे हैं.

ये कहानी मध्य प्रदेश के मंडला के इस अकेले गांव की नहीं है, बल्कि आसपास के दर्जनों गावों में पीने के पानी का जबरदस्त संकट है. गर्मी की शुरुआत में ही पीने के पानी के स्रोत सूख जाते हैं, कुएं में भी पानी तल तक पहुंच जाता है.

बेरपानी के स्थानीय स्थानीय निवासी मनोज ने कहा, 'पानी मिलता ही नहीं है लिहाजा कुएं में उतरना पड़ता है. डर लगता है. मजबूरी में उतरना पड़ता है, नहीं उतरेंगे तो पानी कहां से पीएंगे. गांव में पानी का साधन ही नहीं है.'

दूसरी ओर मंडला के सांसद फग्गन सिंह कुलस्ते को पता ही नहीं है कि इन गांवों में पानी का संकट है. बीजेपी नेता ने कहा, 'गांवों में पानी के संकट के लिए प्रकृति भी जिम्मेदार है, हालांकि बेरपानी, मुरलापानी और कुड़ोपानी जैसे गांवों में पानी के संकट की जानकारी नहीं है.'

पीएचई में एक्जीक्यूटिव इंजीनियर एसके जैन ने कहा, 'मंडला विकासखंड में बेरपानी गांव हैं, वहां हर साल पानी की समस्या होती है और उस समस्या का कारण है कि वो काफी ऊंचाई पर है और वहां पर पानी कम मिलता है. सिलैया गांव में नलकूप खनन कर वहां से 4 किलोमीटर दूर पानी ले जाने का प्रयास किया था, लेकिन उसमें फ्लोराइड मिल जाने के कारण वो योजना पूरी नहीं हो पाई.'

गांव के लोगों के लिए तो पीने का साफ पानी किसी अमृत से कम नहीं. आज ना जाने सरकार की ओर से कितनी ही योजनाएं चलाई जा रही हैं और उसमें करोड़ों रुपये भी खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन पता नहीं गांव के इन लोगों की आवाज कब सरकार के पास पहुंचेगी.

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