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मध्य प्रदेश में बिना बिल्डिंग के चल रहे 1582 स्कूल, 2007 स्कूलों में नहीं है पीने का पानी

पूरे मध्य प्रदेश में 1,582 स्कूल बिना बिल्डिंग के चल रहे हैं. अब इन स्कूलों के लिए बारिश या खराब मौसम का मतलब है छुट्टियां. ये चौंकाने वाले आंकड़े एक रिपोर्ट से सामने आए हैं जो मध्य प्रदेश राज्य शिक्षा केंद्र की ओर से तैयार की गई है.

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स्टोरी हाइलाइट्स
  • मध्य प्रदेश में स्कूलों की स्थिति ​बेहद चिंताजनक
  • प्रदेश भर में 2760 स्कूलों में लड़कियों के टॉयलेट नहीं
  • 43,000 से ज्यादा स्कूलों में नहीं पहुंची है बिजली

शिक्षा को लेकर चल रहे तमाम अभियानों और कार्यक्रमों के बावजूद मध्य प्रदेश में स्कूलों की स्थिति ​बेहद चिंताजनक है. मध्य प्रदेश सरकार के खुद के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य भर में 1,582 स्कूलों के पास कोई भवन नहीं है, जबकि 43,351 स्कूलों में बिजली नहीं है. राज्य के 2,760 स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय नहीं है और जिन स्कूलों में शौचालय की सुविधा है उनमें से 37,914 स्कूलों में हैंड वॉश की कोई सुविधा नहीं है. मध्य प्रदेश में कुल 99,987 सरकारी स्कूल हैं और उनमें से 2,007 स्कूलों में पीने के पानी की कोई सुविधा नहीं है.

पूरे मध्य प्रदेश में 1,582 स्कूल बिना बिल्डिंग के चल रहे हैं. अब इन स्कूलों के लिए बारिश या खराब मौसम का मतलब है छुट्टियां. ये चौंकाने वाले आंकड़े एक रिपोर्ट से सामने आए हैं जो मध्य प्रदेश राज्य शिक्षा केंद्र की ओर से तैयार की गई है.

इंडिया टुडे को प्राप्त हुई इस समीक्षा रिपोर्ट (gap assessment report) में राज्य के उन आठ आकांक्षी जिलों की स्थिति को अलग से सूचीबद्ध किया गया है जो देश के 117 सबसे पिछड़े जिलों की सूची में शामिल हैं. आश्चर्यजनक रूप से, इन आठ जिलों में लड़कियों के लिए शौचालय निर्माण, पीने का पानी उपलब्ध कराने और बिजली लगवाने के लिए जुलाई 2018 और मार्च 2019 में फंड जारी किया गया था, लेकिन या तो ये फंड इस्तेमाल नहीं हुआ या फिर डायवर्ट कर दिया गया.

जनवरी 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आकांक्षी जिला कार्यक्रम (Aspirational Dirsticts Programme) लॉन्च किया था. इस कार्यक्रम का मकसद देश के 117 सबसे पिछड़े जिलों में त्वरित और कारगर रूप से सुधार करना था. इस सूची में मध्य प्रदेश के भी आठ जिले शामिल थे, जिनमें बड़वानी, छतरपुर, दमोह, खंडवा, राजगढ़, विदिशा, सिंगरौली और गुना शामिल हैं. इन जिलों की पहचान नीति आयोग द्वारा की गई थी.

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इस रिपोर्ट में इन आठ सबसे सबसे पिछड़े जिलों के 226 स्कूलों को सूचीबद्ध किया गया है जो बिना बिल्डिंग के हैं. इनमें से 549 स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय की सुविधा नहीं है, जबकि इनके लिए फंड जारी किए गए थे.

राज्य के स्कूल एजुकेशन मिनि​स्टर इंदर सिंह परमार ने इंडिया टुडे से कहा, “हम इंजीनियरों के साथ समीक्षा कर रहे हैं और यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि निर्माण कार्य पूरा क्यों नहीं हुआ. जहां तक लड़कियों के लिए शौचालय का सवाल है तो इसके लिए धनराशि जारी की गई थी, अब हमें यह पता लगाना होगा कि उनका उपयोग क्यों नहीं किया गया है.”

बड़वानी के कलेक्टर शिवराज वर्मा ने कहा, “मैंने जिले के शिक्षा अधिकारियों से विस्तृत विवरण तलब किया है. कुछ स्कूल ऐसे हैं जहां इमारतों का निर्माण किया जाना है. हम इसे जल्द ही आगे बढ़ाएंगे और काम को गति देंगे.”

इस साल मार्च तक मध्य प्रदेश की सत्ता में रही विपक्षी कांग्रेस पार्टी ने सरकारी स्कूल की इस दुर्दशा के लिए सत्तारूढ़ भाजपा को दोषी ठहराया है.

कांग्रेस प्रवक्ता भूपेंद्र गुप्ता ने कहा, “यह आत्मनिर्भर मध्य प्रदेश है जिसे शिवराज सिंह चौहान और भाजपा ने 15 वर्षों के शासन में बनाया है. सुप्रीम कोर्ट छात्राओं के लिए शौचालय निर्माण को लेकर कई चेतावनी दे चुका है, लेकिन हर बार वे और समय चाहते हैं.”

भाजपा और कांग्रेस दोनों ने सरकारी स्कूलों के लिए बुनियादी ढांचा तैयार करने में घोर लापरवाही दिखाई है जबकि राज्य भर में धड़ल्ले से प्राइवेट स्कूल खुल रहे हैं.


 

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