हरियाणा के फतेहाबाद जिले के भूना ब्लॉक स्थित ढाणी भोजराज गांव में इन दिनों एक परिवार की कहानी हर किसी को सोचने पर मजबूर कर रही है. यह कहानी सिर्फ बेटे के जन्म की नहीं है, बल्कि उस पिता के संघर्ष, धैर्य और जिम्मेदारी की है, जो बेरोजगारी और आर्थिक तंगी के बावजूद अपने 11 बच्चों के भविष्य का बोझ अकेले कंधों पर उठाए हुए है. 19 साल बाद घर में बेटे की किलकारी गूंजी तो खुशियों ने दस्तक दी, लेकिन इस खुशी के पीछे संघर्षों की लंबी दास्तान छिपी है.
ढाणी भोजराज निवासी संजय और उनकी पत्नी सुनीता की शादी को पूरे 19 साल हो चुके हैं. इन 19 सालों में जिंदगी ने उन्हें बार-बार आजमाया. बेटे की चाह के बीच एक-एक कर 10 बेटियों ने जन्म लिया. समाज के ताने, आर्थिक दबाव और अनिश्चित भविष्य के बावजूद संजय और सुनीता ने कभी बेटियों को बोझ नहीं समझा. आज उनकी 11वीं संतान के रूप में बेटे का जन्म हुआ है, जिसने परिवार को नई उम्मीद दी है.
बेरोजगारी के बीच परिवार की जिम्मेदारी
संजय की जिंदगी आसान नहीं रही. कभी लोक निर्माण विभाग (PWD) में डेली वेज पर काम करने वाले संजय को वर्ष 2018 में नौकरी से हटा दिया गया. इसके बाद उन्होंने मनरेगा के तहत मजदूरी कर परिवार का पालन-पोषण शुरू किया. लेकिन पिछले एक साल से मनरेगा का काम भी ठप पड़ा है. आज की तारीख में संजय बेरोजगार हैं, लेकिन जिम्मेदारियों से कभी पीछे नहीं हटे. संजय कहते हैं, काम हो या न हो, बच्चों की जरूरतें कभी नहीं रुकतीं. पेट भरना, स्कूल भेजना, दवाइयां, कपड़े सब कुछ देखना पड़ता है. बेरोजगारी के बावजूद उन्होंने मेहनत और हिम्मत नहीं छोड़ी. गांव में जो भी छोटा-मोटा काम मिला, उसे करने से पीछे नहीं हटे.
11 बच्चों के पिता होने के बावजूद संजय ने एक अहम फैसला लिया. उन्होंने अपनी एक बेटी को रिश्तेदारी में गोद दे दिया, ताकि उस बच्ची को बेहतर भविष्य मिल सके. इसके बाद बाकी 9 बेटियों और अब नवजात बेटे की पूरी जिम्मेदारी खुद उठाने का फैसला किया. संजय का कहना है कि यह फैसला उन्होंने मजबूरी में नहीं, बल्कि बच्ची के बेहतर भविष्य को ध्यान में रखकर लिया. मेरे लिए सभी बच्चे बराबर हैं. वह कहते हैं कि हालात देखकर जो सही लगा, वही किया.
बेटियों को बोझ नहीं, ताकत माना
संजय और सुनीता की सबसे बड़ी बेटी 18 साल की है और 12वीं कक्षा में पढ़ रही है. बाकी बेटियां भी पढ़ाई कर रही हैं. सीमित संसाधनों के बावजूद संजय ने कभी बेटियों की शिक्षा से समझौता नहीं किया. गांव के लोग बताते हैं कि आर्थिक तंगी के बावजूद यह परिवार सादगी और आत्मसम्मान के साथ जीता है. संजय कहते हैं, लोग ताने देते थे इतनी बेटियां कैसे पालोगे, बेटा नहीं हुआ तो क्या होगा. लेकिन हमने कभी बेटियों को बोझ नहीं समझा. बेटियां भी किसी से कम नहीं होतीं.
11वीं डिलीवरी, फिर भी नॉर्मल
हाल ही में सुनीता ने 11वीं संतान को जन्म दिया. हैरानी की बात यह रही कि 11वीं डिलीवरी भी पूरी तरह नॉर्मल हुई. संजय ने अपनी पत्नी की डिलीवरी घर से करीब 50 किलोमीटर दूर एक प्राइवेट अस्पताल में करवाई, ताकि बेहतर इलाज मिल सके. जन्म के समय नवजात में खून की कमी पाई गई, जिसके बाद डॉक्टरों ने तुरंत खून चढ़ाया. समय पर इलाज मिलने से बच्चे की हालत में सुधार हुआ. फिलहाल मां और बेटा दोनों स्वस्थ हैं और डॉक्टरों की निगरानी में कुछ दिन अस्पताल में रहने के बाद परिवार ने राहत की सांस ली. बेटे के जन्म से घर में उत्सव जैसा माहौल है. संजय की मां माया देवी पोते के जन्म से बेहद खुश हैं. उनकी आंखों में खुशी और संतोष साफ झलकता है. वह कहती हैं, भगवान ने वर्षों बाद मेरी मन्नत पूरी कर दी. इतने सालों से बस यही इच्छा थी कि घर में एक पोता हो. संजय के पिता कपूर सिंह का पहले ही निधन हो चुका है. वह लोक निर्माण विभाग में बेलदार के पद पर कार्यरत थे. पिता के निधन के बाद परिवार की सारी जिम्मेदारियां संजय पर आ गईं. बुजुर्ग मां, पत्नी और बच्चों का पूरा दायित्व उन्होंने अकेले संभाला.