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गुजरातः क्या 2022 के विधानसभा चुनाव में BJP और AAP के बीच होगा मुकाबला

सूरत को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि कहा जाता है कि सूरत में पाटीदार जो रणनीति बनाते हैं उसका सीधा असर सौराष्ट्र में देखने मिलता है और वही 2017 के विधानसभा चुनाव में भी देखने मिला था. लेकिन यह पहली बार है कि गुजरात में बीजेपी और कांग्रेस के अलावा कोई दूसरी पार्टी उभर कर आई है.

भारतीय जनता पार्टी को गुजरात में क्या अब आप पार्टी से मिलेगी चुनौती (सांकेतिक-पीटीआई) भारतीय जनता पार्टी को गुजरात में क्या अब आप पार्टी से मिलेगी चुनौती (सांकेतिक-पीटीआई)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • गुजरात के 6 नगर निगमों में बीजेपी को मिली जीत
  • सूरत में आम आदमी पार्टी के खाते में गई 27 सीट
  • पिछले 25 सालों से सूरत में बीजेपी का कब्जा रहा

गुजरात के छह नगर निगम के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने अहमदाबाद, सूरत, वडोदरा, राजकोट, भावनगर और जामनगर में बंपर जीत हासिल की है, लेकिन इस जीत का मजा तब किरकिरा हो गया जब सूरत में आम आदमी पार्टी (AAP) दूसरे नंबर की पार्टी बनकर उभरी और सूरत इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष सीआर पाटिल का गढ़ माना जाता है और पाटिल यहीं से सांसद भी हैं.

सूरत को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि कहा जाता है कि सूरत में पाटीदार जो रणनीति बनाते हैं उसका सीधा असर सौराष्ट्र में देखने मिलता है और वही 2017 के विधानसभा चुनाव में भी देखने मिला था. लेकिन यह पहली बार है कि गुजरात में बीजेपी और कांग्रेस के अलावा कोई दूसरी पार्टी उभर कर आई है.

क्या है इसकी प्रमुख वजह और क्यों आम आदमी पार्टी सूरत में दूसरे नंबर की पार्टी बनकर उभरी है. बीजेपी को इससे क्या सीख लेनी चाहिए और क्या कहते हैं राजनीतिक पंडित. आपको बताते हैं.

AAP बनी तीसरा विकल्प

सूरत में पिछले 25 साल से नगर निगम में बीजेपी की सरकार है और इस बार भी यहां बीजेपी की ही सरकार तो बनी लेकिन दूसरी पार्टी के तौर पर कांग्रेस नहीं बल्कि आम आदमी पार्टी आई है. राजनीतिक जानकारों की मानें तो जो लोग बीजेपी को वोट नहीं देना चाहते थे लेकिन कांग्रेस को भी वोट नहीं देना चाहते थे उनके लिए आम आदमी पार्टी एक तीसरा विकल्प बनकर आई.

आम आदमी पार्टी के चुने जाने की एक बड़ी वजह उनके नेताओं की साफ छवि और जातिवादी समीकरण को भी माना जा रहा है. साथ ही 25 सालों से नगर निगम में बीजेपी की सरकार होने की वजह से लोगों को यह एहसास हो रहा था कि उनको नेता सुनते नहीं है जब उन्हें तीसरा ऑप्शन यानी आम आदमी पार्टी मिला तो उन्होंने उसी को वोट दिया.

सूरत में भी आम आदमी पार्टी पाटीदार इलाकों में ही जीती है तो यह भी माना जा रहा है कि पाटीदार 2015 में हुए आंदोलन के बाद बीजेपी के साथ बैठना नहीं चाहते हैं, साथ ही बीजेपी ने पाटीदार युवाओं पर तोड़फोड़ के जो मामले दर्ज हुए थे वह भी अब तक वापस नहीं लिए गए जिस वजह से भी पाटीदार बीजेपी से नाराज चल रहे हैं.

पंचायत चुनाव में 2 हजार से ज्यादा उम्मीदवार
दिलचस्प बात है कि यह तो नगर निगम के चुनाव थे जबकि आम आदमी पार्टी ने अपने 2,000 से भी ज्यादा उम्मीदवार तहसील पंचायत, जिला पंचायत और पालिका में खड़े किए हैं, अगर ग्रामीण इलाकों में जहां कांग्रेस की अच्छी खासी पकड़ है वहां पर भी अगर आम आदमी पार्टी आती है तो 2022 के चुनाव में आम आदमी पार्टी और बीजेपी के बीच सीधा मुकाबला देखा जा सकता है.

सूरत में इतनी बड़ी तादाद में आम आदमी पार्टी के कॉरपोरेटर के जीतने की वजह सूरत में बीजेपी के संगठन की गैरमौजूदगी को भी माना जा रहा है. सीआर पाटिल गुजरात के बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष हैं और सूरत से ही हैं. लेकिन कहा जा रहा है कि उन्होंने सूरत के अपने संगठन को पूरे गुजरात में डायवर्ट कर दिया जिस वजह से सूरत का संगठन इतना मजबूत नहीं रह सका जो पहले कभी था और उसकी वजह से आम आदमी पार्टी की सूरत में एंट्री हो गई.

 

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