सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के बीच अधिकारों की जंग से जुड़े मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया है. कोर्ट ये तय करेगा की इस मामले की सुनवाई मौजूदा बेंच करे या संविधान पीठ को सौंपी जाए.
दरअसल, अफसरों की ट्रांसफर पोस्टिंग का मामला संविधान पीठ को सौंपने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में तीन जजों की बेंच ने फैसला सुरक्षित रख लिया है. CJI जस्टिस एन वी रमना, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस हिमा कोहली की बेंच ने इशारा किया कि वे मामले को पांच जजों की संविधान पीठ को भेज सकते हैं.
सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार की ओर से पेश वकील अभिषेक मनु सिंघवी की दलीलों पर चीफ जस्टिस एनवी रमणा ने कहा कि आप लोग संविधान पीठ में इस मामले को भेजने की बात भी कर चुके हैं. तो यहां इतने लोगों की इतनी लंबी लंबी दलीलों का क्या मतलब रह जाता है? क्योंकि संविधान पीठ के सामने फिर यही सारी बातें आनी हैं.
अभिषेक मनु सिंधवी ने कहा, बेंच को यह ध्यान देना होगा कि इस मामले में संविधान पीठ पहले ही फैसला दे चुकी है. फैसला पूरा है या अधूरा है, सारे पहलू कवर करता है या नहीं, ये अलग बात है. इसका मतलब ये नहीं कि मामले को फिर से बड़ी बेंच के पास भेजा जाए. उन्होंने कहा, केंद्र सरकार 6 बार केस की सुनवाई टालने का आग्रह कर चुकी है. अब केस को बड़ी बेंच के पास भेजने की मांग कर रही है.
क्या है मामला?
दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (संशोधन) अधिनियम 2021 के प्रभावी होने के बाद से दिल्ली में सरकार का मतलब 'उपराज्यपाल' कर दिया गया है. इस वजह से दिल्ली विधानसभा से पारित किसी भी विधेयक को मंज़ूरी देने का अधिकार उपराज्यपाल के पास रहने वाला है. इसके अलावा दूसरे फैसलों में भी उपराज्यपाल की सलाह लेनी पड़ेगी. अब इसी बदलाव के खिलाफ दिल्ली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है.
दिल्ली सरकार की ओर से अभिषेक मनु सिंघवी की दलील दी कि दिल्ली का बाकी केंद्रशासित प्रदेशों से बिल्कुल अलग संवैधानिक दर्जा है. सिर्फ तीन विषयों को छोड़कर ये दिल्ली पूर्ण राज्य है. यहां की सरकार बाकी अन्य केंद्र शासित प्रदेशों की सरकार से अधिक अधिकृत है.