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दिल्लीः आखिर बीच सड़क में कैसे समा गई कार, एक्सपर्ट ने बताया कारण

लगातार बारिश के चलते सोमवार 19 जुलाई को एक इलाके में सड़क धंस गई. इससे वहां से गुजर रही एक कार भी सड़क के साथ जमीन में पहुंच गई. सीपीडब्लूडी (CPWD) के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर रहे कुंवर चंद्रेश ने बताया कि आखिर बीच सड़क में कार कैसे समा गई.

सड़क में धंसी कार. (फाइल फोटो) सड़क में धंसी कार. (फाइल फोटो)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • ड्रेनेज का मास्टर प्लान बनाने की जरूरत
  • अतुल्य चौक 8 से 10 मीटर मिक्स सैंड पर बसा है- एक्सपर्ट

राजधानी दिल्ली (New Delhi) के द्वारका के अतुल्य चौक पर हाल ही में एक कार (Car) सड़क में धंसी नजर आई. इस घटना की तस्वीर सोशल मीडिया (Social Media) पर काफी वायरल हुई थी.  लगातार बारिश के चलते सोमवार 19 जुलाई को एक इलाके में सड़क धंस गई. इससे वहां से गुजर रही एक कार भी सड़क के साथ जमीन में पहुंच गई. सीपीडब्लूडी (CPWD) के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर रहे कुंवर चंद्रेश ने बताया कि आखिर बीच सड़क में कार कैसे समा गई.

दरअसल, द्वारका के अतुल्य चौक पर सड़क इसलिए धंसी क्योंकि बलुई मिट्टी (सैंडी स्वायल) हैवी रेन वाटर के साथ मिक्स होकर बह गई. और मिट्टी धंस गई जैसी ही पुलिस वाले की कार पहुंची सड़के के गड्ढे ने उसे अपनी जद में ले लिया. ड्रेनेज सिस्टम क्लीन ना होने पर अगर जलभराव हुआ तो पानी चारकोल में चला जाता है फिर नीचे की मिट्टी को धंसा देता है और सड़कें धंस जाती हैं.

साउथ दिल्ली की सब सरफेस स्वायल की रिपोर्ट बताती है कि अतुल्य चौक 8 से 10 मीटर मिक्स सैंड पर बसा है जिसमें बालू की मात्रा ज्यादा है. सीपीडब्लूडी के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर रहे कुंवर चंद्रेश ने बताया कि बहुत ज्यादा बारिश की स्थिति में वहां सड़क धंसने आशंका बनी रहेगी. दिल्ली में जहां भी ड्रेनेज सिस्टम सैंडी स्वायल में है वो इलाके सड़क धंसने के लिहाज से काफी प्रोन होंगे. 

ड्रेनेज का मास्टर प्लान बनाने की जरूरत है  

कुंवर चंद्रेश ने बताया कि दिल्ली का लास्ट ले आउट डिज़ाइन 1979 का है. 45 साल के बाद दिल्ली की जनसंख्या और इफ्रास्ट्रक्चर दबाव बहुत बढ़ा है लेकिन ड्रेनेज सिस्टम का डिजाइन कुछ को छोड़कर बाकी इलाको में पुराना ही है. सेंट्रल दिल्ली, पुरानी दिल्ली और आसपास के कई इलाको में पुराने डिजाइन से ही ड्रेनेज सिस्टम का जाल बिछा है.  

स्टोर्म वाटर का अलग ले आउट 

इंटरनेशनल प्रैक्टिस ये है कि सीवेज वॉटर में रेन वॉटर नही शामिल होना चाहिए नही तो ओवरफ्लो हो जाएगा. दोनो को अलग-अलग रखने की जरूरत है. कुंवर चंद्रेश का दावा है कि दिल्ली के कई इलाकों में सीवेज वॉटर और रेन वॉटर कंबाइंड है. सड़कों को धंसने से बचाने के लिए इन कंबाइंड सिस्टम को डी लिंक भी करना है. स्टोर्म वाटर का अलग ले आउट प्लान करने की जरूरत है क्योकि ये सीजनल होता है जबिक सीवेज वाटर पूरे साल बहता रहता है.  

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आपको बता दें कि दिल्ली में तीन ड्रेनेज बेसिन में बसी है ट्रांस यमुना ड्रेनेज बेसिन,बारापुला और सबसे बड़ा नजफगढ़ ड्रेनेज बेसिन जबकि आआईटी की रिपोर्ट ये कहती है कि तीनों में कुछ के स्लोप ठीक नहीं हैं. क्योंकि कई सीवेज नाले में नहीं जा पाते. 2016 की आईआईटी की रिपोर्ट में उन जगहों को चिन्हित भी किया गया है.

दिल्ली के फ्लाईओवर मैन कहे जाने वाले पीडब्लू डी के रिटायर्ट इंजीनियर दिनेश कुमार ने कहा कि डिसिल्टिंग की समस्या हर साल आती है जो एक खर्चीला प्रोसेस है. हाईकोर्ट के आदेश के बाद कई कमेटियों का गठन भी हुआ लेकिन अलग-अलग चीजों के लिए अलग अलग एजेंसिया उत्तरदायी है. यही वजह है कि वक्त पर उनमें तालमेल की कमी दिखाई देती है.

धंसने से कैसे बचेंगी सड़कें? 

सीपीडब्लूडी के एग्जीक्यूटिव इंजीनियर रहे कुंवर चंद्रेश ने बताया कि टेक्नोलॉजी और इंजीनियरिंग का इस्तेमाल सैंडी स्वायल में किया जा सकता है. जहां की सब स्वायल कंडीशन हमें पता है उन प्रोन एरिया में एहतियात बरतने की जरूरत है जैसे अतुल्य चौक पर हुआ. सेंट्रेल दिल्ली में सर्विसेज लाइन की खुदाई हो जाने पर ठीक से नहीं भरते.

   

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