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स्कूल में सि‍र्फ एक क्लास रूम, पकता है मध्यान्ह भोजन और होती है पढ़ाई

बुनियादी स्तर पर बिहार में छात्रों को क्या समस्याओं का सामना करना पड़ता है इसका आकलन करने के लिए आज तक की टीम पटना से 70 किलोमीटर दूर मुजफ्फरपुर शहर पहुंची. हमें जानकारी मिली थी कि शहर के बीचोबीच एक ऐसा स्कूल है जहां पर स्कूल के नाम पर सिर्फ एक कमरा है और उसी एक कमरे में कई कक्षाएं एक साथ चलती है.

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एक कमरे में ही होती है पढ़ाई और पकता है भोजना
एक कमरे में ही होती है पढ़ाई और पकता है भोजना

बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के 2005 में सत्ता संभालने के बाद कई क्षेत्रों में विकास हुआ है मगर जहां तक शिक्षा की बात है तो शिक्षा के क्षेत्र में निरंतर गिरावट देखने को मिली है. हर साल टॉपर्स घोटाला, मैट्रिक और इंटरमीडिएट की परीक्षा में नकल बाजी की तस्वीरें बिहार में आम बात हो गई है. सवाल मगर यह उठता है कि आखिर बुनियादी स्तर पर ही क्या कमी है जिसकी वजह से छात्रों को सही शिक्षा नहीं मिल पाती है और परीक्षा में पास करने के लिए उन्हें नकल के साथ-साथ अन्य तरकीबें भी लगाने पड़ते हैं.

बुनियादी स्तर पर बिहार में छात्रों को क्या समस्याओं का सामना करना पड़ता है इसका आकलन करने के लिए आज तक की टीम पटना से 70 किलोमीटर दूर मुजफ्फरपुर शहर पहुंची. हमें जानकारी मिली थी कि शहर के बीचोबीच एक ऐसा स्कूल है जहां पर स्कूल के नाम पर सिर्फ एक कमरा है और उसी एक कमरे में कई कक्षाएं एक साथ चलती है.

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इसी बात का जायजा लेने के लिए हम शहर के बहलखाना इलाके में पहुंचे. यहां पहुंचने के बाद हम स्कूल की इमारत ढूंढ रहे थे मगर वह नहीं मिली. मिला हमें तो बस मुजफ्फरपुर नगर निगम का एक कमरा जहां पर राजकीय प्राथमिक विद्यालय नाम का एक सरकारी स्कूल चलता है. स्कूल में पहली से लेकर पांचवी तक के छात्र पढ़ाई करते हैं. कुल मिलाकर स्कूल में 73 छात्र और छात्राएं हैं और 3 महिला शिक्षक.

चौंकाने वाली बात थी कि कबाड़खाने जैसा यह कमरा एक स्कूल था जहां पर एक साथ 5 कक्षाएं चलती है. मगर कुछ ही देर में हमें पता चल गया कि कबाड़खाने सा यह स्कूल बेहद खतरनाक भी है. खतरनाक इसलिए क्योंकि इसी कमरे के अंदर इन सभी बच्चों के लिए मध्यान्ह भोजन बनाया जाता है. यानी कि इस एक कमरे में जहां 73 बच्चे पढ़ाई करते हैं ठीक उसी जगह पर रोजाना बच्चों के लिए मध्यान्ह भोजन बनता है और रोजाना बच्चे अपनी जान हथेली पर रखकर यहां पढ़ाई करते हैं. यह बात आसानी से समझने वाली है कि जिस कमरे में चूल्हा जला कर खाना बनाया जाता है वहां पर कोई भी दुर्घटना कभी भी हो सकती है.

इस स्कूल की प्रधानाध्यापिका अनीता गुप्ता से बात की तो उन्होंने कहा कि 2007 में जब वह इस स्कूल में आई थी तब भी स्कूल की हालत ऐसी ही थी और 10 साल के बाद भी आज स्कूल की हालत वैसी ही है. अनीता गुप्ता कहती हैं कि यह दिक्कत स्कूल के बच्चे और शिक्षकों दोनों के लिए परेशानी का सबब है. अनीता गुप्ता कहती हैं कि रोजाना मध्यान्ह भोजन बनने से जो धुआं उठता है उस से बच्चों को काफी मुश्किल होती है.

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महजबीन अंसारी जो पांचवीं कक्षा में पढ़ती हैं वह कहती है कि कमरे के अंदर ही मध्यान भोजन बनने की वजह से उनकी आंखों में जलन होती है और उन्हें अपनी जान का खतरा भी महसूस होता है. महजबीन कहती है कि एक ही कमरे में एक साथ 5 क्लास चलने की वजह से उन्हें कई बार जो पढ़ाया जाता है वह समझ में नहीं आता है.

इस खस्ताहाल स्कूल को लेकर आज तक ने जब मुजफ्फरपुर के जिलाधिकारी धर्मेंद्र कुमार सिंह से बात की तो उनके पास भी आश्वासन देने के सिवा और कोई विकल्प नहीं था. जिलाधिकारी ने कहा कि इस स्कूल के लिए भवन बनाने के लिए जमीन की खोज चल रही है और जैसे ही जिला प्रशासन को कोई जमीन मिलती है तो उस पर स्कूल का भवन बनाया जाएगा. तो बात साफ है !! राज्य में जिस स्कूल के पास अपना भवन भी ना हो और एक ही कमरे में 5 कक्षाएं चलती हो वहां पर किस तरीके से पढ़ाई होती होगी और वहां के बच्चों का भविष्य क्या होगा यह समझा जा सकता है.

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