अंग्रेजी हुकूमत की जड़ों को हिला देने वाला 1857 का गदर, जिसके बाद देश के कोने कोने से आजादी की चिंगारी भड़क उठी थी. मंगल पाण्डेय ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंक दिया था. कई राजा आजादी की इस जंग में कूद पड़े थे. बिहार में इस गदर का नेतृत्व बाबू कुंवर सिंह ने किया था. कहा जाता है कि बाबू कुंवर सिंह ने अंग्रेजों को मात देने के लिए अपनी कलाई को काटकर गंगा में बहा दिया था. आइये जानते हैं वीर बाबू कुंवर सिंह की कहानी.
बिहार के भोजपुर जिले के जगदीशपुर गांव के प्रसिद्ध भोज वंशज परिवार में वीर कुंवर सिंह का जन्म सन् 1777 में हुआ था. उनके पिता का नाम तेज कुंवर सिंह था. पिता की मौत के बाद बाबू कुंवर सिंह 1830 में गद्दी पर बैठे थे. कुंवर सिंह के पास बड़ी जमींदारी थी. कहा जाता है कि बचपन से ही कुंवर सिंह को खेल खेलने की बजाय घुड़सवारी, निशानेबाजी, तलवारबाजी का शौक था. उनके बारे में ये भी प्रसिद्ध है कि भारत में छत्रपति शिवाजी महाराज के बाद वे दूसरे योद्धा थे, जो गोरिल्ला युद्ध नीति में माहिर थे. बाबू कुंवर सिंह शाहाबाद की जागीरों के मालिक थे.
आजादी की जंग में कूदे बाबू कुंवर सिंह ने 27 अप्रैल, 1857 को दानापुर के सिपाहियों, भोजपुरी जवानों और अन्य साथियों के साथ मिलकर आरा नगर पर कब्जा कर लिया. इस विजय को आरा विजय के नाम से जाना जाता है. यहां बाबू कुंवर सिंह ने जेल तोड़कर कैदियों को तो मुक्त कराया ही, साथ ही यहां के खजाने पर भी कब्जा कर लिया. इसके बाद 2 अगस्त 1857 को कुंवर सिंह ने बीबीगंज में अंग्रेजी सरकार के छक्के छुड़ा दिये. अंग्रेजी सेना ने आरा पर हमला करने का प्रयास किया, लेकिन बाबू कुंवर सिंह ने अंग्रेजों को इन मंसूबों में कामयाब नहीं होने दिया.
बीबीगंज और बिहिया के जंगलों में घमासान युद्ध हुआ. इस युद्ध में हुई भयंकर गोलीबारी में कुंवर सिंह की हार हुई, लेकिन हौसला नहीं टूटा. इसी वर्ष सितंबर माह में बाबू कुंवर सिंह रीवा की ओर निकल गए, जहां उनकी मुलाकात नाना साहब से हुई. इसके बाद वे एक और जंग करने के लिए बांदा से कालपी पहुंचे, लेकिन सर कॉलिन के हाथों तात्या की हार के बाद वे लखनऊ आ गए.
कहा जाता है कि बाबू कुंवर सिंह रामगढ़ के बहादुर सिपाहियों के साथ बांदा, रीवां, आजमगढ़, बनारस, बलिया, गाजीपुर एवं गोरखपुर में सक्रिय रहे. इसके बाद अंग्रेजों ने लखनऊ पर फिर से कब्जा कर लिया. कुंवर सिंह बिहार की ओर वापस लौटने लगे. कहा जाता है कि जब वे जगदीशपुर जाने के लिए गंगा पार कर रहे थे, तभी अंग्रेजी सैनिकों ने उन्हें घेरने का प्रयास किया. गोलियां चला दी गईं, जिसमें से एक गोली बाबू कुंवर सिंह के हाथ पर लगी.
इस दौरान उन्होंने अपनी कलाई काटकर नदी में बहा दी और अपनी सेना के साथ जंगलों की ओर चले गए. इसके बाद 23 अप्रैल, 1858 को अंग्रेजी सेना को पराजित करने के बाद वे जगदीशपुर पहुंचे. वे बुरी तरह से घायल थे. 1857 की क्रान्ति के इस महान नायक का 26 अप्रैल, 1858 को निधन हो गया.
यहां है वीर बाबू कुंवर सिंह की विरासत
बिहार के भोजपुर में वीर बाबू कुंवर सिंह की विरासत को संजोकर रखा हुआ है. यहां पर उनका किला है. यहां रहने वाले कुंवर रोहित कुमार सिंह ने बताया कि पहले का किला जब अंग्रेजों ने गिरा दिया था, तो उसके बाद 1858 के आसपास ही इस किले को दोबारा बनवाया गया. इसके बाद उचित देखरेख न होने के चलते इस किले की हालत जर्जर होती जा रही थी. 2005 में इस किले का जीर्णोद्धार कराया गया. इसके लिए भी सरकार से काफी लड़ाई लड़ी. इस किले में आपको बाबू कुंवर सिंह की फोटो भी देखने के लिए मिल जाएगी. इसके साथ ही पटना संग्रहालय से लाकर यहां कई पुराने समय के हथियार भी रखे गए हैं, हालांकि इनका संबंध वीर कुंवर सिंह से है कि नहीं, इसका कोई जिक्र नहीं है.
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