India Today AI Summit 2026: इंडिया टुडे एआई समिट 2026 का आयोजन आज यानी 18 फरवरी 2026 को दिल्ली में हुआ. आजकल तबीयत खराब होते ही हम सबसे पहले एआई टूल्ट या चैटजीपीटी (ChatGPT) का रुख करते हैं. इसी बढ़ते चलन पर देश के दिग्गज डॉक्टरों और विशेषज्ञों ने 'हेल्थकेयर में AI का यूज' (Harnessing AI in Healthcare) सेशन में अपनी बात रखीं और चर्चा की. विशेषज्ञों का मानना है कि एआई सेहत की दुनिया में एक बड़ा बदलाव ला रहा है लेकिन यह डॉक्टर की जगह लेगा या सिर्फ उनकी मदद करेगा, इसकी तस्वीर अब साफ होने लगी है.
AI के दोनों पहलू पर ध्यान देना जरूरी
आज कई लोग शुरुआती लक्षण दिखते ही सबसे पहले ChatGPT का सहारा लेते हैं और डॉक्टर के पास जाने से पहले वहीं सलाह ढूंढते हैं. तो इस पर डॉ. नरेश त्रेहन ने कहा, 'यह एक उपयोगी टूल है, लेकिन इसके कई पहलू हैं. एक, यह आपको डॉक्टर के पास जाने के लिए मोटिवेट कर सकता है.'
दूसरा, यह बेवजह की घबराहट भी बढ़ा सकता है. खासकर कार्डियक मामलों में लोग अक्सर एसिडिटी समझकर खतरे को टाल देते हैं. उन्होंने माना कि यह एक पॉजिटिव टूल है, लेकिन गलत प्रॉम्प्ट या अधूरी जानकारी पर यह गलत दिशा भी दे सकता है. अंततः, एआई सिर्फ एक जरिया है, असली फैसला डॉक्टर के अनुभव पर ही होना चाहिए.'
गरीबों का सहारा बने AI
सीनियर एसोसिएट अंजलि कौर का कहना था कि भारत में असली चुनौती तकनीक की नहीं, बल्कि तकनीक 'पहुंच' की है. एआई का असली कमाल तब दिखेगा जब यह सिर्फ बड़े शहरों के कॉर्पोरेट अस्पतालों तक सीमित न रहकर गांव के स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचे.
उन्होंने जोर दिया कि एआई को स्थानीय भाषाओं और कम इंटरनेट वाली जगहों के लिए डिजाइन करना होगा. यह सिर्फ टेक्नोलॉजी की कहानी नहीं है, बल्कि गवर्नेंस और भरोसे की कहानी है. अगर एआई गांव के हेल्थ वर्कर के हाथ में होगा, तो वह बड़े डॉक्टर की गैर-मौजूदगी में भी सही सलाह दे पाएगा.
इलाज को किफायती बनाने का फॉर्मूला
नारायण हेल्थ के विवेक राजगोपाल ने एआई को सीधे जेब और समय से जोड़कर देखा. उन्होंने बताया कि भारत में प्राइवेट अस्पतालों में करीब 60% बिस्तर ही भर पाते हैं, जिसका बड़ा कारण इलाज का महंगा होना और पहुंच की कमी है.
अस्पतालों में मरीजों को लंबा इंतजार करना पड़ता है क्योंकि डेटा मैनेजमेंट सुस्त है. एआई इस सुस्ती को खत्म कर सकता है. अगर एआई का इस्तेमाल सही तरीके से किया जाए तो यह न केवल डॉक्टरों की प्रोडक्टिविटी बढ़ाएगा, बल्कि ऑपरेशनल खर्च कम करके इलाज को आम आदमी के लिए सस्ता बना देगा.
सटीक जांच और डेटा की जिम्मेदारी
निरामई हेल्थ की फाउंडर डॉ. गीता मंजूनाथ ने 'सटीकता' पर बात की. उन्होंने बताया कि एआई के जरिए ब्रेस्ट कैंसर जैसी बीमारियों की शुरुआती जांच अब घर के पास ही संभव है, वो भी सिर्फ कुछ तस्वीरों के जरिए. लेकिन उन्होंने एक वाजिब सवाल भी उठाया. अगर एआई गलती करता है तो जिम्मेदार कौन होगा?
डॉ. गीता ने कहा कि एआई उतना ही अच्छा होगा जितना अच्छा उसे डेटा दिया जाएगा. उन्होंने सलाह दी कि हमें भारतीय शरीर और बनावट (Indian Data Sets) पर आधारित एआई मॉडल विकसित करने होंगे, ताकि जांच में गलती की गुंजाइश न रहे.
क्या AI डॉक्टरों को रिप्लेस करेगा?
इस सवाल पर डॉ. त्रेहन ने कहा, AI नया नहीं है. मशीन लर्निंग और रोबोटिक्स दशकों से मेडिकल फील्ड में हैं. लेकिन डॉक्टर जो AI नहीं अपनाएंगे, वे पीछे रह जाएंगे. उन्होंने मेडिकल एरर का जिक्र करते हुए कहा कि तकनीक का सही उपयोग जरूरी है, लेकिन आंख बंद करके पूरी तरह निर्भरता भी खतरनाक है.
जब डॉ. त्रेहन से पूछा गया कि क्या वे चाहेंगे कि AI अगली महामारी की भविष्यवाणी करे या प्रदूषण की समस्या सुलझाए तो उन्होंने जवाब दिया कि अभी शुरुआती दिन हैं और सबसे ज्यादा जरूरी 'लोकलाइजेशन' है.
डॉ. त्रेहन ने कहा, फिलहाल जो AI मॉडल मौजूद हैं, वे उन क्षेत्रों के हैं जो भारत में मैप नहीं किए गए हैं. ऐसे में उन मॉडल्स में खामियां हो सकती हैं. आज AI का असली इस्तेमाल डेटा की माइनिंग करके नई दवाओं की खोज और इलाज के नए तरीके ढूंढने में होना चाहिए.
दूसरा ये कि ड्रग डिस्कवरी में भारत दुनिया में बड़ी भूमिका निभा सकता है क्योंकि हमारे पास बहुत ही विविध 'जीन पूल' है. इतिहास का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि पश्चिम से सिकंदर की सेना, पूर्व से चंगेज खान और उत्तर से मुगलों के आने के कारण भारत की आबादी में जो जेनेटिक विविधता पैदा हुई, वह दुनिया के बहुत कम देशों के पास है.
डॉ. त्रेहन ने जोर देकर कहा कि भारत अब तक दुनिया की 'कॉपीकैट फार्मेसी' (नकल वाली दवाएं बनाना) बनकर खुश रहा है लेकिन अब हमें AI की मदद से नई दवाइयां इजाद करनी चाहिए. उन्होंने उदाहरण दिया कि जिस तरह भारत ने टेलीफोनी में लंबी छलांग लगाई, वैसे ही हमें फार्मेसी में भी नकल छोड़कर असल इनोवेशन करना होगा.