
पिछले साल कोरोना की दूसरी लहर के दौरान उत्तर प्रदेश में शवों की दुर्दशा को लेकर कई खबरें आईं थीं. इसी के मद्देनजर सोशल मीडिया पर अब एक फोटो वायरल हो रही है जिसके जरिए यूपी की स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़ा किया जा रहा है.

फोटो को देखने पर ऐसा लग रहा है कि एक आदमी साइकिल पर एक शव को बांध कर कहीं ले जा रहा है. फोटो के साथ कैप्शन में लिखा है, "यूपी वालो भूले तो नहीं". फोटो इसी दावे के साथ फेसबुक पर वायरल हो रही है.
क्या है सच्चाई?
इंडिया टुडे एंटी फेक न्यूज वॉर रूम (AFWA) ने पाया कि तस्वीर के साथ किया जा रहा दावा भ्रामक है. ये अप्रैल 2017 की असम के माजुली की तस्वीर है.
रिवर्स सर्च करने पर हमें 'जनसत्ता' की 19 अप्रैल 2017 की एक खबर मिली जिसमें इस फोटो के बारे में बताया गया है. खबर के अनुसार, असम के लखीमपुर जिले के बालीजान गांव के रहने वाले डिंपल दास को सांस संबंधी समस्या थी, जिसके चलते उनके परिवारवाले उन्हें गारामुर सिविल अस्पताल लाए थे. ये अस्पताल माजुली जिले में स्थित है जो बालीजान गांव के सबसे पास है.
डिंपल की हालात गंभीर थी इसलिए उन्हें अस्पताल में बचाया नहीं जा सका. इसके बाद डिंपल के भाई शव को साइकिल पर ही अपने गांव ले गए क्योंकि रास्ता ऐसा नहीं था कि कोई मोटर गाड़ी वहां जा सके.
स्थानीय अधिकारियों का कहना था कि मृतक के भाई ने अस्पताल की वैन का इंतजार नहीं किया और शव लेकर चले गए. ऐसा इसलिए क्योंकि जिस बालीजान गांव का मृतक रहने वाला था वहां से गारामुर मेन रोड तक पहुंचने के लिए बांस के अस्थायी पुल से गुजरना होता है.
ये फोटो जहां खींची गई थी वो माजुली विधान सभा का हिस्सा है. उस समय माजुली विधान सभा से विधायक तत्कालीन असम सीएम सर्बानंद सोनोवाल थे. ये फोटो उस समय काफी चर्चा में आई थी. इसको लेकर "एबीपी न्यूज" और "इंडिया टाइम्स" ने भी खबरें छापी थीं.
इस तरह ये साबित हो जाता है कि वायरल फोटो लगभग पांच साल पुरानी है और इसका यूपी से कोई संबंध नहीं है.