
सोशल मीडिया पर इस समय एक अखबार की क्लिपिंग जमकर वायरल हो रही है. इस खबर में बताया गया है कि उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में मुस्लिमों के एक जुलूस के दौरान तिरंगे में अशोक चक्र की जगह मस्जिद के चित्र का इस्तेमाल किया गया. खबर में तिरंगे झंडे की एक फोटो देखी जा सकती है जिसमें भारत का नक्शा और एक गुम्बद नजर आ रहा है. इस क्लिपिंग को शेयर करते हुए यूजर्स मुस्लिम समुदाय पर निशाना साध रहे हैं और कह रहे हैं कि उन्होंने राष्ट्रध्वज का अपमान किया है. खबर को इस तरह से सोशल मीडिया पर दिखाया जा रहा है कि जैसे ये हाल ही की घटना हो.
एक ट्विटर यूजर ने कटिंग को साझा करते हुए लिखा, "तिरंगे में अशोक चक्र की जगह मस्ज़िद लगाने वालों पर क्या कोई कार्यवाही नही होगी .ऐसी खबरों पर सबका मुँह क्यों बन्द हो जाता है." इसके अलावा और भी कई तरह के कैप्शन के साथ ये क्लिपिंग फेसबुक और ट्विटर पर वायरल है. खबर पर लोग अपना गुस्सा जाहिर कर रहे हैं और झंडे का अपमान करने वालों पर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं.

इंडिया टुडे एंटी फेक न्यूज वॉर रूम (AFWA) ने पाया कि ये खबर दो साल से ज्यादा पुरानी है. ये मामला पीलीभीत में दिसंबर 2018 में सामने आया था.
कैसे पता की सच्चाई?
कुछ कीवर्ड की मदद से खोजने पर हमें इस मामले को लेकर कई खबरें मिली. 'जनसत्ता' में 21 दिसंबर 2018 को प्रकाशित हुई रिपोर्ट के मुताबिक, पीलीभीत के पूरनपुर कस्बे में जुलुस-ए-गौसिया के दौरान तिरंगे में अशोक चक्र की जगह मस्जिद की तस्वीर का इस्तेमाल किया गया था. झंडे की फोटो और वीडियो सामने के बाद हिंदू संगठनों में आक्रोश पैदा हो गया. तिरंगे को लेकर हिंदू जागरण मंच और अखिल भारतीय हिंदू महासभा ने पुलिस को ज्ञापन सौंपा था.

इस मामले में 'पत्रिका' ने भी खबर छापी थी. हिंदू संगठनों ने आरोप लगाया गया था कि इस जुलूस में सुरक्षा के लिए पुलिस भी थी, लेकिन राष्ट्रीय ध्वज का अपमान होने से नहीं रोका गया. बवाल बढ़ने पर पुलिस ने जुलूस के आयोजकों के खिलाफ एफआईआर () दर्ज की थी. हालांकि, "नवभारत टाइम्स" के अनुसार आयोजकों को गिरफ्तार भी किया गया था. इस बारे में मुस्लिम समुदाय का कहना था कि राष्ट्रीय ध्वज का अपमान नहीं हुआ क्योंकि वो एक बस तीन रंग का झंडा था जैसा कि कांग्रेस का झंडा होता है.
यहां हमारी पड़ताल में साफ हो जाता है कि दो साल से ज्यादा पुरानी खबर को अभी का बताकर इंटरनेट पर शेयर किया जा रहा है. मुस्लिम समाज द्वारा तिरंगे के अपमान का मामला सामने जरूर आया था लेकिन ये घटना दो साल पहले की है.