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गहरे जमी हुई है ईरान की सत्ता, बीते दशकों में कई विद्रोह, फिर भी सरकार को उखाड़ना क्यों रहा मुश्किल?

ईरान में तेहरान से लेकर मशहद तक तमाम बड़े-छोटे शहर उबल रहे हैं. सबकी एक ही मांग है, मौजूदा सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की ताकत खत्म कर दी जाए. लोग सड़कों पर इस कदर बवाल मचा रहे हैं कि लग रहा है कि सत्ता किसी भी पल पलट जाएगी. हालांकि ईरान के लिए प्रदर्शन नए नहीं. वो उन्हें दबाना भी जानता है.

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ईरान में इस्लामिक क्रांति के बाद पहली बार इतना उग्र प्रदर्शन दिख रहा है. (Photo- AP)
ईरान में इस्लामिक क्रांति के बाद पहली बार इतना उग्र प्रदर्शन दिख रहा है. (Photo- AP)

मुस्लिम-बहुल देश ईरान में दो सप्ताह से प्रोटेस्ट चल रहा है. आम लोग पुलिस से भिड़ रहे हैं. युवतियां हिजाब के साथ-साथ सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की तस्वीर भी जला रही हैं. डेथ टू डिक्टेटर की मांग के बीच छह सौ से ज्यादा जानें जा चुकीं. माहौल ऐसा है कि सत्ता पलटने को ही है, लेकिन ईरान में ऐसा पहले भी दिखा और पहले भी गुस्से के दावानल को बुझा दिया गया. ईरानी चरमपंथियों के पास इसके लिए पूरा सिस्टम बना हुआ है. 

इसके पहले कब-कब जला तेहरान

- इस्लामिक क्रांति के ऐन बाद वहां कई राजनीतिक समूहों और सेकुलर पार्टियों ने नए शासन के खिलाफ प्रदर्शन किए थे. ये सत्ता के लिए टकराव था. 

- अस्सी के दशक में कुर्दिश आबादी के साथ मिलकर कई अल्पसंख्यक समूहों ने बगावत कर दी. वे इस्लामिक तौर-तरीके नहीं चाहते थे. 

- नब्बे के आखिर में स्टूडेंट प्रोटेस्ट हुआ. तेहरान में यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स ने सरकार की सख्त नीतियों का विरोध करना शुरू कर दिया था. 

- साल 2009 में राष्ट्रपति चुनाव में धांधली को लेकर भारी विरोध हुआ. लोग सड़कों पर उतर आए थे. 

- कोविड से पहले भी महंगाई की वजह से कई छुटपुट प्रोटेस्ट हुए, जो जल्द ही दबा दिए गए. 

- लगभग ढाई साल पहले महसा अमीनी नाम की युवती की हिजाब मामले पर पुलिस हिरासत में मौत हो गई. इसके बाद युवा खुलकर बागी हुए थे. 

iran protest against Ali Khamenei (Photo- Reuters)

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ईरान में इस्लामिक क्रांति के बाद से धर्म पर आधारित व्यवस्थाएं बनीं. ये आदर्श नहीं, बल्कि चरमपंथ की तरफ ले जाने वाली थीं. रूहुल्लाह खुमैनी देश के पहले सुप्रीम लीडर थे. ये धार्मिक नेता थे, लेकिन इन्हीं के हाथ में सब कुछ था. उनके बाद साल 1989 में अली खामेनेई सुप्रीम लीडर बने. तब से वही ईरान की आवाज हैं.

चूंकि देश धार्मिक कट्टरता पर टिका हुआ है, ऐसे में डर भी लगा रहता है कि किसी भी वक्त कोई बागी न हो जाए. इसे संभालने के लिए पूरा सिस्टम तैयार किया गया जो भीतरघात होने से पहले ही उसे कुचल सके. 

कैसे दबाते हैं विद्रोह

इनकी सबसे बड़ी ताकत इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स और बासिज है. बासिज एक तरह की पैरामिलिट्री है, लेकिन इसका ड्रेस कोड नहीं दिखेगा. ये ईरानी लोगों के आसपास कोई भी हो सकता है, जैसे छोटामोटा बिजनेस करने वाला शख्स या दूधवाला भी. चूंकि ये आम लोगों के बीच घुलेमिले होते हैं, लिहाजा ये भेद ले पाते हैं. मुखबिरी के अलावा इन्हें वेपन ट्रेनिंग भी मिली होती है ताकि जरूरत पड़ने पर दुश्मन को खत्म कर सकें. 

ईरान में इंटरनेट बंद है. ये पहली बार नहीं. विद्रोह को कुचलने के लिए पहले भी ये तरीका आजमाया जाता रहा. यहां तक कि चीन की तर्ज पर यहां भी इंटरनेट मूवमेंट्स पर कड़ी नजर रखी जाती है. अगर कोई खामेनेई या उसके लोगों के खिलाफ लिखे-बोले या अमेरिका की तारीफ करता दिखे तो साइबर स्पाई उसे तुरंत पहचान लेते हैं. यहां से खबर आगे दी जाती है, और गतिविधि बंद हो जाती है. 

iran protest against Ali Khamenei (Photo- AP)

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ईरान प्रोटेस्टर्स पर हिंसा के लिए भी कुख्यात रहा. महसा की मौत यहां पुलिस कस्टडी में हुई. 22 साल की युवती पर आरोप था कि उन्होंने हिजाब ठीक से नहीं पहना था. इसके बाद हुई प्रदर्शन में भी कई प्रोटेस्टर गायब हो गए और बाद में मरे हुए मिले. कई बार पुलिस प्रोटेस्टर्स को टॉर्चर करके छोड़ देती है ताकि लोगों के बीच संदेश जाए. 

ईरान में सत्ता कैसे बदलेगी
 
ये गणित का सवाल नहीं जो फॉर्मूला लगाने से हल हो जाए. इसके लिए ऊपर से नीचे तक उस सारे सिस्टम में सेंध लगानी होगी, जो इस्लामिक सत्ता को संजोने के लिए बना हुआ है. सबसे पहले तो देश को एक मजबूत लीडरशिप चाहिए ताकि लोग एक अंब्रेला के नीचे आ सकें. ये लीडरशिप ऐसी हो कि अपने देश के साथ जिसे इंटरनेशनल भरोसा भी हासिल हो. ऐसे में होगा ये कि ईरान के घरेलू विद्रोह को बाहरी मदद मिल सकेगी, फिर चाहे वो डिप्लोमेटिक मदद ही क्यों न हो. 

रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स और बासिज को कमजोर करना भी जरूरी है. ये सुरक्षा बल खामेनेई के लिए बेहद वफादार हैं. ऐसा इसलिए भी है क्योंकि सत्ता उनकी सारी जरूरतें पूरी करती है. इस सुरक्षा दीवार से कुछ ईंटें हटानी होगीं. कुछ ऐसे लोग खोजने होंगे जो चुपचाप खामेनेई से विद्रोह कर सकें. या फिर जो निहत्थे लोगों पर गोलीबारी करने से पीछे हट जाएं. 

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iran protest against Ali Khamenei (Photo- AP)

इस्लामिक क्रांति यानी साल 1979 के बाद से वो सारे फैक्टर हैं, जो ईरान में क्रांति 2.0 ला सकते हैं. आर्थिक संकट भी है. लोगों, खासकर युवाओं में गुस्सा भी है. और सबसे बड़ी बात, विपक्ष अभी एक दिख रहा है. लेकिन बदलाव हुआ भी तो कुछ वक्त या शायद काफी लंबे समय तक अस्थिरता ही रहे. 

कौन संभाल सकता है सत्ता

सत्तापलट की स्थिति में रजा पहलवी एक विकल्प हैं. वे मोहम्मद रजा पहलवी के बेटे हैं, जिन्होंने लगभग चार दशक तक देश पर राज किया था. 65 साल के रजा अमेरिका में हैं और वहीं से प्रदर्शनकारियों को जोश दिला रहे हैं. वे ट्रांजिशन को संभालने की बात भी कर चुके. यानी जाहिर तौर पर वापसी संभव है. 

पूर्व राष्ट्रपति हसन रूहानी अहम दावेदारों में हैं. उनके पास विदेशों, खासकर अमेरिका से संवाद का हुनर भी है. साल 2013 में वे पहले ईरानी नेता थे, जिन्होंने तत्कालीन यूएस प्रेसिडेंट से सीधी बातचीत की. 

एक अनुमान ये भी है कि सेना देश को संभालने लगे. ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि देश के पास फिलहाल कोई मजबूत चेहरा नहीं, जिसपर दांव खेला जा सके. 

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