1026 ईस्वी में गजनी के सुल्तान महमूद ने गुजरात के सोमनाथ मंदिर पर हमला किया. सोमनाथ भगवान शिव के तीर्थों में से एक है. लेकिन इस हमले का इतिहास सिर्फ लूट और मिलिट्री ऑपरेशन तक ही सिमटा हुआ नहीं है. गजनवी के दरबारी इतिहासकारों और कवियो, खास तौर पर फर्रुख़ी सिस्तानी ने इस घटना को एक अलग ही धार्मिक ऐंगल देने की कोशिश की. उन्होंने एक विवादित सिद्धांत सामने रखा और कहा कि सोमनाथ मंदिर में स्थापित मूर्ति का कनेक्शन इस्लाम-पूर्व अरब की देवी ‘मनात’ से था.
सोमनाथ मंदिर में अरब की देवी की मूर्ति?
मनात, अल-लात और अल-उज्ज़ा, ये तीन प्रमुख देवियां थीं जिनकी पूजा इस्लाम के उदय से पहले अरब में होती थी. इस्लाम के शुरुआती दौर में इन देवियों की मूर्तियों को तोड़े जाने का जिक्र मिलता है.गजनवी से जुड़े सोर्स की मानें तो मनात की मूर्ति, aniconic (बिना किसी आकार की) काले पत्थर के रूप में बताया गया है. उसे अरब से निकालकर सुरक्षित रखने के लिए भारत के पश्चिमी तट, यानी सोमनाथ, लाया गया. वहां उसे कथित रूप से शिवलिंग के रूप में पूजा जाने लगा.
फ़ारसी इतिहासकार सोमनाथ को अक्सर “सु-मनात” कहते हैं, जिसका अर्थ बताया गया “मनात का स्थान”. इस मिले-जुले नाम के ज़रिये महमूद के आक्रमण को केवल धन-लूट नहीं, बल्कि एक धार्मिक कर्तव्य के रूप में देखा गया. यानी मूर्तिपूजा के विरुद्ध एक पवित्र संघर्ष. इस तरह महमूद की छवि एक ऐसे योद्धा के रूप में गढ़ी गई, जो बहुदेववाद के विरुद्ध लड़ रहा था.
सुमनात से बना सोमनाथ?
इतिहासकार रोमिला थापर अपनी पुस्तक 'सोमनाथ: द मेनी वॉइसेज़ ऑफ़ अ हिस्ट्री' में लिखती हैं कि फर्रुख़ी और गर्दीज़ी दोनों महमूद से जुड़े हुए थे, सोमनाथ पर आक्रमण का एक अजीब कारण बताते हैं. इसमें शुरुआती तौर पर किसी हिंदू मूर्ति के तोड़े जाने की बात नहीं, बल्कि मनात से जुड़ी कहानी है. फर्रुख़ी के अनुसार ‘सोमनाथ’ या ‘सोमनात’ नाम, ‘सु-मनात’ का बिगड़ा हुआ रूप था, जो देवी मनात की ओर संकेत करता है.

मनात को सेमेटिक (Semitic) परंपरा की एक प्राचीन देवी माना जाता है, जिसकी मूल पहचान ईश्तर से जोड़ी जाती है. बाद में अरब में उसकी पूजा एक मूर्ति के रूप में होने लगी और वह अल-लात व अल-उज्ज़ा के साथ एक प्रमुख देवी-त्रयी का हिस्सा बनी. इन देवियों का उल्लेख क़ुरआन की एक प्रसिद्ध आयत में भी मिलता है. मनात को भाग्य की देवी माना जाता था और उसका तीर्थस्थल क़ुदायद में, समुद्र के किनारे, मक्का और मदीना के उसी क्षेत्र में स्थित था. इस्लाम से पहले के समय में काबा की परिक्रमा करने के बाद मनात के तीर्थ पर जाना तीर्थयात्रा का जरूरी हिस्सा माना जाता था.
इस्लाम से पहले अरब में होती थी तीन देवियों की पूजा
कहा जाता है कि इन देवियों को प्राकृतिक पत्थरों के रूप में पूजा जाता था. पैगंबर मोहम्मद ने इन देवियों और उनके पंथ का विरोध किया, क्योंकि वे अरब के पुराने कबीलाई धर्म का प्रतिनिधित्व करती थीं. प्रारंभिक इस्लाम के लिए यह चुनौतीभरा था, क्योंकि ये देवियां खासकर कुरैश कबीले में बहुत पूजी जाती थीं. कुछ परंपराओं के अनुसार, पैगबर मोहम्मद के निर्देश पर अली ने मनात के तीर्थ को नष्ट किया, जबकि अन्य परंपराएं कहती हैं कि मनात की मूर्ति को छिपा दिया गया.
रोमिला थापर आगे लिखती हैं कि फर्रुखी और गर्दीजी के अनुसार यह किंवदंती प्रसिद्ध थी कि अल-लात और अल-उज्जा की मूर्तियां अरब में नष्ट कर दी गईं, लेकिन मनात की मूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए काठियावाड़ (सौराष्ट्र) भेज दिया गया. एक ऐसे इलाके में, जहां मूर्तिपूजा सामान्य मानी जाती थी. मनात के बारे में यह भी कहा जाता है कि उसकी पूजा काले पत्थर के एक अनाकारी (जिसका कोई आकार न हो) रूप में होती थी, जिसे पशुपत शैव परंपरा के शिवलिंग से भ्रमित किया जा सकता था. हालांकि कुछ विवरणों में मनात की मूर्ति स्त्री-आकृति में भी बताई गई है.
फर्रुखी यह भी लिखते हैं कि सोमनाथ के लोग अपने देवता को इतना शक्तिशाली मानते थे कि उनका मानना था कि महमूद भी उसे नष्ट नहीं कर पाएगा. साथ ही यह भी कहा गया कि सोमनाथ की मूर्ति में मानव-लक्षण थे, जैसे कि काबा में स्थापित मनात की मूर्ति में बताए जाते थे. रोमिला थापर स्पष्ट करती हैं कि ये सभी विवरण विशेष नजरिये से लिखे गए थे और इन्हें शाब्दिक सत्य मानने के बजाय तुलनात्मक रूप से समझने की जरूरत है.
एक प्रसंग यह भी बताया जाता है कि एक समय पैगबर मोहम्मद ने आयतों के रूप में यह स्वीकार किया कि इन तीन देवियों को ईश्वर तक पहुंचने वाले मीडिएटर के रूप में माना जा सकता है. इससे इस्लाम की नई शिक्षाओं को पुराने देवी-पूजकों के लिए स्वीकार्य बनाने का प्रयास था, लेकिन बाद में एक नई आयत में कहा गया कि वे आयतें शैतान की प्रेरणा से थीं, इसलिए उन्हें क़ुरआन से हटा दिया गया और एकेश्वरवाद पर खूब जोर दिया गया.

सोमनाथ पर हमले में हुई थी भारी लूट
आधुनिक इतिहासकार इस पूरे मनात-सोमनाथ संबंध को शक की निगाह से देखते हैं. कई विद्वानों के अनुसार यह कथा महमूद के अभियानों को धार्मिक वैधता देने के लिए गढ़ी गई, ताकि उन्हें ईश्वरीय जिहाद के रूप में प्रस्तुत किया जा सके. इसमें कोई शक नहीं कि सोमनाथ पर आक्रमण में भारी लूट हुई, लेकिन मनात से जुड़ा आख्यान ऐतिहासिक तथ्य से अधिक एक वैचारिक और प्रचारात्मक रचना लगता है.
आखिरकार 1026 ईस्वी का सोमनाथ आक्रमण इस बात का उदाहरण है कि मध्यकालीन इतिहासलेखन में धर्म, राजनीति और मिथक किस तरह आपस में गुंथे हुए हैं. यही मिलावट दक्षिण एशिया और इस्लामी दुनिया में पहचान, आक्रमण और पवित्रता से जुड़ी लंबे समय से चली आ रही ऐतिहासिक कहानियों को आकार देता है.