जब भी दक्षिण भारत की सांस्कृतिक पहचान की बात की जाती है तो तमिलों के लिए इस पहचान का सबसे बड़ा आधार 'तमिल भाषा' बनती है. इस भाषाई पहचान का सिरा तमिल शुद्धता तक पहुंचता है जो कि गौरव के मामले में इतना बड़ा बन जाता है कि तमिल लोग 'द्रविड़' शब्द को भी इससे बाहर का बताने लगते हैं.
आज के मॉडर्न एरा में तमिल और अन्य दक्षिण भारतीय भाषाओं की स्वतंत्रता और प्राचीनता को रेखांकित करने का काम जिन तीन विद्वानों ने किया है, उनमें फ्रांसिस व्हाइट एलिस, जीयू पोप और रॉबर्ट कैल्डवेल का नाम लिया जाता है. बल्कि रॉबर्ट कैल्डवेल का नाम तो अधिक सम्मान से लिया जाता है.
तमिल आंदोलन की नींव में 'बाहरी' विचार
लेकिन क्या आप मानेंगे कि रॉबर्ट कैल्डवेल ही वह व्यक्ति हैं, जिनके जरिये ही ‘तमिल शुद्धता’ की बहस भी खड़ी हुई. यही विचार 'शुद्ध तमिल आंदोलन' की नींव बना. यानी की द्रविड़ राजनीति का वैचारिक आधार एक 'बाहरी' के सोच की उपज है. उनकी इस सोच ने भाषा के भीतर गैरजरूरी कठोरता, बंटवारे और संस्कृत शब्दों के बहिष्कार को बढ़ावा दिया और नतीजा ये हुआ कि इससे तमिल की स्वाभाविक विकास प्रक्रिया पर गंभीर असर पड़ा.
तमिलकम और द्रविड़ के बीच खाई!
असल में तमिल केवल एक भाषा नहीं, बल्कि सभ्यता को संजोने और संवराने में सहायक भी रही है. संगम साहित्य, प्राचीन शिलालेख, मंदिर परंपराएं और लोक-संस्कृति, इन सबकी जड़ में तमिल की गहरी मौजूदगी दिखाई देती है. पुराने समय में 'तमिलकम' ही शब्द था जो अपने अर्थ में तमिलों की पहचान था. उस समय ‘द्रविड़’ जैसा शब्द आम चलन में नहीं था.
‘द्रविड़’ शब्द धीरे-धीरे सामने आया. सातवीं सदी में संस्कृत के विद्वान 'कुमारिल भट्ट' ने ‘आंध्र-द्रविड़’ शब्द का प्रयोग किया. इससे ऐसे संकेत मिलते हैं कि दक्षिण की भाषाओं को उत्तर भारत की भाषाओं से अलग माना जाने लगा था. असल में, प्राचीन भारत में भाषाओं को समझने का तरीका आज जैसा वैज्ञानिक नहीं था. संस्कृत को ज्ञान की मुख्य भाषा माना जाता था और बाकी भाषाओं को अक्सर उसी की शाखा या स्थानीय रूप समझ लिया जाता था.
दक्षिण भारत की भाषाओं का परिवार
भाषाओं को लेकर असली बदलाव 'आधुनिक काल' में आया, जब यूरोपीय विद्वानों ने भारत की भाषाओं को लेकर स्टडी करनी शुरू की. इसी दौर में ‘द्रविड़’ से ‘द्रविड़ियन’ तक की यात्रा शुरू हुई. यह केवल शब्दों का नहीं बल्कि सोच का बदलाव था. अब दक्षिण भारत की भाषाओं को एक अलग भाषा-परिवार के रूप में देखने की कोशिश होने लगी. इस सोच को आकार देने में तीन नाम बहुत अहम हैं, 'फ्रांसिस व्हाइट एलिस', 'रॉबर्ट कैल्डवेल' और 'जीयू पोप'.
फ्रांसिस व्हाइट एलिस ईस्ट इंडिया कंपनी में अफसर थे. उन्होंने पहली बार यह तर्क दिया कि तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम जैसी भाषाएं संस्कृत से नहीं निकली हैं, बल्कि इनकी अपनी जड़े हैं. यह अपने समय के लिए बहुत बड़ा विचार था, क्योंकि तब तक अधिकतर लोग मानते थे कि संस्कृत ही सभी भारतीय भाषाओं की मां है.
एलिस ने दक्षिण भारतीय भाषाओं की आपसी समानताओं की ओर ध्यान दिलाया. हालांकि उन्होंने इस विचार को पूरी तरह व्यवस्थित रूप नहीं दिया, लेकिन उन्होंने बहस की दिशा जरूर बदल दी.
एक बिशप ने कैसे दी 'तमिलकम' की पहचान को धार
इसके बाद आते हैं,'बिशप रॉबर्ट कैल्डवेल' जो इस बहस का सबसे बड़ा और प्रभावशाली नाम हैं. उन्होंने 1875 में अपनी प्रसिद्ध किताब 'A Comparative Grammar of the Dravidian or South-Indian Family of Languages' पब्लिश की. इस किताब ने दक्षिण भारत की सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना पर गहरा असर डाला. कैल्डवेल ने साफ कहा कि तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम ये सभी भाषाएं संस्कृत से अलग 'द्रविड़ियन लैंग्वेज फैमिली' का हिस्सा हैं.
लेकिन, इस मामले में कैल्डवेल के काम का सबसे बड़ा असर यह हुआ कि 'तमिल भाषा को नया आत्मसम्मान मिला'. तमिल को अब केवल संस्कृत की 'छाया' नहीं, बल्कि एक प्राचीन और स्वतंत्र भाषा माना जाने लगा. इससे तमिल समाज में अपनी भाषा और साहित्य को लेकर गर्व की भावना मजबूत हुई. कैल्डवेल खुद तमिल के बड़े प्रशंसक थे. वे लंबे समय तक तमिलनाडु के 'तिरुनेलवेली' क्षेत्र में रहे. उन्होंने तमिल समाज, मंदिरों, पूजा-पाठ और साहित्य को नजदीक से देखा. तमिल की ध्वनि, छंद और व्याकरण की उन्होंने खुलकर तारीफ की.
लेकिन कैल्डवेल भाषा से तो प्रेम करते थे, लेकिन उस 'धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा' से सहमत नहीं थे, जिसमें तमिल विकसित हुई थी. वे ईसाई मिशनरी से जुड़े थे और उनका उद्देश्य केवल एकेडमिक नहीं था. कैल्डवेल ने तमिल को संस्कृत और हिंदू परंपरा से अलग दिखाने की कोशिश की. इसके पीछे यह सोच भी थी कि अगर तमिल समाज को संस्कृत और हिंदू धर्म से वैचारिक दूरी पर खड़ा किया जाए, तो ईसाई धर्म के लिए जगह बनाई जा सकेगी.
कैल्डवेल ने तमिल में मौजूद संस्कृत मूल के शब्दों को अलग करके देखने पर जोर दिया. इससे 'शुद्ध तमिल' वाली सोच को ताकत मिली. बाद में यही सोच 'शुद्ध तमिल आंदोलन' और आगे चलकर 'द्रविड़ राजनीति' का वैचारिक आधार बनी. इस आंदोलन ने तमिल भाषा और अस्मिता को मजबूत किया, लेकिन इसके साथ कुछ समस्याएं भी आईं. भाषा के भीतर गैरजरूरी कठोरता और बंटवारा पनपा. संस्कृत शब्दों को पूरी तरह खारिज करने की एक बेवजह की आदत में बढ़ोतरी हुई, जिससे भाषा की स्वाभाविक विकास प्रक्रिया पर असर पड़ा.
...लेकिन कैल्डवेल की मंशा क्या थी?
कैल्डवेल विद्वान तो थे, लेकिन उनमें औपनेविशिक पूर्वाग्रह भी था. उन्होंने भाषाओं को ‘सभ्य’ और ‘असभ्य’ वाले खांचों में बांटा. इससे मौखिक परंपराएं और जनजातीय भाषाएं हाशिए पर चली गईं. सबसे गंभीर बात यह थी कि कैल्डवेल ने भाषाई भिन्नताओं को 'नस्ली' बना दिया. यह सोच आज के वैज्ञानिक मानकों पर गलत मानी जाती है. भाषा और नस्ल को एक मानने से भविष्य में सामाजिक और राजनीतिक खाईयां गहराती चली गईं. कैल्डवेल का एक और विरोधाभास 'शनार (नाडार) विवाद' में दिखता है. मिशनरी होने के बावजूद उन्होंने कई बार जातिगत यथास्थिति का समर्थन किया.
'जीयू पोप' ने तमिल साहित्य को पश्चिमी दुनिया में पहचान दिलाने में बड़ी भूमिका निभाई. उन्होंने तिरुक्कुरल जैसे ग्रंथों का अंग्रेज़ी में अनुवाद किया. हालांकि उनके अनुवादों पर यह आरोप भी लगे कि उन्होंने तमिल ग्रंथों को पश्चिमी ईसाई नैतिकता के अनुरूप ढालने की कोशिश की. आज ‘द्रविड़’ और ‘द्रविड़ियन’ की अवधारणा केवल भाषाविज्ञान तक सीमित नहीं है. यह राजनीति और विचारधारा की बहस बन चुकी है. कुछ लोग कैल्डवेल पर 'डिवाइड एंड रूल' की सोच थोपने का आरोप लगाते हैं. वहीं कई विद्वान मानते हैं कि कैल्डवेल को पूरी तरह खारिज करना सही नहीं होगा. उनका काम ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन उसे 'आलोचनात्मक नजरिये' से पढ़ना ज़रूरी है.
भाषा, समाज और राजनीति में नई दरार!
कैल्डवेल और उनके जैसे विद्वानों की विरासत दोहरी है. एक ओर उन्होंने तमिल और दक्षिण भारतीय भाषाओं को वैश्विक पहचान और आत्मसम्मान दिलाया. दूसरी ओर उनकी सोच ने भाषा, समाज और राजनीति में नई दरारें भी डालीं. इसलिए ‘द्रविड़’ से ‘द्रविड़ियन’ तक का सफर केवल भाषा का नहीं, बल्कि 'विचार, सत्ता और पहचान' का सफर है, जिसे समझने के लिए न अंधी प्रशंसा ठीक है, न पूरी तरह खारिज करना. इसे बैलेंस और आलोचनात्मक अध्ययन के जरिए ही ठीक से समझा जा सकता है.