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बूढ़े माता-पिता की अनदेखी पड़ेगी महंगी, असम के बाद तेलंगाना क्यों अपना रहा सैलरी-कट मॉडल?

तेलंगाना सरकार जल्द ही नया नियम ला सकती है. इसके तहत कमाऊ बच्चे अगर अपने बुजुर्ग माता-पिता का ध्यान न रखें तो उनकी तनख्वाह का 10 प्रतिशत काटकर सीधे पेरेंट्स के खाते में ट्रांसफर कर दिया जाएगा. अब तक ये एक्ट सिर्फ असम में लागू रहा. वहीं केंद्र के स्तर पर भी एक नियम है लेकिन वो उतना कारगर नहीं.

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बुजुर्ग पेरेंट्स के लिए बच्चों की जवाबदेही तय करने को लेकर राज्य सरकारें सख्त हो रही हैं. (Photo- Pixabay)
बुजुर्ग पेरेंट्स के लिए बच्चों की जवाबदेही तय करने को लेकर राज्य सरकारें सख्त हो रही हैं. (Photo- Pixabay)

वयस्क और कमाऊ बच्चों को अपने बूढ़े होते अभिभावकों की देखरेख करनी चाहिए. ये सलाह तो हमेशा दी जाती है लेकिन अब सरकार इसपर एक्ट भी बनाने जा रही है.  हाल में तेलंगाना के सीएम रेवंत रेड्डी ने कहा कि अगर सरकारी नौकरी करते बच्चे अपने पेरेंट्स की जरूरतें पूरी न करें तो उनकी मासिक आय से 10 प्रतिशत काटते हुए पेरेंट्स के खाते में डाल दी जाएगी. फिलहाल केवल असम में इस तरह का नियम है, जिसे प्रणाम एक्ट भी कहते हैं. 

क्या है प्रणाम एक्ट और क्यों पड़ी जरूरत

साल 2017 में असम में पेरेंटल रिस्पॉन्सिबिलिटी नॉर्म्स फॉर अकांटेबिलिटी मॉनिटरिंग एक्ट (प्रणाम एक्ट) लाया गया. यह कानून असम के सरकारी कर्मचारियों के लिए है ताकि वे अपने बुजुर्ग माता-पिता और दिव्यांग भाई-बहनों की जिम्मेदारी लें. अगर कोई कर्मचारी अपने परिवार का ध्यान नहीं रखता है तो प्रणाम आयोग के आदेश पर उसकी पगार का नियत हिस्सा काटकर उसे जरूरतमंद सदस्य के खाते में ट्रांसफर कर दिया जाता है. 

असम में इस कानून की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि वहां एक सामाजिक समस्या बढ़ती दिख रही थी. सरकारी नौकरी करने वाले कई लोग शहरों में या दूसरे राज्यों में माइग्रेट हो चुके, लेकिन उनके माता-पिता अकेले रह गए. कई मामलों में पता लगा कि इलाज और रुटीन जरूरत के लिए भी वे दूसरों पर निर्भर हो गए.

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लगातार ऐसी शिकायतें आने लगीं कि बच्चों के होते हुए भी पेरेंट्स की देखभाल नहीं हो पा रही. खासतौर पर सरकारी कर्मचारियों के मामलों में यह सवाल उठा कि जब लोगों को स्टेट से नियमित वेतन मिल रहा है तो वे जिम्मेदारियों से कैसे बच सकते हैं!

Telangana Chief Minister Revanth Reddy (Photo- PTI)
तेलंगाना की रेवंत रेड्डी सरकार असम की तर्ज पर बुजुर्ग अभिभावकों की देखभाल पर कानून ला रही है. (Photo- PTI)

नॉर्थईस्टर्न राज्य में पारिवारिक विवाद बढ़ रहे थे. बुजुर्ग अदालतों का चक्कर काट रहे थे. मामला इतना बढ़ा कि सरकार को नैतिक अपील छोड़कर एक्शन मोड में आना पड़ा. प्रणाम एक्ट का मकसद सजा देना नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करना है. सरकार ने इसे सोशल रिफॉर्म की तरह पेश किया ताकि परिवार न टूटें और लोग बड़ी उम्र में लाचार और बेघर न हों. यही वजह है कि एक्ट में कोई फाइन या सजा नहीं, बल्कि सीधे पगार काटने का नियम बना दिया गया. 

अभी देश में कौन सा कानून

फिलहाल हमारे यहां मेटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटीजन (एमडब्ल्यूपीएससी) एक्ट है. यह सेंटर की पहल है. लगभग दो दशक पहले बना कानून यह पक्का करने के लिए है कि कमाऊ बच्चे अपने पेरेंट्स की पूरी देखभाल करें. अगर वे ऐसा नहीं करते हैं, तो बुजुर्ग ट्रिब्यूनल में शिकायत कर सकते हैं और उन्हें गुजारा भत्ता मिलेगा. 

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पाया गया कि लॉ है तो, लेकिन जमीनी स्तर पर असरदार नहीं. कानून में साफ है कि पहले माता-पिता को शिकायत करनी होगी, इससे बाद ही दखल दिया जा सकता है. पेरेंट्स के लिए न तो भावनात्मक, न ही सामाजिक और शारीरिक तौर पर ये करना आसान है. अव्वल तो वे शिकायत ही नहीं करेंगे, और करें भी तो बार-बार वकीलों और अदालत के चक्कर नहीं काट सकते. 

दूसरी बड़ी कमी यह थी कि इसमें सरकारी कर्मचारियों की जवाबदेही तय नहीं होती. गुजारा भत्ता लिया जा सकता है, लेकिन कब और कितना, इसपर भी विवाद रहता है.

court on elderly parents (Photo- PTI)
केंद्रीय स्तर पर बने एक्ट में बुजुर्ग और अक्षम पेरेंट्स गुजारा भत्ता ले सकते हैं लेकिन कोर्ट जाकर.  (Photo- PTI)

कैसे काम करता है प्रणाम एक्ट

इसी गैप को भरने के लिए असम सरकार प्रणाम एक्ट लेकर आई. यह कानून प्रिवेंटिव है. इसमें माता-पिता को सीधे अपने बच्चों के खिलाफ केस दर्ज कराने की मजबूरी नहीं होगी. अगर किसी सरकारी कर्मचारी के पेरेंट्स की देखभाल नहीं हो रही तो शिकायत कई तरीकों से आ सकती है. जैसे माता-पिता खुद स्थानीय प्रशासन, समाज कल्याण विभाग या तय की गई अथॉरिटी को जानकारी दे सकते हैं. इसके अलावा रिश्तेदार, पड़ोसी या स्थानीय अधिकारी भी मामले को सामने ला सकते हैं.

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शिकायत के बाद मामला कोर्ट में नहीं, बल्कि सरकारी स्तर पर बनी कमेटी या नोडल अथॉरिटी के पास जाएगा. वहां जांच होगी कि क्या सच में परिवार की अनदेखी हो रही है. अगर आरोप सही पाए जाएं तो सरकार सीधे कर्मचारी की सैलरी से तय हिस्सा काटकर माता-पिता के खाते में भेज देगी.

क्या हो सकता है तेलंगाना में

अब तेलंगाना भी मिलते-जुलते एक्ट की बात कर रहा है. 12 जनवरी को सीएम रेड्डी ने इसका एलान किया. पेरेंट्स की अनदेखी करने वाले सरकारी कर्मचारियों के खाते से कटी हुई रकम सीधे पेरेंट्स के बैंक खाते में जाएगी ताकि बुजुर्गों को किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े. 

जल्द ही इस प्रपोजल का ड्राफ्ट बिल बन सकता है और इसे आगामी बजट सेशन में विधानसभा में दिया जाएगा. इससे होगा यह कि जिन सरकारी लोगों को नियमित पगार मिल रही है, वे अपनी जिम्मेदारी से बचेंगे नहीं. 

तेलंगाना में इसके अलावा प्रणाम डे केयर बनाया जा रहा है. यह सीनियर सिटीजन के लिए बने सेंटर हैं, जहां बुजुर्ग आपस में मिल-बैठ सकेंगे. यहां उन्हें खाना और बाकी सुविधाएं भी मिलेंगी. हर प्रणाम डे-केयर सेंटर पर करीब 1 करोड़ रुपये खर्च किए जा सकते हैं. फिलहाल 37 जगहों पर इन्हें बनाया जा रहा है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस पूरी योजना के लिए राज्य सरकार ने 50 करोड़ रुपये का बजट तय किया है. 

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