पहले वैज्ञानिक यूनिवर्स को एक शांत और न बदलने वाली जगह मानते थे, जहां धरती पर जीवन चलता रहेगा. फिर बिग बैंग की सोच आई, आकाशगंगाओं की खोज हुई, ब्लैक होल का पता लगा और आखिर में एक ऐसी खोज सामने आई जिसने वैज्ञानिकों को चौंका दिया. ब्रह्मांड तेजी से फैल रहा है, और इसके पीछे है डार्क एनर्जी. यही वो चीज है, जो यूनिवर्स के फैलाव को बढ़ा रही है. लेकिन इसका उल्टा असर धरती पर पड़ सकता है.
क्या है डार्क एनर्जी और कैसे करती है काम
डार्क एनर्जी एक ऐसी रहस्यमयी ताकत है, जिसके बारे में वैज्ञानिक आज भी पूरी तरह नहीं जानते. इसे हम देख नहीं सकते और न ही सीधे माप सकते हैं, लेकिन इसके असर साफ दिखाई देते हैं. यही ताकत ब्रह्मांड को लगातार और पहले से ज्यादा तेजी से फैलने पर मजबूर कर रही है. पहले माना जाता था कि गुरुत्वाकर्षण इस फैलाव को धीरे-धीरे कम कर देगा, लेकिन पता लगा कि ब्रह्मांड तो और तेजी से फैल रहा है. इसी अनजानी वजह को डार्क एनर्जी नाम दिया गया. आज की समझ के मुताबिक करीब 70 फीसदी यूनिवर्स डार्क एनर्जी से बना है.
इसका असर बहुत बड़े पैमाने पर होता है, जैसे आकाशगंगाओं के बीच की दूरी बढ़ाना. इसका असर धरती, सूरज या सोलर सिस्टम पर नहीं पड़ता था क्योंकि यहां गुरुत्वाकर्षण मजबूत रहा. लेकिन नासा के मुताबिक, यूनिवर्स के बनने के करीब नौ अरब साल बाद यह ताकत गुरुत्वाकर्षण पर भारी पड़ने लगी. इससे अंतरिक्ष का फैलाव धीमा होने की बजाय और तेज होता चला गया.

वैज्ञानिकों ने इस एनर्जी की खोज कैसे की
डार्क एनर्जी दिखाई नहीं देती. यह न रोशनी छोड़ती है, न उसे रिफ्लेक्ट करती है. फिर भी यह पूरे ब्रह्मांड का लगभग 70 फीसदी हिस्सा है, यानी सारे तारे, ग्रह, आकाशगंगाएं और यहां तक कि डार्क मैटर को मिलाकर भी इससे कुछ कम ही होता है. वैज्ञानिकों ने इसे खोजने के लिए नहीं खोजा, बल्कि यह अचानक समझ आया, जब लगा कि कुछ अलग है. यूनिवर्स वैसा बर्ताव नहीं कर रहा था जैसी कैलकुलेशन बता रही थीं.
1922 में एक रूसी गणितज्ञ अलेक्जेंडर फ्रीडमैन ने यूनिवर्स के भविष्य की अलग-अलग संभावनाएं निकालीं. उनकी कैलकुलेशन ने उस समय एक चौंकाने वाली बात कही. यूनिवर्स स्थिर नहीं है, बल्कि यह फैल सकता है. चूंकि इसकी तह तक नहीं पहुंचा जा सका, लिहाजा इसे डार्क एनर्जी यानी कोई रहस्यमयी ताकत नाम दे दिया गया.
क्यों हो सकती है चिंता की बात
ग्रेविटी का काम चीजों को जोड़ना है. इसी से तारे, ग्रह और आकाशगंगाएं बनती हैं. लेकिन डार्क एनर्जी इसका उलटा काम करती है. यह बाहर की ओर धक्का देती है, जिससे बहुत बड़े स्तर पर यूनिवर्स फैल रहा है. कई साल तक एक्सपर्ट मानते रहे कि डार्क एनर्जी स्थिर है, यानी न बदलने वाली चीज है लेकिन अगर ऐसा होता, तो यूनिवर्स हमेशा फैलता रहता और धीरे धीरे ठंडा और खाली होता जाता. इस कंसेप्ट को बिग फ्रीज कहते हैं. फिलहाल तो ऐसा हुआ नहीं.

हाल की कुछ स्टडीज चिंता बढ़ाने वाली बात कहती हैं. डार्क एनर्जी वक्त के साथ शायद कमजोर हो रही है. अगर ऐसा हुआ, तो गुरुत्वाकर्षण धीरे धीरे फिर हावी हो सकता है. फैलाव धीमा पड़ सकता है, फिर रुक सकता है और आखिर में यूनिवर्स सिकुड़ने लगे. इस हालात को बिग क्रंच कहा जाता है.
बिग क्रंच की स्थिति में आकाशगंगाएं एक दूसरे के और करीब आने लगेंगी, तापमान बढ़ेगा और खुद स्पेस सिकुड़ने लगेगा. इसका मतलब यह हो सकता है कि ब्रह्मांड आखिर में बेहद घना और गर्म होते हुए खत्म हो जाए. बिग क्रंच और बिग फ्रीज दोनों ही स्थितियां खतरनाक हैं. लेकिन वैज्ञानिकों की चिंता की वजह ये है कि अब यह संभावना बढ़ती दिख रही है कि डार्क एनर्जी वैसा बर्ताव नहीं कर रही जैसा पहले लगा था. ऐसे में ग्रेविटी काफी तेजी से हावी हो सकती है और धरती समय से पहले खत्म हो सकती है.
इसी वजह से नए तरीके तैयार किए जा रहे हैं, ताकि यूनिवर्स के फैलाव को सही ढंग से समझा जा सके. मकसद सीधा लेकिन गहरा है. यह जानना कि डार्क एनर्जी स्थिर है या धीरे धीरे कमजोर हो रही है. इसी से समझ आ सकेगा कि यूनिवर्स का अंत कैसे हो सकता है, या फिर होगा भी या नहीं, या फिर डार्क एनर्जी की मौजूदगी की वजह क्या है?