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मायावती का दलितों के साथ दिल का संवाद

कभी स्कूल शिक्षक रहीं बसपा प्रमुख हर रैली में लोगों के  सामने अपनी बात ऐसे रखती हैं मानो कोई टीचर अपने छात्र-छात्राओं को समझ रही हों.

मायावती मायावती

मायावती उत्तर प्रदेश की अकेली नेता हैं जिनके पास बचाने के लिए अपना किला है. सत्ता ने उन्हें संजीदा बना दिया है. ऐसी किसी भी नेता से हर सभा में नई-नई बातों को सुनने की तमन्ना निरर्थक है. देश के सबसे बड़े राज्‍य में दलित उभार की नेत्री का अंदाज सबसे जुदा है. पर भव्य सोफे के पीछे थोड़े से अंधेरे में बैठे लोगों में बसपा के चुनाव प्रत्याशी और उन्हीं के साथ सरकार में ताकतवर मंत्री माने जाने वाले नसीमुद्दीन सिद्दीकी बैठे हुए हैं.

जैसे ही हेलिकॉप्टर की गूंज सुनाई देती है, पीछे की लाइन में बैठे सारे लोग माइक के पास आ जाते हैं और नारे लगाने लगते हैं 'बहन कुमारी मायावती जिंदाबाद,' 'मान्यवर कांशीराम जिंदाबाद,' 'बसपा जिंदाबाद'. मंत्री और प्रत्याशी भी उनसे सुर मिलाने लगते हैं. मायावती के मंच पर पहुंचने और उनके खास सोफे पर बैठने के बाद शुरू होता है साष्टांग दंडवत और चरण स्पर्श का वह सिलसिला जो ब्राह्मणवादी व्यवस्था की पहचान है.

मायावती हमेशा की तरह इस रैली में भी देर से आती हैं लेकिन बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के उम्मीदवार समां बांधे रहते हैं. यह बहराइच की सभा है. इलाके में मुसलमान मतदाताओं की पर्याप्त संख्या है लिहाजा शुक्रवार को आयोजित रैली में मुसलमानों की सामूहिक जुमे की नमाज की भी व्यवस्था की गई है. बहराइच की नानपारा विधानसभा सीट से बसपा विधायक और वर्तमान में यहीं से चुनाव लड़ रहे वारिस अली करीब 1 बजे मंच पर आकर ऐलान करते हैं, ''अभी इमाम साहब नमाज पढ़ाने के लिए आने वाले हैं.'' रैली के श्रोता और मंच पर मौजूद लोगों के बीच दाढ़ी-टोपी वाले मर्दों और बुर्कानशीं औरतों को देखकर लगता है कि बसपा अब हर क्षेत्र के लिए नए समीकरण तलाशने में जुटी है.

मंच की शानदार साज-सज्‍जा दबे-कुचले दलित समाज को न केवल मायावती की शान के दर्शन कराती है बल्कि उन्हें यह एहसास भी कराती है कि दलित समुदाय के लिए जिस भव्यता को अभी तक पाना मुश्किल था, उसे उनकी बेटी ने अपने लिए आसान कर लिया. यह दलित अस्मिता को मुद्दा बनाकर वोट बैंक को अपने पाले में रखने का संदेश दिखाता है.

बसपा प्रमुख हर इलाके में अलग रणनीति अपना रही हैं.  बसपा के बैनरों में शाहू जी महाराज, नारायणा गुरु, ज्‍योतिबा फुले, डॉ. आंबेडकर और कांशीराम के साथ स्त्री शिक्षा की महान सुधारक और ज्‍योतिबा फुले की पत्नी सावित्री बाई फुले की भी फोटो लगती थी. लेकिन बहराइच की सभा में सावित्री बाई फुले की तस्वीर गायब थी. वजहः बहराइच की बलहा विधानसभा (सुरक्षित) सीट से भाजपा की प्रत्याशी का भी नाम सावित्री बाई फुले है.

करीब पांच मिनट बैठने के बाद मायावती माइक के पास जाती हैं. इससे पहले मंच पर मौजूद सुरक्षा अधिकारियों के दस्ते में से कोई अधिकारी फोल्डर में रखा हुआ मायावती का भाषण पोडियम पर रख देता है. इसके साथ एक पर्चा और होता है जिसमें सभी प्रत्याशियों के नाम होते हैं. मायावती अपना भाषण कुछ यूं शुरू करती हैं: ''भाइयों और बहनों, जैसा कि आप सबको मालूम है कि विधानसभा चुनाव का बिगुल बच चुका है...'' इसके बाद वे एक-एक करके मंच पर मौजूद प्रत्याशियों का परिचय विधानसभावार कराती हैं. उनकी रैली में आसपास की सभी विधानसभा सीटों पर खड़े बसपा के उम्मीदवार मौजूद रहते हैं. मायावती की सभी रैलियों में 50,000 से एक लाख तक की भीड़ हो जाती है.

मायावती का भाषण लिखा होता है. टीचर रहीं मायावती मास्टरनी की तरह पूरे भाषण को लगातार 45 मिनट के लेक्चर की तरह सामने बैठी जनता को सुनाती हैं. अगर कोई बात अस्पष्ट होती है तो वे 'कहने का तात्पर्य यह है' बोल कर उसे समझती भी हैं. लगभग हर रैली में मायावती के साथ मौजूद रहने वाले सिद्दीकी और पार्टी के जोनल कोऑर्डिनेटर जुगल किशोर बीच-बीच में जनता को ताली बजाने का इशारा करते हैं और रैली स्थल तालियों की आवाज से गूंज उठता है.

सभी रैलियों में मायावती बताती हैं कि कांशीराम की वसीयत के अनुसार ही उन्होंने अपनी मूर्तियां बनवाई हैं. वे यह भी कहती हैं कि उनकी और हाथियों की मूर्तियां ढके जाने से बसपा कार्यकर्ता बेहद गुस्से में हैं और इसका जवाब वे प्रदेश में दोबारा बसपा की सरकार बनवाकर देंगे.

वे अपने भाषण की शुरुआत में ही पूर्व विधायकों और मंत्रियों के टिकट काटने पर सफाई देती हैं, ''बसपा के लोग भोले-भाले हैं. ऐसे में ही हमारी पार्टी से पिछली बार कई सारे दूसरे दलों से आए गलत लोग टिकट पाने में सफल हो गए. वे अपने व्यक्तिगत स्वाथोर्ं के कारण गलत कायोर्ं में लिप्त हो गए थे, जिससे हमारी पार्टी की छवि धूमिल हो रही थी, ऐसे विधायकों और मंत्रियों पर कार्रवाई की गई, ऐसे मंत्रियों और विधायकों के टिकट काट दिए गए.''

इसके बाद वे कांग्रेस पर निशाना साधती हैं. वे कहती हैं कि कांग्रेस ने राज्‍य में 40 साल के कार्यकाल में विकास का काम नहीं किया जिसका जवाब जनता ने दे दिया. वे कहती हैं, ''पिछली सरकारों के खराब आर्थिक हालात के कारण ही युवा पलायन कर रहे हैं और कांग्रेसी राज्‍यों में उनके साथ सौतेला व्यवहार हो रहा है.'' वे भ्रष्टाचार के मुद्दे पर अपनी सरकार पर कांग्रेस और खास तौर पर राहुल गांधी की टिप्पणी का जवाब देते हुए कहती हैं, ''कांग्रेस को भ्रष्टाचार पर बोलने का कोई हक नहीं है क्योंकि 31 महीने की यूपीए सरकार के समय में ही करीब 62 घोटाले हो चुके हैं जिसमें 20 लाख करोड़ रु. भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुके हैं.''

मायावती आरोप-प्रत्यारोप के बीच अपने चुनाव प्रतीक हाथी पर लोगों में एक संदेश देती हैं, ''भारतीय संस्कृति और मान्यवर कांशीराम की दलित अस्मिता के प्रतीक के रूप में सम्मान देने के लिए लगवाई गईं मूर्तियों को ढकने के चुनाव आयोग के फैसले से आप लोग बहुत दुखी हैं, अब आप लोगों को अपने इस दुःख का जवाब इन चुनावों में इस बात को ध्यान में रखकर देना है कि खुला हाथी लाख का और ढका हाथी सवा लाख का. इस हिसाब से पार्टी के उम्मीदवारों को ज्‍यादा अंतर से जिताना होगा.''

चुनाव प्रचार के बाद के चरणों में मायावती के तेवर तल्ख हैं. 16 फरवरी को लखनऊ रैली में उन्होंने मुलायम सिंह पर निशाना साधते हुए कहा, ''अगर अंबेडकर न होते तो मुलायम सिंह और उनके परिवार के लोग किसी खेत में गाय-भैंस चरा रहे होते.'' अगली ही पंक्ति में वे जोड़ती है, ''ऐसा मुलायम सिंह को अपमानित करने के लिए नहीं बल्कि उन्हें अपने संतों-महापुरुषों के प्रति आदर का एहसास कराने के लिए कही हैं.''

भाषण खत्म होने के बाद मायावती मंच पर आगे बढ़कर दो-तीन मिनट तक हाथ हिलाकर जनता का अभिवादन करती हैं और तुरंत हेलिकॉप्टर की ओर चल पड़ती हैं. हेलिकॉप्टर में बैठने और उड़ान भरने के बाद भी कुछ देर तक हाथ हिलातीं मायावती कहीं-न-कहीं जनता के अभिवादन के राहुल गांधी और सोनिया गांधी तरीकों को अपनाती दिखती हैं.

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