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सैटेलाइट से खुलासा: पराली जलाने के मामलों में 88% कमी, प्रदूषण से राहत

राजधानी दिल्ली और आस-पास के इलाकों में प्रदूषण के लिहाज से अच्छी खबर आ रही है. इंडिया टुडे की डाटा इंटेलिजेंस यूनिट (DIU) ने NASA के फर्म प्रोजेक्ट के तहत मोडिस और विरस सैटेलाइट प्लेटफॉर्म से मिले आंकड़े का विश्लेषण करने के बाद पाया कि 10 नवंबर के बाद उत्तर भारत में पराली जलाने की घटनाओं में करीब 88 फीसदी की कमी आई है.

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प्रदूषण से थोड़ी राहत (फाइल फोटो) प्रदूषण से थोड़ी राहत (फाइल फोटो)

  • पराली जलाने की घटनाओं में कमी के संकेत
  • हवा में सुधार, प्रदूषण से मिल सकती है राहत

राजधानी दिल्ली और आस-पास के इलाकों में प्रदूषण के लिहाज से अच्छी खबर आ रही है. पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में धान की फसल के बेकार हिस्से यानी पराली को जलाने के मामलों में कमी आई है. पिछले हफ्ते दिल्ली में प्रदूषण का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO के मानक से 15 गुना ऊपर पहुंच गया था.

इंडिया टुडे की डाटा इंटेलिजेंस यूनिट (DIU) ने NASA के फर्म प्रोजेक्ट के तहत मोडिस और विरस सैटेलाइट प्लेटफॉर्म से मिले आंकड़े का विश्लेषण करने के बाद पाया कि 10 नवंबर के बाद उत्तर भारत में पराली जलाने की घटनाओं में करीब 88 फीसदी की कमी आई है. हालांकि, गिरावट का ट्रेंड आगे भी जारी रहेगा या नहीं इस बारे में कोई जानकारी नहीं है. पिछली बार भी तीन-चार दिनों तक संख्या में कमी आई लेकिन दोबारा किसानों ने पराली जलाना शुरू कर दिया. हालांकि, गेहूं बोने का समय भी अब निकलता जा रहा है, इसलिए पराली की घटना में कमी आने की संभावना ज्यादा है.

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सैटेलाइट ने पंजाब, हरियाणा सहित उत्तर भारत के कई इलाकों में थर्मल इमेजरी के जरिए आग की हजारों घटनाओं के अलर्ट जारी किए. पहले से दुनिया के प्रदूषित शहरों में अव्वल माने जाने वाले दिल्ली शहर की हवा और जहरीली हो गई. सुप्रीम कोर्ट के रोक के बावजूद पराली की घटनाएं खासतौर पर पंजाब और हरियाणा में घटित हुईं. हवा की गति और दिशा जब-जब दिल्ली की ओर हुई तब-तब पहले से प्रदूषण की मार झेल रही दिल्ली में हालत बद से बदतर होने लगी.

पिछले हफ्ते के शुरुआती तीन दिनों में पंजाब, हरियाणा, यूपी सहित उत्तर भारत के अन्य राज्यों में पराली जलाने के सात हजार से ज्यादा मामले सामने आए. उत्तर-पश्चिम से आने वाली ठंडी और कम गति की हवाओं के साथ खतरनाक प्रदूषित कणों खासकर PM2.5 संघनित होकर दिल्ली की हवा में घुल गए. इनवर्जन यानी हवा में स्मॉग या जहरीला धुआं के लिए पराली के साथ-साथ मौसम के ठंडा होने हवा की गति कम रहना इसे जहरीली बना देता है. इसलिए प्रदूषण का स्तर अलग-अलग शहरों या इलाकों में अलग-अलग होता है. दिल्ली की भौगोलिक बनावट, लाखों गाड़ियों और थर्मल स्टेशन की वजह से हवा साल में मात्र एक या दो दिन सामान्य रहती है. ऐसे में पराली से आने वाला धुआं यहां की हवा में और जहर घोल देता है.

उदाहरण के लिए डीआईयू ने सबसे खतरनाक प्रदूषण कण PM2.5 जिसे लोगों के नाक के बाल और मास्क रोक नहीं पाते उनका दिल्ली में हर घंटे औसत लेवल चेक किया. हमने पाया कि 15 नवंबर को यह सबसे 600 के ऊपर पहुंच गया था. डब्ल्यूएचओ के स्टैंडर्ड के हिसाब से इसे 25 होना चाहिए था. पूरे हफ्ते के 24 घंटे का स्तर की गणना के बाद पाया कि पिछले हफ्ते के दौरान औसतन हर समय PM2.5 डब्ल्यूएचओ के स्टैंडर्ड से 15 गुना अधिक था.

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हालांकि पराली की घटनाओं की कमी का असर अभी दिल्ली की हवा पर कुछ खास नहीं हुआ है, लेकिन शनिवार से प्रदूषण के स्तर में गिरावट के संकेत मिलने लगे हैं. उत्तर भारत के शहरों में हवा की गुणवत्ता का सूचकांक यानी AQI में राहत है. रविवार (17 नवंबर) को सात बजे गुरुग्राम में PM2.5 AQI 107 था, वहीं दिल्ली का 259 (सुबह 6 बजे), फरीदाबाद 266, नोएडा  218, गाजियाबाद 226, लखनऊ 254, मुरादाबाद 209, कानपुर 327, वाराणसी 304, पटना 344, कोलकाता 236 दर्ज किया गया. ये सभी आंकड़े रविवार सुबह 6 के हैं.

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जहरीली हवा की सबसे ज्यादा मार उत्तर भारत के शहरों में है. जहां धूल और धुएं के साथ अंधाधुंध कंस्ट्रक्शन पूरे साल चलता रहता है. दिल्ली में बड़ी संख्या में गाड़ियां, थर्मल पॉवर प्लांट्स और ठंड के साथ पराली जलाने की घटना इसे ज्यादा खतरनाक बना देती है. इसलिए इनमें से कोई भी किसी तरह कम होता है तो दिल्ली को थोड़ी राहत महसूस होती है. पराली जलाने के मामले कम होने से दिल्ली को फौरी राहत भले ही मिले लेकिन प्रदूषण से पूरी तरह मुक्त होने के फिलहाल आसार नहीं हैं.

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