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Mahabharat May 21 Update: इंद्रप्रस्थ का सम्राट बना युधिष्ठिर, श्री कृष्ण ने किया शिशुपाल वध

महाभारत की कथा अब उस महायुद्ध की तरफ तेजी से अग्रसर है जिसने मानवता को कई सीख दी, जिसने कई सिद्धांत हमेशा के लिए बदल दिए. जानिए क्या हुआ गुरुवार के एपिसोड में.

महाभारत के एक सीन में कृष्ण अवतार में नीतीश भारद्वाज महाभारत के एक सीन में कृष्ण अवतार में नीतीश भारद्वाज

महाभारत में अब समय तेजी से बीत रहा है और हर घटना उस महायुद्ध की तरफ एक इशारा कर रही है. गुरुवार के एपिसोड में युधिष्ठिर को इंद्रप्रस्थ का राजा बना दिया जाता है और शिशुपाल का वध हो जाता है.

पांडवों का राजसूय यज्ञ

श्री कृष्ण, भीम और अर्जुन के साथ स्नातक ब्राह्मणों का रूप धारण कर पहुंच गए हैं मगध नरेश जरासंध के पास. कृष्ण ने जरासंध को अपने दोनों स्नातक ब्राह्मणों का मौन व्रत का बहाना कर उसे आधी रात के उपरांत आने पर विवश कर दिया.

कैसे हुआ जरासंध का वध?

ब्राह्मणों के विश्राम का प्रबंध कराया, और वचन के अनुसार जरासंध आधी रात के उपरांत वहां पहुंच गया. उनके हाव-भाव देखकर जरासंध समझ जाता है कि ये कोई ब्राह्मण नहीं हैं. कृष्ण जरासंध को भड़काते हैं तभी जरासंध क्रोध में आकर उनकी मांग पूछता है और कृष्ण द्वंद युद्ध का प्रस्ताव रखते हैं. जिसे सुनकर जरासंध हंसता है और द्वंद युद्ध के लिए भीम को चुनता है और उनका असली परिचय भी पूछता है. तब उसे पता चलता है कि उसके सामने कृष्ण, अर्जुन और भीम हैं.

भीम और जरासंध के बीच मल्लयुद्ध शुरू होता है. भीम तो बस मौके की तलाश में है कि कब वो उसके दोनों पैरों को पकड़कर बीच में से चीर दे. लेकिन जरासंध कम बलवानी नहीं. दोनों के बीच कड़ी टक्कर होती है और आखिरकार भीम को श्री कृष्ण का इशारा मिला और उसने जरासंध को बीच में फाड़कर अलग-अलग फेंक दिया, लेकिन जरासंध के टुकड़े फिर से जुड़ गए. भीम ने कई बार प्रयास किया लेकिन बार -बार जरासंध के टुकड़े जुड़ जाते. फिर कृष्ण ने इशारा किया दोनों टुकड़ों को विपरीत फेंकने का.भीम ने वही किया और इस तरह जरासंध का वध हुआ.

कृष्ण, भीम और अर्जुन सभी राजाओं को बंदीगृह से आज़ाद कराते हैं. वहां जरासंध का बेटा सहदेव आकर अपने पिता का अंतिम संस्कार करने का आदेश मांगता है. कृष्ण उसे मगध नरेश कहते हुए अपना कार्य करने को कहते हैं.

पांडवों का राजसूय यज्ञ

युधिष्ठिर को इंद्रप्रस्थ में छोड़कर चारों भाई विजययात्रा पर निकल पड़े. भीम पूरब की तरफ, अर्जुन उत्तर की तरफ, नकुल पश्चिम की तरफ और सहदेव दक्षिण की तरफ निकल गए. जिन राजाओं ने ध्वज झुका दिए उनसे मैत्री संबंध बनाये गए और जिन राजाओं ने ध्वज नहीं झुकाए वो ध्वज काट दिए गए. विजययात्रा समाप्त कर चारों भाई वापस आये और राजसूय यज्ञ की तैयारी शुरू हो गई. सभी राजाओं को निमंत्रण पत्र भेजे गए लेकिन हस्तिनापुर में युधिष्ठिर ने सहदेव को भेजा. सभी ने हस्तिनापुर में सहदेव का स्वागत किया और शकुनि ने भी राजसूय यज्ञ को लेकर युधिष्ठिर के लिए खूब मीठे बोल बोले जिसे सुनकर दुर्योधन क्रोधित होता दिखा.दुर्योधन के क्रोध को शांत करते हुए शकुनि उसे बनावटी खुश होने के लिए कहता है और पांडवों के राजसूय यज्ञ में जाने के लिए कहता है.

शिशुपाल की कहानी

युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के लिए पूरे हस्तिनापुर, कृष्ण- बलराम और सभी राज्य के राजाओं-महाराजों को बुलावा भेजा है. शिशुपाल भी छेदी राज्य से निकल पड़ा है इंद्रप्रस्थ आने के लिए. लेकिन उसे ये नहीं पता कि वो अपने काल की तरफ जा रहा है. असल मे जब शिशुपाल का जन्म हुआ था, तो सभी दासियां उस बालक की अतिरिक्त बाहू और नेत्र देखकर डर गईं, उन्होंने तो रानी सृतश्रवा को उस राक्षस रूपी बच्चे को फेंकने का सुझाव तक दे दिया था लेकिन रानी रोते हुए ईश्वर को गुहार लगाने लगीं. तभी आकाशवाणी हुई कि,' इस बालक को मत फेंको, ये बालक परमवीर होगा, ये भविष्य की धरोहर है." साथ ही ये भी भविष्यवाणी हुई कि "जिसकी गोद में इस बालक के अतिरिक्त बाहू और नेत्र जिसकी गोद मे झड़ेंगे वो इसका वध करेगा." उसी समय किशोर कृष्ण और बलराम भी अपने माता-पिता देवकी-वासुदेव के साथ वहां पहुंच गए अपनी छोटी बुआ से मिलने. एक -एक कर सभी ने शिशुपाल को गोद में खिलाना शुरू किया जैसे ही कृष्ण ने उसे अपनी गोद में लिया तो उस बालक की अतिरिक्त बाहू और नेत्र झाड़ गए जिसे देख रानी सृतश्रवा चिंतित हो गई. वो कृष्ण के पास आती हैं अपनी व्यथा लेकर, सब बताने के बाद वो कृष्ण से वचन मांगती है.

कृष्ण का वचन

तब कृष्ण शिशुपाल को सौ अपराधों पर क्षमा करने का वचन देते हैं. ये तो थी अतीत की कहानी लेकिन वर्तमान में कृष्ण और बलराम भी पहुंच गए हैं इंद्रप्रस्थ और अपनी दोनों बहनों द्रौपदी और सुभद्रा को सुखी देखकर खुश हो रहे हैं. कृष्ण और युधिष्ठिर ऋषि वेद व्यास के पग धोकर उनका स्वागत कर रहे हैं. बाकी सभी ऋषियों के भी पग धोकर सबका स्वागत किया जाता है.

शिशुपाल का वध

यज्ञशाला में राजसूय यज्ञ शुरू हो गया. युधिष्ठिर के इस राजसूय यज्ञ में सभी सम्मिलित हुए ये देख दुर्योधन को क्रोध भी आ रहा है लेकिन मामा शकुनि के कहे अनुसार बनावटी खुशी लिए शामिल हुआ है. यज्ञ समाप्त कर धृतराष्ट्र और विदुर राजमहल के अंदर आते हैं, शकुनि और दुर्योधन अपने अनुजों कर साथ इंद्रप्रस्थ भवन के अंदर आते हैं और भवन को देख दुर्योधन को ईर्ष्या होने लगती है. फिर कर्ण आता है, अर्जुन उसका स्वागत करता है, और कर्ण को देख कुंती खुश होती है. जयद्रथ भी आता है, फिर राजा द्रुपद आते हैं, द्रोणाचार्य और कृपाचार्य भी आते हैं. अंत में युधिष्ठिर, भीष्म पितामह, कुंती, और सुभद्रा संग सब भवन में आ जाते हैं. युधिष्टर सभी को प्रणाम करते हैं. भीष्म युधिष्ठिर को अतिथियों का सत्कार करने को कहते हैं, इसपर युधिष्ठिर उन्हीं से पूछते हैं कि पहले किसका सत्कार करूं, वेद व्यास जी का या फ‍िर भीष्म पितामह का. भीष्म मना करते हुए कहते हैं कि, "इस सभा में ही नहीं पूरे त्रिलोक में यदुवंश शिरोमणि वासुदेव श्री कृष्ण के अतिरिक्त किसी और की अग्रिमपूजा हो ही नहीं सकती."

भीष्म के कहने पर श्री कृष्ण अपना स्थान ग्रहण करते हैं, अग्रिमपूजा आरम्भ होती है. नकुल श्री कृष्ण के पग धोकर उन्हें फूलों की माला पहनाते हैं कि तभी वहां शिशुपाल क्रोधित होता हुआ आता है और कृष्ण की अग्रिमपूज करने से मना करता है. बलराम उसे रोकते भी हैं लेकिन वो शांत नहीं होता. इसपर भीम और अर्जुन भी शिशुपाल पर क्रोध जताते हैं लेकिन युधिष्ठिर उन्हें रोकते हैं और कृष्ण भी कहते हैं कि," आतिथेय की मर्यादा का उलंघन ना करो, बोलने दो इसे, आज इसके ही बोलने के दिन हैं." शिशुपाल ने बोलना शुरू किया, उसने ना सिर्फ कृष्ण को भरी सभा मे अपमानित किया बल्कि पितामह भीष्म का, विदुर का, कुंती का सभी का अपमान किया. कृष्ण तब तक शांत रहे जब तक शिशुपाल ने 100 गलतियां नहीं कर ली.

लेकिन 100 गलतियों के बाद कृष्ण ने अपना सुदर्शन चक्र निकाला और शीशपाल का वध कर दिया. कृष्ण की उंगली से रक्त निकलने लगा, इसपर द्रोपदी दौड़कर गईं और अपने चुनरी फाड़कर कृष्ण की उंगली में लपेट दिया. इस प्रकार कृष्ण द्रोपदी के ऋणी हो गए और उन्होंने द्रोपदी को वचन दिया कि समय आने पर वो एक एक धागे का ऋण उतारेंगे.

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इन्द्रप्रस्थ में युधिष्ठिर का अभिषेक

वेदव्यास युधिष्ठिर का तिलक लगाते हैं. कृपाचार्य युधिष्ठिर को फूलों का हार पहनाते हैं. भीष्म पितामहयुधिष्ठिर को मुकुट पहनाते हैं. युधिष्ठिर सभागृह में सभी के सामने वचन लेते हैं कि वो भरतवंश की मर्यादा का आदर करेंगे और इसकी रक्षा भी करेंगे. साथ ही ये भी घोषणा करते हैं कि शिशुपाल के वध के बाद छेदी राज्य एक अलग राज्य ही रहेगा और वहां शिशुपाल पुत्र महिपाल राज्य करेगा, जिसका राज्याभिषेक इंद्रप्रस्थ में ही होगा. राजगृह के बाद सभी परिवार सभा होती है, जहां सभी खान-पान करते हैं. तभी वहां वेद व्यास आते हैं और आगे भविष्य में होने वाली घटनाओं का संकेत देकर चले जाते हैं. वेद व्यास की बातों को दुर्योधन एक कान से सुनता है और दूसरे कान से निकाल देता है. वो तो अपने ही अभिमान में रहता है. तभी मां कुंती की आज्ञा मानकर युधिष्ठिर सबका आशीर्वाद लेता है. सभी युधिष्ठिर को आशीर्वाद में अपना ज्ञान प्रदान करते हैं.

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