निर्देशकः संजीवन लाल
कलाकारः सोहैल लखानी, अपूर्वा अरोड़ा
बबल गम 14वें बसंत वाले 'बच्चों' की प्रेम कहानी है, वह भी अस्सी के दशक की, चिट्ठी युग की. जमशेदपुर के एक मोहल्ले की जेनी (अपूर्वा) को लेकर वेदांत (लखानी) के हृदय में प्रेम अखुवाया है जबकि रतन (सूरज) पहले से जबरन नत्थी है.
वेदांत के सामने वही वस्तुस्थिति का जायजा रखता हैः ''होली तक तो पता चल ही जाएगा, किसको रंग लगाती है किसको चूना.'' बबल गम अपने स्ट्रक्चर से बता देती है कि यह एफटीआइआइ से कला सिनेमा की विद्याप्राप्त स्नातक की फिल्म है.
कलाकारों का चुनाव, दृश्यों की रचना, ब्यौरे और उनकी रफ्तार सभी मायनों में. कुछ भी सिनेमाई नहीं बल्कि जीवन के जैसा लगता है.
खिलखिलाती जेनी के छिन जाने के अंदेशे में एक किशोर के भीतर कसमसाता तूफान हम साफ देख पाते हैं. अभिनय इतना मौलिक कि कलाकारों पर प्यार आ जाए. हां, यह फिल्म दर्शक से धैर्य की अपेक्षा जरूर करती है.