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Rang short film: दिल जीत लेती है रंगों में बंटे समाज पर बनी ये प्यारी सी शॉर्ट फिल्म

डायरेक्टर सुनील पाल की शॉर्ट फिल्म 'रंग', जयपुर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में दिखाई जानी है. एक चाय निपटाते भर में देखी जा सकने वाली ये शॉर्ट फिल्म, बड़ी खूबसूरती से अलग-अलग रंगों में बिखरे समाज का डर, इस डर का असर और हल तीनों दिखा देती है.

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'रंग' शॉर्ट फिल्म
'रंग' शॉर्ट फिल्म

ढाई-तीन घंटे लंबी मेनस्ट्रीम फीचर फिल्में अक्सर एक सोशल मैसेज डिलीवर करने के नाम पर बिखरी पड़ी कहानी, कानफाड़ शोर और उबाऊ डायलॉगबाजी का बोझ लिए आती हैं. मगर शॉर्ट फिल्में अक्सर सिनेमा के माध्यम का खूबसूरती से, बहुत सटीक इस्तेमाल करते हुए कुछ ही देर में, उससे कहीं ज्यादा असर करने का दम रखती हैं. डायरेक्टर सुनील पाल की शॉर्ट फिल्म 'रंग' ऐसी ही है. 

कुछ महीने पहले रिलीज हुई बॉलीवुड फिल्म 'फर्रे' के राइटर्स में से एक जीतेंद्र नाथ जीतू की लिखी कहानी पर बेस्ड ये फिल्म, 'गागर में सागर' भरने वाला काम करती है. 13 मिनट से थोड़ी ही लंबी इस शॉर्ट फिल्म को एक कप चाय निपटाने भर के समय में देखा जा सकता है. 'रंग' की खासियत ये है कि ये इतनी ही देर में आप पर असर कर जाती है. 

रंगों में बंटे हम 
'रंग' एक बच्चे की कहानी है. फिल्म शुरू होती है तो आपको रेडियो पर चल रहे समाचारों के जरिए पता चलता है कि इलाके में साम्प्रदायिक दंगों का तनाव है. कहानी के केंद्र में एक मुस्लिम परिवार का बच्चा है. इस बच्चे की जिद है कि उसे स्कूल जाना है. जब उसकी मां उसे ताना मारती है कि 'एक यही हैं स्कूल जाने वाले', तो आपको कोविड लॉकडाउन का वो दौर भी याद आ सकता है जब दिन भर उधम करते रहने वाले बच्चे भी घरों में कैद थे. उस बच्चे की उलझन और परेशानी समझना कोई मुश्किल काम नहीं है. 

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'रंग' शॉर्ट फिल्म से एक सीन

मगर इस सांप्रदायिक तनाव के बीच में, दूर से इंसान का धर्म सूंघ लेने वाले, मुस्तैदी से खड़े 'सोशल सिपाहियों' से बचकर जाना एक बहुत बड़ा टास्क है. ये टास्क बच्चे का पिता कैसे पूरा करता है, 'रंग' इसी की कहानी है. इस सफर में इस बाप-बेटे को एक साथी भी मिलता है, जो उनसे अलग धर्म का है. इस किरदार का ट्रीटमेंट भी कहानी में बहुत खूबसूरत मैसेज छोड़े जाता है. और फिल्म की एंडिंग आपको मुस्कुराते हुए, सोचते हुए छोड़ जाएगी. 

'रंग' शॉर्ट फिल्म से एक सीन

एक्टिंग और टेक्निकल डिपार्टमेंट में मजबूत है 'रंग' 
सिनेमा 'दिखाने' का माध्यम है, लेकिन अक्सर इसे डायलॉगबाजी के जरिए कहानी-मैसेज-नैरेटिव बोलकर 'बताने' में खर्च कर दिया जाता है. 'रंग' की एक और खूबसूरती ये है कि तीन 4 किरदारों और गिनती के 10 संवादों में ये फिल्म अपना कमाल कर जाती है. कहानी को एडिटिंग, सिनेमेटोग्राफी और म्यूजिक का साथ भी दमदार तरीके से मिलता है. मानवेन्द्र त्रिपाठी और कामरान शाह की एक्टिंग भी कमाल है. दोनों एक्टर्स आंखों-आंखों में, अपने सधे हुए एक्सप्रेशन से सबकुछ कह जाते हैं. 

'रंग' को अयोध्या फिल्म फेस्टिवल में दिखाया जा चुका है, जहां इसे 'बेस्ट सोशल फिल्म' भी चुना गया. मुंबई के जागरण फिल्म फेस्टिवल में भी ये शॉर्ट फिल्म दिखाई जा चुकी है. फरवरी में इसे जयपुर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में दिखाया जाएगा, जिसके बाद मेकर्स फिल्म को किसी प्लेटफॉर्म पर लेकर आएंगे.

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