जिस इंसान पर कोई अपराध साबित हो जाए, वही असली गुनहगार है- ये मानना है उस वकील का जिसने आज तक एक भी केस नहीं हारा. और इसी सोच के इर्द-गिर्द घूमती है सिस्टम, जो 6 साल बाद डायरेक्टर अश्विनी अय्यर तिवारी की वापसी भी है. फिल्म प्राइम वीडियो पर रिलीज हुई है.
‘सिस्टम’ सिर्फ एक कोर्टरूम ड्रामा नहीं है. ये तीन अलग-अलग जिंदगी की कहानियों को एक साथ जोड़ती है- एक बेटी जो अपने सफल पिता की छाया से बाहर निकलकर खुद को साबित करना चाहती है, दूसरी महिला जो अपने भाई के साथ हुए अन्याय के खिलाफ लड़ रही है, और तीसरी तरफ वो कानून, जिसका पलड़ा अक्सर पैसों और पावर वालों की तरफ झुकता दिखाई देता है.
कहानी: अदालत में पिता-बेटी आमने-सामने
फिल्म की कहानी नेहा (Sonakshi Sinha) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने पिता रवि राजवंश (Ashutosh Gowariker) की तरह वकील है. फर्क बस इतना है कि पिता बड़े नामी क्रिमिनल लॉयर हैं, जबकि नेहा दिल्ली की अदालत में पब्लिक प्रॉसिक्यूटर बनकर संघर्ष कर रही है. नेहा की जिंदगी तब बदलती है जब उसकी मुलाकात कोर्ट स्टेनोग्राफर सारिका (Jyotika) से होती है. कोर्ट में सालों तक बहसें टाइप करते-करते सारिका खुद कानून की गहरी समझ रखने लगी है. कम साधनों में जिंदगी गुजार रही सारिका नेहा को उस दुनिया से मिलवाती है, जहां इंसाफ सिर्फ कानून नहीं, बल्कि जरूरत भी होता है.
मर्डर मिस्ट्री के साथ आगे बढ़ती है कहानी
कहानी में असली मोड़ तब आता है जब रवि राजवंश का पुराना क्लाइंट विक्रम बज्राल (विजयंत कोहली) एक सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर की हत्या के आरोप में फंस जाता है. इस केस में नेहा को अपने ही पिता के खिलाफ अदालत में खड़ा होना पड़ता है. लेकिन उसे नहीं पता कि उसका पिता के खिलाफ लड़ना भी एक साजिश है. फिल्म धीरे-धीरे कोर्टरूम ड्रामा से मर्डर मिस्ट्री में बदलती है. अच्छी बात ये है कि यहां चीखते-चिल्लाते डायलॉग्स या 'तारीख पर तारीख' वाला ओवरड्रामा नहीं है. फिल्म शांत तरीके से अपनी कहानी कहती है और उसी ट्रैक पर बनी रहती है.
एक्टिंग: ज्योतिका और सोनाक्षी फिल्म की जान
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत नेहा और सारिका का रिश्ता है. कोर्ट उनके लिए सिर्फ नौकरी की जगह नहीं, बल्कि एक ऐसा जरिया बन जाता है जहां दोनों खुद को और एक-दूसरे को समझने लगती हैं. सोनाक्षी ने नेहा के किरदार को बेहद सहज तरीके से निभाया है. वहीं ज्योतिका अपने शांत चेहरे के पीछे छिपे दर्द और आत्मसम्मान को शानदार तरीके से स्क्रीन पर लेकर आती हैं. आशुतोष भी अपने किरदार में काफी मजबूत नजर आते हैं. बाकी कलाकारों ने भी कहानी को मजबूती देने का काम किया है.
फिल्म की खास और कमजोर बातें
फिल्म की सबसे अच्छी बात ये है कि इसे जबरदस्ती लव एंगल या फालतू गानों से नहीं खींचा गया. जो गाने हैं, वो कहानी का हिस्सा बनकर आते हैं. हालांकि फिल्म आपको बहुत ज्यादा सरप्राइज नहीं करती. शुरुआत से ही अंदाजा लगने लगता है कि कौन क्या खेल खेल रहा है और कहानी किस दिशा में जाएगी. क्लाइमैक्स भी थोड़ा और दमदार हो सकता था. कुछ जगहों पर कहानी बनावटी लगती है, लेकिन डायरेक्टर अश्विन ने पूरी फिल्म को संतुलित और गंभीर बनाए रखा है.
फाइनल वर्डिंक्ट!
‘सिस्टम’ कोई तेज-तर्रार मसाला कोर्टरूम ड्रामा नहीं है. ये धीरे-धीरे खुलने वाली ऐसी कहानी है, जो इंसाफ, क्लास डिफरेंस और रिश्तों के बीच उलझे सिस्टम को दिखाती है. अगर आपको शोर-शराबे से ज्यादा कंटेंट और परफॉर्मेंस वाली फिल्में पसंद हैं, तो ‘सिस्टम’ एक बार जरूर देखी जा सकती है.