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अक्षय कुमार और श्रुति हासन की फिल्म गब्बर इस बैक का फिल्म रिव्यू

हिंदी फिल्मों में रीमेक का चलन जोरों पर है, कभी हॉलीवुड की प्रेरणा से फिल्में बनती हैं तो कभी साउथ की फिल्मों का रीमेक. पिछले दिनों वांटेड और राउडी राठौर जैसी हिट रीमेक के साथ साथ कई असफल हिंदी रीमेक फिल्में भी परदे पर आईं.

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डायरेक्टर: कृष
स्टार कास्ट: , , सुनील ग्रोवर, जयदीप अहलावत , सुमन तलवार
अवधि: 131 मिनट
सर्टिफिकेट:U/A
रेटिंग: 2 स्टार

हिंदी फिल्मों में रीमेक का चलन जोरों पर है, कभी हॉलीवुड की प्रेरणा से फिल्में बनती हैं तो कभी साउथ की फिल्मों का रीमेक. पिछले दिनों वांटेड और राउडी राठौर जैसी हिट रीमेक के साथ साथ कई असफल हिंदी रीमेक फिल्में भी परदे पर आईं. ऐसी ही एक और तमिल फिल्म रमन्ना (2002 में रिलीज हुई, निर्देशक ए आर मुर्गदौस की फिल्म), जिसके तेलुगु और कन्नड़ रीमेक के बाद अब उसी फिल्म का हिंदी रीमेक 'गब्बर इज बैक' के रूप में बनाया गया है. बाकी भाषाओं में तो फिल्म सुपर हिट थी लेकिन क्या इसे हिंदी में सफलता मिलेगी?

आइये पता करते हैं, सबसे पहले कहानी-

गब्बर (अक्षय कुमार) समाज के मुद्दों को खत्म करने का जिम्मा उठाते हैं, सबसे बड़ा मुद्दा है भ्रष्टाचार जिसके लिए आम आदमी के रूप में एक टीम का गठन करते हुए गब्बर कभी तहसीलदारों को सबक सिखाता है तो कभी हॉस्पिटल की लूट की कहानी को सबके सामने लाता है और अंत में अपने अतीत में हुई घटनाओं का खात्मा करते हुए सबको सीख देता है. इस पूरे घटनाक्रम में उसका सामना CBI प्रमुख (जयदीप अहलावत), उद्योगपति पाटिल (सुमन तलवार), साधु (सुनील ग्रोवर) और वकील के रूप में श्रुति (श्रुति हासन) से भी होता है.

अक्षय कुमार की मौजूदगी फिल्म में एक्शन की पूर्ति करती है, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है जो आपको अक्षय की तरफ से नया मिल रहा हो, एक आम आदमी के किरदार को निभाते हुए अक्षय कुमार पूरी तरह से सुपरहीरो की तरह कभी भी और किसी को भी सबक सीखाने में सक्षम रहते हैं.

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राउडी राठौर के बाद ये अटकलें थी की इस फिल्म के द्वारा भी कई सारे डायलॉग सुनने और याद करने को मिलेंगे, लेकिन एक भी संवाद उस स्तर का नहीं है जो आपको याद रह जाए. कहानी काफी सरल थी लेकिन निर्देशक कृष के प्रयोगों का खामियाजा पूरी फिल्म को उठाना पड़ सकता है, काफी हल्के स्क्रीनप्ले की वजह से श्रुति का किरदार कब आता है कब चला जाता है इस बात का किसी को इल्म नहीं हो पाता.

अगर फिल्म के विलेन की बात करें तो सुमन तलवार जैसा साउथ का सुपरस्टार भी इस फिल्म को वो गति नहीं दे पाता है, जो एक अच्छे नेगेटिव किरदार को करना चाहिए. उसके संवाद में भी कुछ खालीपन सा नजर आता है. करीना कपूर खान की कुछ पल की मौजूदगी भी सिर्फ एक गाने की थी और मेरे हिसाब से अक्षय कुमार के किरदार को एक लीडर के रूप में स्थापित करने के लिए डायरेक्टर को थोड़ा वक्त और लेना चाहिए था.

इस फिल्म में सिर्फ सुनील ग्रोवर का ही किरदार ऐसा है जिसके प्रति आपकी सहानुभूति थोड़ी ज्यादा रहती है, शुरू से लेकर आखिर तक सुनील का ट्रैक सबसे बेहतर है. फिल्म के संगीत का प्रयोग भी बहुत ही गलत तरीके से हुआ है, जब कभी आप मुद्दे के प्रति गंभीर होते हैं उसी पल गाने की वजह से फिल्म की गति अवरुद्ध होती है जिसकी वजह से बेचैनी बढ़ने लगती है की फिल्म कब आगे बढ़ेगी और यही नहीं इस फिल्म में आपको राजू हिरानी द्वारा '3 इडियट्स' दिखाए गए डिलीवरी सिस्टम की झलक भी देखने को मिलेगी.

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फिल्म का एक हॉस्पिटल का सीन काफी सही फिल्माया गया है जो कि हॉस्पिटल प्रशासन की कलई खोलने में किसी हद तक कामयाब हो सकता है और अक्षय के द्वारा कुछ बातें बताई गई हैं जो कि छात्रों के लिए जरूरतमंद हो सकती हैं, जैसे कि 5 चीजें काफी आवश्यक हैं- 'खिंचाव, दबाव, तोड़, मोड़ और घुमाव' लेकिन एक लीडरशिप की भावना कहीं न कहीं परिपूर्ण नहीं हो पायी है. ट्रेलर देख कर लगता था की संवादों पर भर भर के तालियां बजेंगी, लेकिन फिल्म के दौरान ऐसा कोई भी पल नहीं आया जब लगा हो की ताली जोर से बजानी चाहिए. फिल्म का क्लाइमेक्स तो आपको बोरियत की सीमाओं के ऊपर ले जाता है और एक ही सवाल मन में आता है ' ये फिल्म कब खत्म होगी?'

तो इस हफ्ते अगर आप अभिनेता अक्षय कुमार के बहुत ही बड़े फैन या प्रशंसक हैं या फिर सुनील ग्रोवर और श्रुति हसन के कायल हैं, तो ही ये फिल्म देखें अन्यथा उन्हीं पैसों से मनोरंजन का कोई और साधन ढूंढ सकते हैं.

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