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Chup Film Review: 'सिनेमा' के सेलिब्रेशन की बात करती है चुप, गुरुदत्त का 'टच' है स्पेशल  

सनी देओल और दुलकर सलमान स्टारर फिल्म चुप: रिवेंज ऑफ द आर्टिस्ट सिनेमाघरों में आने को तैयार है. इस फिल्म के जरिए डायरेक्टर आर बाल्की ने लेजेंड्री स्टार रहे गुरु दत्त को ट्रिब्यूट दिया है. फिल्म की कहानी क्रिटिक्स और फिल्मकारों से जुड़ी मर्डर मिस्ट्री पर आधारित है. कैसी है ये फिल्म जानिए हमारे रिव्यू में.

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श्रेया धनवंतरी, दुलकर सलमान, सनी देओल, पूजा भट्टा श्रेया धनवंतरी, दुलकर सलमान, सनी देओल, पूजा भट्टा
फिल्म: चुप: रिवेंज ऑफ द आर्टिस्ट
3.5/5
  • कलाकार : सनी देओल, दुलकर सलमान, पूजा भट्टा, श्रेया धनवंतरी
  • निर्देशक : आर बाल्की

एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री और फिल्म क्रिटिक या कह लें मीडिया का रिश्ता लव एंड हेट वाला रहा है. सिनेमा से दोनों प्यार तो करते हैं लेकिन फिल्मों को लेकर उनका नजरिया हमेशा डिबेट का मुद्दा रहा है. आर बाल्की ने इसी रिश्ते को सिल्वर स्क्रीन पर फिल्म चुप के जरिए दिखाया है. क्या ये फिल्म क्रिटिक के मानकों पर कितनी खरी उतरती है? यह जानने के लिए पढ़ें रिव्यू...

कहानी

एक रात मुंबई में हुए मर्डर से सनसनी फैल जाती है. जाने-माने क्रिटिक नितिन श्रीवास्तव को बेरहमी से काटकर मार दिया गया है. इस केस को देख रहे अरविंद माथुर (सनी देओल) इसकी मिस्ट्री सॉल्व कर ही रहे होते हैं कि फिर एक के बाद एक और मर्डर होते हैं. हैरानी की बात है कि तीनों ही मरने वाले फिल्म क्रिटिक थे. ऐसे में अरविंद सीरियल किलर, जो केवल क्रिटिक्स को ही टारगेट कर रहा है, की तलाश में लगते हैं.

शहर में दहशत इतनी हावी हो जाती है कि क्रिटिक फिल्म के बारे में निगेटिव लिखना बंद कर देते हैं. लेकिन इसके बावजूद एक और क्रिटिक की बली चढ़ती है. इस मिस्ट्री में अरविंद अपनी दोस्त जेनोबिया (पूजा भट्ट) की मदद लेता है, जो पेशे से क्रिमिनल साइकॉलजिस्ट हैं. इस कड़ी में एंटरटेनमेंट जर्नलिस्ट नीला मेनन (श्रेया धनवंतरी) भी इस पहेली को सुलझाने में अरविंद का साथ देती है. आखिर सीरियल किलर ने क्रिटिक्स को ही टारगेट क्यों बनाया है? उसकी मंशा क्या रही होगी? क्या उसे खोजने में अरविंद सफल होते हैं? यह जानने के लिए आपको थिएटर की ओर रुख करना होगा.

डायरेक्शन

आर बाल्की की इस फिल्म को फिल्ममेकर गुरुदत्त को ट्रिब्यूट भी कहा जा सकता है. फिल्म में एक डायलॉग है, 'कागज के फूल बनाने वाले को कागज पर कलम चलाने वालों ने चुप करा दिया था'. इस बात से इनकार भी नहीं किया जा सकता है कि गुरुदत्त अपनी इस फिल्म की रिव्यूज से इतने आहत हुए थे कि उन्होंने फिल्में बनाना छोड़ दिया था और डिप्रेशन में चले गए थे. दो-तीन साल बाद उनकी मौत हो गई. हालांकि आज वही फ्लॉप करार दी गई फिल्म को कल्ट क्लासिक कहा जाता है.

ट्रेलर देखकर लगा था कि फिल्म केवल क्रिटिक्स व उनकी रेटिंग सिस्टम पर कटाक्ष है. लेकिन फिल्म देखने के दौरान समझ आता है कि आर बाल्की ने मेकर्स और क्रिटिक्स दोनों के पक्षों को बखूबी बैलेंस किया है. एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री की बात करने वाली इस फिल्म को उन्होंने सस्पेंस व थ्रिल का तड़का लगाकर दर्शकों के सामने परोसा है.

फिल्म सिनेमा के प्रति पैशन की बात करती है, जो सिनेमालवर्स के लिए ट्रीट हो सकती है. फिल्म का फर्स्ट हाफ जहां, पूरा सस्पेंस से भरा हुआ है, तो वहीं सेकेंड हाफ में कहानी थोड़ी खींची हुई-सी लगती है. फिल्म के डायलॉग्स इसकी जान हैं.  गुरुदत्त की फिल्में 'कागज के फूल', 'प्यासा' और उनके गानों को जिस तरह इस फिल्म में ब्लेंड किया गया है, वो वाकई बहुत खूबसूरत लगता है. खासकर फिल्म के आखिरी सीन में गुरुदत्त से प्रेरित एक ऐसा फ्रेम है, जो एकाएक आपको उनकी दुनिया में लेकर जाता है. इस पूरी फिल्म के दौरान सिनेमा के प्रति आर बाल्की का प्यार व पैशन स्क्रीन पर साफ नजर आता है.

टेक्निकल

फिल्म आपको सिनेमालवर्स के नजरिये से मुंबई को दिखाती है. बांद्रा की गलियों में स्टार्स की बनी पेंटिंग्स, महबूब स्टूडियो, गुरुदत्त का रेफरेंस आदि सभी को सिनेमैटोग्राफर विशाल सिन्हा ने बड़ी ही खूबसूरती से कैप्चर किया है. नयनभद्र की एडिटिंग फर्स्ट हाफ में जितनी बेहतरीन रही, अगर सेकेंड हाफ को थोड़ा और क्रिस्प करते, तो शायद फिल्म और दिलचस्प हो जाती. फिल्म बेशक आपको गुरुदत्त की दुनिया में ले जाती है. वहीं साहिर लुधियानवी द्वारा लिखे उनकी फिल्मों के गाने 'जाने क्या तूने कही' और 'ये दुनिया अगर मिल भी जाए' गानों से प्रेरित होकर ब्रैकग्राउंड स्कोर तैयार किया गया है. फिल्म का म्यूजिक आज की दौड़ती-भागती जिंदगी में आपको कुछ पल का सुकून देती है. साहिर के ये बोल आज के कंट्रेप्ररी दौर में भी काफी सामायिक लगते हैं.

एक्टिंग

दुलकर सलमान की एक्टिंग इस फिल्म की जान है. डैनी के कॉम्प्लेक्स्ड किरदार को दुलकर ने बखूबी जिया है. मल्टीप्ल पर्सनैलिटी डिसऑर्डर से ग्रस्त दुलकर क्लाइमैक्स के पहले कुछ सीन्स में दिल जीत लेते हैं. उनकी परफॉर्मेंस लाजवाब रही. वहीं एंटरटेनमेंट जर्नलिस्ट के रूप में श्रेया धनवंतरी का काम काफी सहज रहा. वहीं सनी देओल जब-जब स्क्रीन पर आते हैं, छा जाते हैं. इंस्पेक्टर के रूप में सनी ने खुद को ढाल लिया है. सीरियस सिचुएशन में भी उनके कुछ डायलॉग्स आपको हंसाते हैं. पूजा भट्ट एक लंबे समय के बाद सिल्वर स्क्रीन पर दिखी हैं. उनकी मौजूदगी फिल्म को एक दिलचस्प मोड़ देती है. हां, यहां नीला की मां के किरदार को इग्नोर नहीं कर सकते हैं. सरन्या पोनवन्नन ने अपने इस किरदार को एक अलग रंग दिया है.

क्यों देखें

सिनेमा लवर्स के लिए यह फिल्म ट्रीट होगी क्योंकि फिल्म सिनेमा को सेलिब्रेट और उसके प्रोसेस को इंजॉय करने की बात कहती है. यह फिल्म आपको दोनों पक्षों फिल्म मेकर्स और क्रिटिक्स के नजरिये को समझने में मदद करेगी. गुरु दत्त को अनोखे रूप से ट्रिब्यूट देती इस फिल्म को एक मौका तो देना बनता है. सस्पेंस व थ्रिलर से भरी इस फिल्म को लेकर दावा है कि आप निराश नहीं होंगे.

 

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